October 9, 2026

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न्यायिक बहस

अदालत में विचाराधीन मामलों पर टिप्पणी

अदालत में लंबित मामलों पर सार्वजनिक बहस केवल इस आधार पर प्रतिबंधित नहीं होती

न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां, जो सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश हैं, ने पिछले रविवार, 4 अक्टूबर 2026, हैदराबाद स्थित NALSAR में आयोजित एक मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा लाखों भारतीय मतदाताओं को कथित रूप से मताधिकार से वंचित किए जाने के मुद्दे पर कड़ी टिप्पणी की।

उन्होंने ECI द्वारा की जा रही SIR (Special Intensive Revision — विशेष गहन पुनरीक्षण) पर भी सवाल उठाए।

न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि संविधान नागरिकों के दो वर्गों की कल्पना नहीं करता—एक वे जिनके पास मतदान का अधिकार है और दूसरे वे जिनके पास यह अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि कोई प्रक्रिया बड़े पैमाने पर लोगों को मताधिकार से वंचित करती है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 326 और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा।

Justice Ujjal Bhuyan

न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां

उन्होंने कहा कि यदि किसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप “लाखों-लाखों भारतीय नागरिकों को मताधिकार से वंचित” किया जाता है और उन्हें “अपने ही देश में दूसरे दर्जे का नागरिक” बना दिया जाता है, तो ऐसी प्रक्रिया अपने आप में मनमानी होगी और उसे सही ठहराने के लिए “no amount of whataboutery” पर्याप्त नहीं हो सकती।

उनके अनुसार, ऐसी प्रक्रिया संविधान के मूल स्वरूप पर प्रहार करेगी और संवैधानिक व्यवस्था के निषेध के समान होगी।

न्यायमूर्ति भुइयां ने मतदान के अधिकार के संवैधानिक महत्व पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी नागरिक का मतदाता होना और मतदान करना “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की नींव” है।

उन्होंने आगे कहा कि मतदान का अधिकार अथवा मतदाता सूची में शामिल होने का अधिकार किसी भारतीय नागरिक की पहचान और व्यक्तित्व से अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसकी तुलना “शरीर से आत्मा निकाल लेने” से की।

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 326 और Representation of the People Act की धारा 22 का भी उल्लेख किया और कहा कि किसी मृत मतदाता को छोड़कर, एक बार मतदाता सूची में नाम दर्ज हो जाने के बाद उसे बिना नोटिस दिए और सुनवाई का अवसर दिए हटाया नहीं जा सकता।

न्यायमूर्ति भुइयां ने भारत में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के इतिहास और संविधान सभा की बहसों का भी उल्लेख किया, जिसमें डॉ. बी. आर. आंबेडकर के विचार भी शामिल थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार आम नागरिक के प्रति विश्वास का प्रतीक था और भारत द्वारा अपनाई गई लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का एक अनिवार्य तत्व है।

Justice B R Gavai

न्यायाधीश बी. आर. गवई

कई सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, जिनमें भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं, ने न्यायमूर्ति भुइयां के भाषण पर आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि जिन मुद्दों पर न्यायमूर्ति भुइयां ने टिप्पणी की, वे सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन हैं और sub judice हैं।

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई ने कहा कि उनके विचार में “judicial discipline and propriety” अर्थात न्यायिक अनुशासन और औचित्य किसी वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश को सर्वोच्च न्यायालय अथवा किसी अन्य न्यायालय के समक्ष लंबित मामलों पर सार्वजनिक रूप से बोलने की अनुमति नहीं देते।

इसी आधार पर उन्होंने SIR के मुद्दे पर न्यायमूर्ति भुइयां की सार्वजनिक टिप्पणियों को अनुचित माना।

अन्य सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने भी न्यायमूर्ति भुइयां की आलोचना की। उनमें से एक ने सवाल उठाया कि क्या SIR की प्रक्रिया को वास्तव में मताधिकार से वंचित करना कहा भी जा सकता है। एक अन्य ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के किसी वर्तमान न्यायाधीश को ऐसे मुद्दे पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए जो उसी न्यायालय के समक्ष लंबित हो।

क्या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों द्वारा न्यायमूर्ति भुइयां की आलोचना उचित है?

