इस वर्ष मई में पेपर लीक के खिलाफ शुरू हुआ छात्र विरोध और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का उभार अब कथित ‘वोट चोरी’ के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन का रूप ले चुका है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहा यह आंदोलन अब मोदी सरकार के राजनीतिक भविष्य के लिए भी चुनौती बनता दिखाई दे रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम ने शब्दों और विचारों के स्तर पर चल रही राजनीतिक लड़ाई की दिशा भी बदल दी है। अधिकांश लोगों का ध्यान भले ही इस बदलाव पर न गया हो, लेकिन लगभग 2012 से भाजपा-आरएसएस का तंत्र राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने और उसके माध्यम से जनमानस को प्रभावित करने में प्रभावी भूमिका निभाता रहा है।
इसी तंत्र ने यह धारणा स्थापित करने में सफलता पाई कि मनमोहन सिंह की सरकार नीतिगत निष्क्रियता का शिकार थी, भ्रष्टाचार व्यापक था और राहुल गांधी एक अपरिपक्व नेता थे, जिन्हें ‘पप्पू’ कहकर खारिज किया जा सकता था।
भाजपा-आरएसएस से जुड़े विचारकों और रणनीतिकारों ने उभरते सोशल मीडिया मंचों का प्रभावी इस्तेमाल करते हुए कमजोर और रक्षात्मक स्थिति में दिख रहे कांग्रेस नेतृत्व को निशाना बनाया। साथ ही, स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के शासन की विरासत पर भी लगातार सवाल उठाए गए।
अन्ना हजारे के नेतृत्व में चले इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन, सरकार के प्रति नरम रुख रखने वाले मीडिया के एक हिस्से, यथास्थितिवादी मध्यवर्ग और बड़े कारोबारी हितों के समर्थकों ने मिलकर डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के खिलाफ एक प्रभावशाली राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने में भूमिका निभाई।
नरेंद्र मोदी की विशाल जननेता वाली छवि और उनकी भाषण-कला ने विपक्ष के खिलाफ इस प्रचार अभियान में भाजपा-आरएसएस को शुरुआती बढ़त दिलाई।
इस अभियान का मुख्य निशाना कांग्रेस थी। ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का नारा इसी रणनीति का हिस्सा था। लेकिन निशाने पर केवल कांग्रेस ही नहीं थी। अन्य विपक्षी दलों के साथ-साथ वामपंथी और उदारवादी विचारधारा से जुड़े समूहों तथा समाज के वंचित वर्गों के सशक्तीकरण के लिए काम करने वाले नागरिक संगठनों को भी लगातार निशाना बनाया गया।
मोदी सरकार के विरोधियों के खिलाफ इस अभियान को सरकारी तंत्र का भी समर्थन मिला। प्रवर्तन निदेशालय (ED), केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI), पुलिस और नौकरशाही पर सत्ता प्रतिष्ठान के निर्देशों के अनुसार काम करने के आरोप लगते रहे। सरकार समर्थक मीडिया के एक हिस्से और निचली न्यायपालिका की निष्पक्षता पर उठे सवालों ने भी इस राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया।
मोदी सरकार की राजनीतिक पकड़ में दरारें 2016 में नोटबंदी और जल्दबाजी में लागू की गई जीएसटी व्यवस्था के बाद दिखाई देने लगी थीं। नोटबंदी को व्यापक आर्थिक नुकसान पहुंचाने वाला कदम माना गया, जबकि जीएसटी के क्रियान्वयन को लेकर भी गंभीर सवाल उठे। हालांकि, असंतोष की यह धीमी प्रक्रिया चुनावी परिणामों में स्पष्ट रूप से दिखाई देने में आठ वर्ष और ले गई।
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा, जो 400 से अधिक सीटें जीतने का दावा कर रही थी, अपने दम पर स्पष्ट बहुमत भी हासिल नहीं कर सकी और उसे सरकार बनाने के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर रहना पड़ा।
इस वर्ष हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने भले ही अच्छा प्रदर्शन किया हो, लेकिन समाज में सुलग रहा असंतोष जल्द ही ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ा। यह कहा जा सकता है कि मोदी सरकार ने मई में नीट पेपर लीक और परीक्षा परिणाम रद्द किए जाने से उपजे युवा असंतोष के राजनीतिक महत्व को गंभीरता से नहीं समझा।
