विधानसभा चुनाव में एक साल से भी कम समय शेष है। सत्ता विरोधी लहर और संगठनात्मक कमजोरियों से भारी राजनीतिक कीमत चुकाने से पहले कांग्रेस सभी 68 विधानसभा क्षेत्रों में अपने जमीनी नेटवर्क को फिर से सक्रिय करने की जद्दोजहद में जुटी है।
हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के लिए अब घड़ी की सुइयां केवल समय का संकेत नहीं दे रहीं, बल्कि खतरे की घंटी बजा रही हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव में एक साल से भी कम समय शेष रहते हुए सरकार के सामने सत्ता विरोधी लहर एक घने तूफान की तरह मंडरा रही है। वहीं, सरकार और पार्टी संगठन के बीच गहरी खाई इस तूफान को एक बड़े राजनीतिक संकट में बदलने की आशंका पैदा कर रही है।
केवल नारे और आश्वासन भरे बयान इस लहर को नहीं रोक सकते। राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने के लिए जमीन पर ठोस काम करना होगा, जमीनी संगठन को फिर से सक्रिय और संघर्ष के लिए तैयार करना होगा तथा ऐसा नेतृत्व सामने लाना होगा जो सरकार और संगठन को एक दिशा में काम करने के लिए मजबूर कर सके। कांग्रेस के पास अपनी कमियां दूर करने के लिए बचा समय तेजी से समाप्त हो रहा है।
सभी 68 विधानसभा क्षेत्रों तक अभियान पहुंचाने का निर्णय इस बात को स्वीकार करने जैसा है कि केवल शिमला में बैठकर सत्ता नहीं बचाई जा सकती। असली मुकाबला गांवों की धूल भरी गलियों, पंचायतों के आंगनों और छोटे शहरों की भीड़भाड़ वाली सड़कों पर लड़ा जाएगा। मतदाता सरकार का आकलन आधिकारिक दावों के आधार पर नहीं, बल्कि अपने रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देने वाले बदलावों के आधार पर करेंगे।
कभी-कभार बैठकें करना और जल्दबाजी में समीक्षा बैठकें आयोजित करना अब चुनावी तैयारी का विकल्प नहीं हो सकता। पार्टी को ऐसे जीवंत संगठनात्मक तंत्र की जरूरत है जो सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाए, लोगों की शिकायतों को सामने लाए और कार्यकर्ताओं को आगामी राजनीतिक लड़ाई के लिए तैयार करे।
हिमाचल प्रदेश के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) की प्रभारी राजनी पाटिल द्वारा हाल ही में घोषित ‘मिशन रिपीट’ इसलिए महज चुनावी नारा नहीं, बल्कि संगठन को आखिरी मौके पर दुरुस्त करने की कोशिश है। निर्णायक सवाल यह है कि क्या कांग्रेस भाजपा के अपनी रणनीति तेज करने और राजनीतिक हमला बोलने से पहले इस तैयारी को एक संगठित राजनीतिक ताकत में बदल पाएगी?
