October 31, 2026

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न्यायिक सुधार

न्यायमूर्ति कौल के संस्मरण ने कॉलेजियम व्यवस्था पर उठाए सवाल

हस्तक्षेप के बिना पारदर्शिता की मांग

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल का आगामी संस्मरण न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़ी कॉलेजियम व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल उठाता है। न्यायमूर्ति कौल सर्वोच्च न्यायालय में भारत के मुख्य न्यायाधीश के बाद चार वर्षों तक दूसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश रहे।

Without Fear or Favour शीर्षक वाला उनका संस्मरण अभी प्रकाशित नहीं हुआ है, लेकिन विभिन्न साक्षात्कारों में न्यायमूर्ति कौल ने कॉलेजियम व्यवस्था के कई पहलुओं पर अपनी बात रखी है। उन्होंने इस व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए संकेत दिया है कि इसके विचार-विमर्श को संचालित करने वाली प्रक्रिया पर्याप्त रूप से सुसंगत और पारदर्शी नहीं है। उन्होंने एक ऐसे प्रसंग का भी उल्लेख किया है, जिसमें एक संभावित न्यायाधीश के समुदाय को लेकर चर्चा हुई थी।

न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता पर न्यायमूर्ति कौल के सवाल

अपने साक्षात्कारों में न्यायमूर्ति कौल ने विशेष रूप से भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की न्यायिक नियुक्तियों से जुड़ी कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि सरकार के हस्तक्षेप का मुकाबला करने के लिए न्यायपालिका में दृढ़ता और साहस होना चाहिए।

न्यायमूर्ति कौल ने न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की बौद्धिक गहराई और अपना पक्ष रखने की क्षमता की प्रशंसा तो की, लेकिन साथ ही आरोप लगाया कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश सरकार के प्रति “जरूरत से ज्यादा नरम” थे और उनसे “अपेक्षाएं अधिक थीं”।

Dy Chandrachud

पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़

उन्होंने एक ऐसे प्रसंग का उल्लेख किया, जिसमें न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश की नियुक्ति के पक्ष में थे, लेकिन उस व्यक्ति की नियुक्ति पर सरकार की राय जानना चाहते थे।

न्यायमूर्ति कौल के अनुसार, सरकार के साथ व्यवहार करते समय, विशेषकर न्यायिक नियुक्तियों के मामले में, “उन्हें अधिक दृढ़ होना चाहिए था।”

एक साक्षात्कार में न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि सरकारें उन मुख्य न्यायाधीशों का सम्मान करती हैं जो अपने रुख पर दृढ़ रहते हैं और ऐसा ही होना भी चाहिए।

उन्होंने यह दावा भी किया कि एक बार विरोध जताने के लिए वह कॉलेजियम की बैठक से बाहर चले गए थे। हालांकि, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने इसके जवाब में कहा कि उन्हें ऐसी किसी घटना का स्मरण नहीं है और कॉलेजियम के सभी निर्णय सदस्यों की सर्वसम्मति से लिए गए थे।

सर्वोच्च न्यायालय के एक अन्य पूर्व न्यायाधीश ने यह भी इंगित किया है कि न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने प्रधानमंत्री को एक धार्मिक आयोजन के लिए अपने आवास पर आमंत्रित करके एक अन्य अलिखित परंपरा को तोड़ा था।

संस्मरण के प्रकाशित होने के बाद उच्च न्यायपालिका की कार्यप्रणाली के बारे में और विवरण सामने आ सकते हैं। हालांकि, यह स्पष्ट है कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए निर्धारित मानदंडों और प्रक्रियाओं में पारदर्शिता का अभाव है।

यह भी एक तथ्य है कि सभी मुख्य न्यायाधीशों की कार्यशैली एक जैसी नहीं रही है। यह भी सर्वविदित है कि कुछ पूर्व मुख्य न्यायाधीशों, जैसे रंजन गोगोई, के कार्यकाल में इस गरिमामय पद की विश्वसनीयता को ठेस पहुंची।

कॉलेजियम व्यवस्था: न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन

कॉलेजियम व्यवस्था का विकास न्यायिक नियुक्तियों को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से मुक्त रखने के उद्देश्य से हुआ था। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायाधीशों को अपने उत्तराधिकारी चुनने में प्राथमिकता दिए जाने के फैसले के तीन दशक बाद भी यह व्यवस्था अपारदर्शिता, असंगत प्रक्रियाओं और भारत के मुख्य न्यायाधीश के हाथों में शक्ति के केंद्रीकरण जैसी समस्याओं से घिरी हुई है।

Commenting On Sub Judiceन्यायमूर्ति कौल के अनुसार, इस टकराव की एक बड़ी वजह 2015 के उस फैसले को लेकर राजनीतिक प्रतिष्ठान की नाराजगी है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को निरस्त कर दिया था। इस आयोग के माध्यम से न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका और प्रतिष्ठित व्यक्तियों को औपचारिक भूमिका देने का प्रस्ताव था।

उस फैसले ने न्यायिक स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए न्यायपालिका की प्राथमिकता को बरकरार रखा, लेकिन साथ ही ऐसी व्यवस्था की कमियों को दूर करने की जिम्मेदारी भी न्यायपालिका पर छोड़ दी, जिन्हें अदालत स्वयं स्वीकार कर चुकी थी।

संस्मरण यह भी दर्शाता है कि नियुक्तियों की प्रक्रिया काफी हद तक भारत के मुख्य न्यायाधीश की व्यक्तिगत कार्यशैली पर निर्भर कर सकती है। लेकिन बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि किसी एक मुख्य न्यायाधीश ने दूसरे की तुलना में अधिक दृढ़ता दिखाई या नहीं।

असली मुद्दा यह है कि संवैधानिक अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की जिम्मेदारी संभालने वाली व्यवस्था के पास अपने विचार-विमर्श को संचालित करने के लिए पर्याप्त रूप से सुसंगत और पारदर्शी प्रक्रिया नहीं है।

Justice Kaul Bookन्यायमूर्ति कौल की टिप्पणियां कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। लेकिन सुधारों का अर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार सरकार को सौंपना या एनजेएसी को उसी स्वरूप में दोबारा लागू करना नहीं होना चाहिए, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने निरस्त कर दिया था।

सुधारों का अर्थ होना चाहिए—पात्रता के मानदंडों का सार्वजनिक किया जाना, मूल्यांकन की प्रक्रिया का दस्तावेजीकरण, सुसंगत और तर्कसंगत निर्णयों का रिकॉर्ड, न्यायाधीशों के स्थानांतरण के लिए स्पष्ट रूपरेखा और शिकायतों के निवारण की पारदर्शी व्यवस्था।

कॉलेजियम की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इन सुरक्षा उपायों को अपनी व्यवस्था का स्थायी हिस्सा बनाने में कितना सफल होता है। हालांकि, न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका को अधिक शक्ति या प्रभाव सौंपने के किसी भी प्रयास का विरोध किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे उस संस्था की विश्वसनीयता को गंभीर चोट पहुंच सकती है, जिसे आज भी अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। Punjab Today Logo
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