मेरा मानना है कि यह उचित नहीं है।

भारतीय सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों से यह सिद्धांत स्थापित है कि यदि किसी लंबित मामले पर की गई टिप्पणी न्यायिक कार्यवाही को प्रभावित कर सकती है, अदालत को बदनाम कर सकती है या न्याय प्रशासन में किसी अन्य प्रकार से हस्तक्षेप कर सकती है, तो वह अदालत की अवमानना (contempt of court) की श्रेणी में आ सकती है।

लेकिन सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर टिप्पणी करना केवल इसलिए प्रतिबंधित नहीं हो जाता कि मामला अदालत में लंबित है।

इस संबंध में Wikimedia Foundation Inc. vs ANI Media Pvt. Ltd., 2025 में भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय के पैरा 30 में कहा:

“हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर जनता और प्रेस द्वारा जोरदार बहस की जानी चाहिए, भले ही बहस का विषय किसी अदालत के समक्ष विचाराधीन (sub judice) हो।”

इसी निर्णय में न्यायालय ने आगे कहा:

“अदालतें, एक सार्वजनिक और खुली संस्था के रूप में, हमेशा सार्वजनिक टिप्पणियों, बहस और आलोचना के लिए खुली रहनी चाहिए। वास्तव में, अदालतों को बहस और रचनात्मक आलोचना का स्वागत करना चाहिए।”

सर्वोच्च न्यायालय के कई पुराने निर्णयों में भी यही दृष्टिकोण अपनाया गया है।

इसी प्रकार, Sahara India Real Estate Corporation Ltd vs Securities and Exchange Board of India, 2012 में संविधान पीठ ने कहा कि sub judice rule के तहत किसी लंबित मामले पर टिप्पणी तभी प्रतिबंधित हो सकती है जब उससे न्यायिक कार्यवाही अथवा न्याय प्रशासन पर “वास्तविक और पर्याप्त जोखिम” (real and substantial risk) पैदा हो।

साथ ही, संविधान पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालतें सार्वजनिक संस्थाएं हैं और उन्हें सार्वजनिक बहस तथा आलोचना के लिए हमेशा खुला रहना चाहिए।

इसलिए महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी मामले का sub judice होना अपने-आप में यह अर्थ नहीं रखता कि उस विषय पर सार्वजनिक रूप से चर्चा या आलोचना नहीं की जा सकती।

असल सवाल यह है कि संबंधित टिप्पणी से न्यायिक कार्यवाही के प्रभावित होने या न्याय प्रशासन में अन्यथा हस्तक्षेप होने का वास्तविक और पर्याप्त जोखिम पैदा होता है या नहीं।

Supreme Court Sir

निश्चित रूप से, भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा लाखों मतदाताओं को कथित रूप से अवैध तरीके से मताधिकार से वंचित किए जाने का आरोप और निर्वाचन आयोग द्वारा कराए जा रहे SIR (Special Intensive Revision) को अवैध बताए जाने का मुद्दा सार्वजनिक महत्व का विषय है। ऐसे विषय पर टिप्पणी करने से कोई पूर्वाग्रह या न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का जोखिम उत्पन्न नहीं होता।

इसलिए, भले ही मामला sub judice हो, जनता इन मुद्दों पर स्वतंत्र रूप से टिप्पणी कर सकती है।

वास्तव में, न्यायमूर्ति भुइयां संविधान के उन सिद्धांतों के बारे में बोल रहे थे जो मतदान के अधिकार, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार तथा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों से संबंधित हैं।

ये अत्यंत महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दे हैं।

उनकी टिप्पणियां मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीशों को प्रभावित करने के उद्देश्य से नहीं थीं और न ही वे न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करने का प्रयास थीं।

निश्चित रूप से, न्यायमूर्ति भुइयां सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश होने के नाते उस मामले की सुनवाई करने वाली पीठ का हिस्सा नहीं होना चाहिए। लेकिन इसके अलावा उन्हें उस मुद्दे पर टिप्पणी करने का अधिकार है।

इसलिए मुझे आश्चर्य है कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश, जिनमें पूर्व CJI न्यायमूर्ति गवई भी शामिल हैं, इस बिंदु पर कानून को नहीं जानते। Punjab Today Logo
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