पार्टी संगठन को जमीनी स्तर तक पहुंचाना
रजनी पाटिल ने इस लेखक के साथ बातचीत में स्पष्ट किया है कि चुनावी तैयारी तभी प्रभावी हो सकती है, जब सरकार और पार्टी संगठन मिलकर काम करें। जिला अध्यक्षों और अन्य पदाधिकारियों के साथ उनकी हालिया बैठकों का मुख्य उद्देश्य संगठन की वास्तविक सक्रियता का आकलन करना और उन इकाइयों की पहचान करना रहा है, जिन्हें तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।

रजनी पाटिल
जिला नेताओं से अपेक्षा है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय और जनता के बीच दिखाई दें। निष्क्रिय रहने वाले पदाधिकारियों को ऐसे कार्यकर्ताओं के लिए रास्ता छोड़ना पड़ सकता है, जो जरूरी समय और मेहनत देने के लिए तैयार हों। यह समीक्षा इसलिए जरूरी है ताकि कांग्रेस कागजों तक सीमित ढांचे और वास्तव में लोगों को संगठित करने में सक्षम संगठन के बीच अंतर कर सके।
यह अंतर महत्वपूर्ण है। संगठन के प्रत्येक स्तर पर पदाधिकारियों की मौजूदगी का कोई विशेष अर्थ नहीं, यदि वे सरकारी नीतियों को समझा नहीं सकते, स्थानीय उपलब्धियों को सामने नहीं ला सकते, जनता की नाराजगी को पहचान नहीं सकते और लोगों की प्रतिक्रिया नेतृत्व तक नहीं पहुंचा सकते।
इन कड़ियों के कमजोर होने पर अच्छा रिकॉर्ड रखने वाली सरकार भी राजनीतिक रूप से अलग-थलग पड़ सकती है। हिमाचल में मौजूदा स्थिति इसी खतरे की ओर संकेत करती है।
सचिवालय और मतदान केंद्र के बीच की दूरी पर ही अक्सर चुनावी समीकरण बदलते हैं। प्रशासनिक फैसले अपने आप राजनीतिक समर्थन में नहीं बदल जाते। उनके लाभ जनता को दिखाई देने चाहिए, लोगों को उनकी जानकारी होनी चाहिए और एक विश्वसनीय संगठन को उन्हें जनता तक पहुंचाना चाहिए।
साथ ही, पार्टी और सरकार को अपनी कमियों को स्वीकार करने के लिए भी तैयार रहना होगा। कार्यकर्ताओं से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे हर फैसले का बचाव करें, भले ही उनके पास उसे समझाने के लिए कोई ठोस जवाब न हो।
पाटिल के लिए असली परीक्षा यह होगी कि मिशन रिपीट पूरे प्रदेश में संगठनात्मक स्तर पर वास्तविकता बनता है या चुनाव से पहले घोषित एक और नारे तक सीमित रह जाता है।
सरकार और पार्टी संगठन के बीच की खाई पाटना
राज्य कांग्रेस नेतृत्व में बदलाव और 22 नवंबर, 2025 को विनय कुमार के प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष का पद संभालने से पार्टी संगठन और मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनाने का अवसर मिला है। पहले इस तरह के तालमेल की स्पष्ट कमी दिखाई देती थी। आने वाले महीनों में यह महत्वपूर्ण होगा कि विनय कुमार, पाटिल के सहयोग से, इस अवसर का कितना प्रभावी इस्तेमाल कर पाते हैं।

सुखविंदर सिंह सुक्खू
सरकार और पार्टी संगठन की भूमिकाएं अलग-अलग हैं, लेकिन एक-दूसरे की पूरक हैं। प्रशासन का काम नीतियां बनाना और सरकारी सेवाओं को जनता तक पहुंचाना है। दूसरी ओर, पार्टी संगठन नागरिकों के संपर्क में रहता है, सरकारी फैसलों को समझाता है, उभरती समस्याओं की पहचान करता है और नेतृत्व को बताता है कि किन क्षेत्रों में सरकारी हस्तक्षेप प्रभावी नहीं हो रहा है। जब दोनों अलग-अलग दिशाओं में काम करते हैं, तो उनकी प्रभावशीलता कमजोर पड़ जाती है।