चुनावी जीतों से उत्साहित और हर कदम की प्रशंसा करने वाले अपने समर्थक तंत्र से घिरी भाजपा का नेतृत्व शायद यह मान बैठा था कि देश में सब कुछ ठीक चल रहा है।
भाजपा-आरएसएस के नैरेटिव की पकड़ कमजोर पड़ रही है
मोदी सरकार के प्रति आम लोगों की धारणा में बदलाव के साथ राजनीतिक नैरेटिव भी बदलता दिखाई दे रहा है। भाजपा के आईटी सेल का प्रचार अब पहले जैसी विश्वसनीयता और प्रभाव नहीं रखता। सरकार समर्थक मीडिया संस्थानों की साख और दर्शक-वर्ग पर भी सवाल उठने लगे हैं।
कांग्रेस पर किए जाने वाले हमले अब पहले जितने प्रभावशाली नहीं रहे। राहुल गांधी को केवल एक अनुभवहीन या अपरिपक्व नेता बताकर खारिज करना भी पहले जितना आसान नहीं रह गया है।
मुस्लिम-विरोधी बयानबाजी के सहारे हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने और हिंदुओं के खतरे में होने का बार-बार दावा करने की रणनीति पर भी लोग सवाल उठाने लगे हैं।
नरेंद्र मोदी की भाषण-कला, जो कभी उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत मानी जाती थी, अब अपना कुछ प्रभाव खोती दिखाई दे रही है। ‘नाराज फूफा’ और ‘अर्बन नक्सल’ जैसे नए राजनीतिक विशेषण गढ़ने के बावजूद पुराने प्रचार के तरीके पहले जितने कारगर नहीं दिखते।
इसके विपरीत, पूरे विपक्ष की ओर से लगाए जा रहे ‘वोट चोरी’ के आरोप, राहुल गांधी के तंज, नेहा राठौर की व्यंग्यात्मक प्रस्तुतियां और धारदार लोकगीत लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। पुलिस कार्रवाई का सामना कर रहे युवा प्रदर्शनकारियों के गुस्से से भरे, आक्रामक और कभी-कभी अभद्र माने जाने वाले नारे भी मीडिया और सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा का विषय बन रहे हैं।
विपक्षी नेताओं और स्वतंत्र मीडिया ने देर से ही सही, सोशल मीडिया की तकनीकों का प्रभावी इस्तेमाल करना सीख लिया है। इसका भाजपा-आरएसएस के राजनीतिक तंत्र पर असर पड़ रहा है। उसके विरोधी पुराने वीडियो निकालकर सोशल मीडिया पर साझा कर रहे हैं, जिससे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को असहज स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।
जंतर-मंतर पर युवा आंदोलन के तेज होने और सोनम वांगचुक के अनशन से उसे बल मिलने के बावजूद मोदी सरकार ने शुरुआत में इसे मामूली घटना मानकर नजरअंदाज किया। लेकिन जैसे-जैसे विरोध व्यापक आंदोलन में बदलने लगा, सरकार की प्रतिक्रिया उदासीनता से सख्ती और दमन की ओर बढ़ती दिखाई दी।
गृह मंत्री अमित शाह द्वारा आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए पुलिस बल पर कथित निर्भरता राजनीतिक रूप से उलटी पड़ती दिखाई दी। इसके बाद 20 जुलाई को सत्तारूढ़ दल को एक बड़ा झटका लगा और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की नौबत आई।
उम्मीद की जा सकती थी कि सरकार इस अनुभव से सबक लेगी और अपने रवैये पर पुनर्विचार करेगी। लेकिन युवा प्रदर्शनकारियों को डराने और असहमति की आवाजों को दबाने के प्रयास जारी रहे। हालांकि, एक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि भाजपा के पारंपरिक राजनीतिक हथियार अब पहले जितने प्रभावी नहीं रह गए हैं।
राष्ट्रवाद और सत्ता परिवर्तन: भाजपा के नए राजनीतिक हथियार
भाजपा-आरएसएस का राजनीतिक तंत्र अब दो ऐसे मुद्दों का सहारा ले रहा है, जिनसे उसे जनमानस को प्रभावित करने की उम्मीद है। ये हैं राष्ट्रवाद और सत्ता परिवर्तन।