पाटिल ने अनुशासन की आवश्यकता पर जोर दिया है, लेकिन साथ ही यह भी स्वीकार किया है कि किसी बड़े राजनीतिक दल में मतभेद होना स्वाभाविक है। जिला अध्यक्षों ने ब्लॉक इकाइयों के साथ समन्वय को लेकर चिंताएं जताई हैं और नेतृत्व ने माना है कि इन समस्याओं का समाधान जरूरी है। देखने में सामान्य लगने वाली ये शिकायतें उस समय संगठन की ताकत को धीरे-धीरे कमजोर कर सकती हैं, जब उसे सबसे अधिक मजबूत होने की आवश्यकता है।
अनुशासनहीनता के खिलाफ दृढ़, लेकिन निष्पक्ष रवैया व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता को चुनावी कमजोरी बनने से रोक सकता है। हालांकि, अनुशासन का अर्थ वैध आलोचना को दबाना नहीं होना चाहिए। प्रशासनिक विफलताओं या स्थानीय स्तर पर जनता की नाराजगी को पहचानने वाले कार्यकर्ताओं के पास अपनी बात नेतृत्व तक पहुंचाने के विश्वसनीय माध्यम होने चाहिए।
कांग्रेस को आंतरिक बहस की गुंजाइश बनाए रखनी होगी, लेकिन हर असहमति को मीडिया में सार्वजनिक विवाद बनने से रोकना होगा। विपक्ष ऐसे विवादों को पार्टी की एकता में दरार के रूप में पेश करने का अवसर तलाशता रहेगा। मतभेदों को संवाद और संगठनात्मक प्रक्रियाओं के जरिए सुलझाया जा सकता है, जबकि उन्हें सार्वजनिक रूप से उछालने से विरोधियों को ही फायदा होता है।
अब कांग्रेस को साबित करना होगा कि समन्वय केवल भाषणों और बैठकों तक सीमित नहीं है। इसे नियमित विचार-विमर्श, स्पष्ट निर्णयों, जिम्मेदारियों के उचित बंटवारे और एक सुसंगत राजनीतिक संदेश के रूप में दिखाई देना चाहिए।
चुनावी वादों को ठोस नतीजों में बदलना
एक मजबूत संगठन सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचा सकता है, लेकिन वह ऐसे रिकॉर्ड की कमियों को छिपा नहीं सकता जो जनता की अपेक्षाओं पर खरा न उतरे। कांग्रेस के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है।
2027 के चुनाव नजदीक आने के साथ मतदाता चुनावी गारंटियों और वास्तव में लागू की गई योजनाओं के बीच अंतर करने लगेंगे। रोजगार, सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति, विकास कार्य, कल्याणकारी योजनाएं और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की सरकार की क्षमता उसके प्रदर्शन के आकलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
सरकार को उन वादों की पहचान करनी चाहिए जिन्हें अभी पूरा किया जाना बाकी है और उन्हें पूरा करने के लिए व्यावहारिक समय-सीमा तय करनी चाहिए। चुनाव जितने नजदीक आएंगे, सामान्य आश्वासनों का महत्व उतना ही कम होता जाएगा। लोग अपने क्षेत्र में बदलाव के ठोस प्रमाण देखना चाहेंगे।
रोजगार के मुद्दे पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। युवा मतदाता आम तौर पर राजनीतिक दलों का आकलन सरकारी योजनाओं की भाषा से नहीं, बल्कि अपने सामने उपलब्ध रोजगार के अवसरों से करते हैं। भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और रोजगार के सीमित अवसर युवाओं में निराशा पैदा कर रहे हैं। विपक्ष इस असंतोष को सरकार की नाकामी की व्यापक कहानी में बदल सकता है।
सार्वजनिक सेवाएं और बुनियादी ढांचा भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। पहाड़ी राज्य में सड़कें, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, स्थानीय सुविधाएं और आपदा से निपटने की तैयारी सीधे लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं। सरकार को इन क्षेत्रों में प्रगति दिखाने के साथ-साथ उन बाधाओं के बारे में भी ईमानदारी से बताना होगा, जिनके कारण काम में देरी हुई है।
पार्टी संगठन की जिम्मेदारी वास्तविक उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाना है, न कि एक ऐसी तस्वीर पेश करना जो जमीनी हकीकत से मेल न खाती हो। जहां कामकाज में देरी हुई है, वहां कार्यकर्ताओं को स्पष्ट जवाब मिलने चाहिए कि समस्या कहां आई और उसे दूर करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। जो पार्टी कठिन सवालों का सामना नहीं कर सकती, उसके लिए असंतुष्ट मतदाताओं को अपने पक्ष में करना मुश्किल होगा।
प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र की अलग रणनीति
सभी 68 विधानसभा क्षेत्रों पर संगठनात्मक ध्यान केंद्रित करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिमाचल प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य एक जैसा नहीं है। प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र की अपनी स्थानीय नेतृत्व व्यवस्था, सामाजिक समीकरण, विकास संबंधी प्राथमिकताएं, प्रभावशाली समूह और लंबे समय से चली आ रही शिकायतें हैं।
प्रदेश स्तर का एक साझा राजनीतिक संदेश दिशा तय कर सकता है, लेकिन वह विधानसभा क्षेत्रों में लगातार किए जाने वाले जमीनी काम का विकल्प नहीं बन सकता। कांग्रेस को पहचानना होगा कि किन क्षेत्रों में उसका संगठन अभी भी मजबूत है, कहां कार्यकर्ता निष्क्रिय हो गए हैं, किन जगहों पर स्थानीय नेताओं के बीच मतभेद हैं और किन क्षेत्रों के मतदाताओं को लगता है कि उनकी अनदेखी की जा रही है।
यह आकलन केवल बैठकों की संख्या गिनने या पार्टी की औपचारिक ताकत का हिसाब लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह भी देखना होगा कि क्या कार्यकर्ता चुनावों के बीच भी लोगों के संपर्क में रहते हैं, क्या स्थानीय समस्याएं निर्णय लेने वाले नेतृत्व तक पहुंचती हैं और क्या सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तव में लक्षित लोगों तक पहुंच रहा है।
युवा मतदाताओं और राजनीतिक संवाद के बदलते तरीकों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। सोशल मीडिया पार्टी को सीधे जनता तक पहुंचने, आलोचना का तुरंत जवाब देने और पारंपरिक संगठनात्मक माध्यमों पर पूरी तरह निर्भर हुए बिना अपनी नीतियां समझाने में मदद कर सकता है।
हालांकि, डिजिटल संपर्क जमीनी मौजूदगी का केवल पूरक हो सकता है, उसका विकल्प नहीं। ऑनलाइन सक्रियता अपने आप वोटों में नहीं बदलती। इसके लिए विश्वसनीय और सक्रिय जमीनी संगठन भी जरूरी है।
अंततः मिशन रिपीट का मूल्यांकन प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में किए गए काम की गुणवत्ता के आधार पर होगा। जो पार्टी स्थानीय समस्याओं को समय रहते समझ लेती है, उसके पास अपनी रणनीति सुधारने का अवसर रहता है। लेकिन जो पार्टी को इन समस्याओं का पता चुनावी अभियान शुरू होने के बाद चलता है, उसके लिए मतदाताओं की नाराजगी को बदलना मुश्किल हो सकता है।
मंत्रिमंडल विस्तार और स्पष्टता की आवश्यकता
प्रस्तावित मंत्रिमंडल विस्तार अब केवल विभागों के बंटवारे का मामला नहीं रह गया है। चुनाव नजदीक आने के साथ मंत्रिमंडल में किसी नए सदस्य को शामिल करने या फेरबदल के फैसले को सरकार की प्राथमिकताओं, आंतरिक राजनीतिक समीकरणों और एकजुट टीम के रूप में काम करने की क्षमता के संकेत के तौर पर देखा जाएगा।