इस रणनीति के पीछे यह सोच दिखाई देती है कि सत्ता परिवर्तन की चर्चा से यथास्थिति में विश्वास रखने वाला मध्यवर्ग चिंतित हो सकता है। जनमत को प्रभावित करने में इस वर्ग की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। दूसरी ओर, राष्ट्रवाद की भावनात्मक अपील के जरिए युवा प्रदर्शनकारियों को मौजूदा आंदोलन से दूर करने की कोशिश की जा सकती है।
लेकिन यह रणनीति एक गहरे राजनीतिक संकट की ओर भी संकेत करती है। भाजपा का नेतृत्व शायद यह समझने में असफल हो रहा है कि देश में राजनीतिक चेतना और नागरिकों की अपेक्षाएं किस तरह बदल रही हैं।

मोहन भागवत
मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने अपने विजयादशमी संबोधनों में राष्ट्रवाद और सत्ता परिवर्तन के मुद्दों को जिस तरह उठाया है, उससे यह संभावना कम ही दिखाई देती है कि ये दोनों मुद्दे विरोधियों के साथ चल रही नैरेटिव की लड़ाई में भाजपा को निर्णायक बढ़त दिला पाएंगे।
दशकों से भाजपा-आरएसएस का तंत्र राष्ट्रवाद की एक खास परिभाषा स्थापित करने का प्रयास करता रहा है, जिसमें मुस्लिम-विरोध और पाकिस्तान के प्रति शत्रुता को प्रमुख स्थान दिया गया है।
लेकिन इंटरनेट के माध्यम से राजनीतिक जानकारी हासिल करने वाली नई पीढ़ी को यह परिभाषा पहले की तरह प्रभावित नहीं कर पा रही है। यह पीढ़ी राजनीतिक दलों, विचारधारात्मक संगठनों या पारंपरिक मीडिया पर निर्भर नहीं है, जिनका कभी राजनीतिक विमर्श पर काफी नियंत्रण था।
युवा प्रदर्शनकारियों की राजनीतिक समझ, उनके नारे, अभियानों की सामग्री और मीडिया के साथ उनकी बातचीत से संकेत मिलता है कि वे राष्ट्रवाद को देश को एकजुट करने वाली शक्ति के रूप में देखते हैं। साथ ही, वे यह भी समझते हैं कि जब किसी नागरिक की राष्ट्रभक्ति को उसके धर्म, सांस्कृतिक पहचान या राजनीतिक निष्ठा के आधार पर परखा जाने लगता है, तो राष्ट्रवाद देश को बांटने का माध्यम भी बन सकता है।
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) से जुड़े नेता और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की नेहा बोरा ऐसे सवाल उठा रहे हैं, जो सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान को असहज कर सकते हैं: राष्ट्रवाद आखिर है क्या? इसे परिभाषित करने का अधिकार किसे है? और भारत के प्रति किसी नागरिक की प्रतिबद्धता को किन मानकों पर परखा जाना चाहिए?
क्या भाजपा अपना खोया हुआ राजनीतिक नैरेटिव वापस हासिल कर पाएगी?
युवा प्रदर्शनकारियों का मानना है कि लोकतंत्र में राष्ट्रवाद का आकलन भारत की संप्रभुता के प्रति प्रतिबद्धता, संविधान के सम्मान, नागरिकों की समानता, लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा और साथी नागरिकों के प्रति जिम्मेदारी के आधार पर होना चाहिए।
इसलिए वे राष्ट्रवाद को खारिज नहीं कर रहे हैं। वे उसकी अधिक समावेशी व्याख्या की मांग कर रहे हैं, जिसमें हर नागरिक को समान स्थान मिले और राष्ट्रभक्ति साबित करने के लिए किसी को अपनी धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान के आधार पर परीक्षा न देनी पड़े।
सत्ता परिवर्तन के मुद्दे पर भी यही बात लागू होती है। लोकतंत्र में संवैधानिक और चुनावी प्रक्रियाओं के माध्यम से सरकार का बदलना न तो कोई राष्ट्रीय आपदा है और न ही देश के प्रति अवफादारी का संकेत। यह जनतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है।
ऐसे में भाजपा सरकार के लिए जनमानस में अपना खोया हुआ नैरेटिव वापस हासिल करना आसान नहीं दिखता।
अमेरिका और पश्चिमी देशों की राजधानियों में मोदी-विरोधी तथा ‘वोट चोरी’ के नारे लगाती भीड़ के दृश्य भी मोदी सरकार को लेकर धारणाओं को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे माहौल में भाजपा-आरएसएस के राजनीतिक तंत्र के लिए लोकप्रिय विमर्श के मैदान में फिर से लौटकर निर्णायक जीत हासिल करना बेहद कठिन हो सकता है। ![]()
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