पाटिल ने कहा है कि मुख्यमंत्री सुक्खू ने अभी तक मंत्रिमंडल विस्तार के संबंध में पार्टी हाईकमान को औपचारिक प्रस्ताव नहीं भेजा है। यह स्थिति उस सार्वजनिक बयान से मेल नहीं खाती, जिसमें सुक्खू ने एक रैली के दौरान विधायक सुंदर सिंह को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने की बात कही थी। स्वतंत्रता दिवस के एक समारोह में लाहौल-स्पीति में सुंदर सिंह की हालिया भूमिका ने भी उनके मंत्रिमंडल में शामिल होने की अटकलों को बढ़ाया है।
सार्वजनिक संकेत और औपचारिक प्रस्ताव के बीच का अंतर अधिक स्पष्टता की जरूरत को रेखांकित करता है। मंत्रिमंडल से जुड़े फैसलों में प्रशासनिक जरूरतें, क्षेत्रीय संतुलन, राजनीतिक प्रबंधन और कार्यभार का बंटवारा शामिल होते हैं। ये फैसले उन विधायकों और कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को भी प्रभावित करते हैं, जो मानते हैं कि उनके योगदान को उचित पहचान मिलनी चाहिए।
चुनाव से पहले सीमित समय को देखते हुए सरकार को सामूहिक जिम्मेदारी और निर्णायक नेतृत्व की छवि पेश करनी होगी। मंत्री पदों को लेकर लंबे समय तक बनी अनिश्चितता आंतरिक मतभेदों की अटकलों को हवा दे सकती है और शासन से जुड़े अधिक जरूरी कामों से ध्यान भटका सकती है।
इसलिए मंत्रिमंडल विस्तार या फेरबदल का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि किसे मंत्री बनाया गया, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि क्या नई व्यवस्था प्रशासन को बेहतर बनाती है और सरकार की काम करने तथा वादे पूरे करने की क्षमता मजबूत करती है।
मुख्यमंत्री के कुछ करीबी नेताओं को सलाहकार के रूप में राजनीतिक समायोजन के तहत जगह दिए जाने पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। ऐसे फैसलों का उद्देश्य केवल अलग-अलग राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को साधना नहीं, बल्कि सरकार और संगठन के व्यापक हितों को पूरा करना होना चाहिए।
भाजपा तलाश रही है कांग्रेस की कमजोरियां
भाजपा कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरियों और अधूरे वादों को बिना चुनौती दिए नहीं छोड़ेगी। मुख्य विपक्षी दल के पास कई संभावित ताकतें हैं—प्रशिक्षित कार्यकर्ता, पर्याप्त संगठनात्मक संसाधन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े नेटवर्क और सत्ता विरोधी लहर का लाभ उठाने का अवसर।
भाजपा की चुनौती अलग-अलग शिकायतों को प्रदेशव्यापी राजनीतिक मुद्दे में बदलने की होगी। अधूरे वादे, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी, प्रशासनिक कमियां और आंतरिक मतभेदों के संकेत इस दावे के समर्थन में पेश किए जा सकते हैं कि सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी है। हालांकि, वित्तीय संकट के नारे मात्र से समाज में मौजूद असंतोष को पूरी तरह अपने पक्ष में बदलना संभव नहीं होगा। यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस इन मुद्दों का जवाब कैसे देती है।
भाजपा को भी यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि सत्ता विरोधी लहर अपने आप उसे सत्ता में वापस ले आएगी। उसे एक विश्वसनीय विकल्प पेश करना होगा, अपने संगठन को एकजुट रखना होगा और यह दिखाना होगा कि वह हिमाचल प्रदेश की विशिष्ट समस्याओं तथा जनता की जरूरतों को समझती है।
सरकार के प्रति असंतोष विपक्ष को फायदा पहुंचा सकता है, लेकिन उस असंतोष को बहुमत में बदलने के लिए प्रभावी चुनावी अभियान और विश्वसनीय नेतृत्व भी जरूरी है।
फिर भी कांग्रेस के लिए इस खतरे को कम करके आंकना बड़ी भूल होगी। जब मतदाताओं की नाराजगी के साथ संगठनात्मक कमजोरियां जुड़ जाती हैं, तो एक सक्रिय विपक्ष छोटी-सी कमी का भी बड़ा राजनीतिक लाभ उठा सकता है। सत्तारूढ़ दल को आने वाले महीनों का इस्तेमाल केवल अपने रिकॉर्ड का बचाव करने के बजाय कमजोरियों को दूर करने के लिए करना चाहिए।
सबसे जरूरी प्राथमिकता अब भी अधूरे चुनावी वादों को पूरा करना है। ठोस प्रगति पार्टी संगठन को जनता के सामने अपने पक्ष में मजबूत तर्क रखने का अवसर देगी। इसके विपरीत, अगर सरकारी कामकाज असमान और अधूरा रहा, तो एक सक्रिय चुनावी अभियान भी राजनीतिक वादों और लोगों के वास्तविक अनुभवों के बीच की खाई को पाटने में संघर्ष करेगा।
मिशन रिपीट की असली परीक्षा शिमला से बाहर
कांग्रेस के पास अपनी चुनावी स्थिति सुधारने के लिए अभी समय है, लेकिन इस समय का इस्तेमाल उद्देश्यपूर्ण ढंग से करना होगा। तीन चीजों को एक साथ आगे बढ़ना होगा—ऐसी सरकार जो अपने काम के ठोस नतीजे दिखा सके, ऐसा संगठन जो मतदाताओं से लगातार जुड़ा रहे और ऐसा नेतृत्व जो आंतरिक मतभेदों को सुलझाते हुए एकता बनाए रखे।
इनमें से किसी एक क्षेत्र की कमजोरी पूरे प्रयास को कमजोर कर सकती है। जिन उपलब्धियों का सही ढंग से प्रचार नहीं होता, वे जनता की नजरों से ओझल रह सकती हैं। सक्रिय संगठन भी अधूरे वादों का अनिश्चितकाल तक बचाव नहीं कर सकता। इसी तरह, उचित रिकॉर्ड रखने वाली सरकार भी जनता का विश्वास खो सकती है, यदि उसकी सार्वजनिक छवि पर आंतरिक विवाद हावी हो जाएं।
सभी 68 विधानसभा क्षेत्रों पर पाटिल का जोर इन समस्याओं से निपटने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करता है। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि फैसलों को जमीन पर किस तरह लागू किया जाता है, न कि इस पर कि कितनी समीक्षा बैठकें हुईं या कितने बयान जारी किए गए।
जिला और ब्लॉक इकाइयों को वास्तव में सक्रिय होना होगा। विधानसभा क्षेत्रों की समस्याएं नेतृत्व तक पहुंचनी चाहिए और सरकारी विभागों को जनता की जायज शिकायतों पर अधिक तत्परता से कार्रवाई करनी होगी।
आने वाले महीने यह तय करेंगे कि मिशन रिपीट संगठन के नवीनीकरण का एक सतत अभियान बनता है या केवल समीक्षा बैठकों, नियुक्तियों और राजनीतिक आश्वासनों तक सीमित रह जाता है।
कांग्रेस को यह साबित करना होगा कि वह सत्ता में रहने की जिम्मेदारियों और चुनौतियों को समझती है। मतदाता केवल वादे नहीं, बल्कि प्रदर्शन चाहते हैं; केवल नेतृत्व नहीं, बल्कि अपनी समस्याओं के समय पर समाधान के लिए उपलब्धता भी चाहते हैं। उन्हें ऐसा पार्टी संगठन चाहिए जो जरूरत पड़ने पर वास्तव में काम करे।
कांग्रेस के लिए 2027 का विधानसभा चुनाव शिमला में बैठकर तय नहीं होगा। असली परीक्षा पूरे हिमाचल प्रदेश में होगी—उन विधानसभा क्षेत्रों में, जहां जनता की अपेक्षाओं का सामना सरकार के रिकॉर्ड से होगा और जहां मतदान के दिन पार्टी संगठन की प्रभावशीलता का अंतिम फैसला होगा। ![]()
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