युवाओं के आक्रोश में छिपा है आदर्शवाद, सामाजिक चेतना और न्याय की आकांक्षा का पुनर्जागरण
जंतर-मंतर पर युवाओं के आंदोलन को केवल जेन ज़ी का क्षणिक आक्रोश मानकर खारिज कर देना शायद एक बड़ी भूल होगी। यह आंदोलन कहीं गहरे असंतोष, वैचारिक बेचैनी और सामाजिक बदलाव की आकांक्षा का संकेत भी हो सकता है। इसके पीछे आदर्शवाद, सामाजिक न्याय और समानता की वे आकांक्षाएँ हो सकती हैं, जिन्हें पिछले कुछ दशकों में व्यक्तिगत सफलता और उपभोक्तावाद की दौड़ ने काफी हद तक पीछे धकेल दिया था।
इस आंदोलन को समझने के लिए केवल तत्कालीन घटनाओं, बेरोज़गारी, महँगाई या परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं होगा। इन समस्याओं ने निश्चित रूप से युवाओं के गुस्से को बढ़ाया है, लेकिन सवाल यह है कि वर्षों से मौजूद समस्याएँ अब अचानक इतने व्यापक और तीव्र आक्रोश का रूप क्यों ले रही हैं?
बिना किसी गंभीर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अध्ययन के इस पूरे घटनाक्रम को एक प्रचलित शब्द—‘जेन ज़ी’—से जोड़ देना आसान है। लेकिन जेन ज़ी तो पहले भी मौजूद थी। असली सवाल यह है कि यह गुस्सा अब क्यों फूट पड़ा है?
जंतर-मंतर के आंदोलन को नज़दीक से देखने वाले समझ सकते हैं कि केवल किसी शब्द के इस्तेमाल या किसी एक घटना से इतने व्यापक और लंबे समय तक चलने वाले जन-आंदोलन का जन्म नहीं होता। इसके पीछे निश्चित रूप से कुछ और भी काम कर रहा है।
महँगाई, बेरोज़गारी और परीक्षाओं में अनियमितताओं ने इस आक्रोश को हवा दी है, लेकिन ये समस्याएँ नई नहीं हैं। वे वर्षों से मौजूद हैं। फिर ऐसा क्या हुआ कि वे अचानक विस्फोटक रूप लेने लगीं?
इस आंदोलन में कुछ ऐसा है जिसने इसे स्वतंत्र भारत में देखे गए अनेक जन-आंदोलनों की तुलना में व्यापकता, तीव्रता और टिकाऊपन के लिहाज़ से एक अलग पहचान दी है। यहाँ तक कि जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1974–75 में चले आंदोलन को भी वैसा स्वरूप और गति नहीं मिली थी, जैसी इस आंदोलन में दिखाई दे रही है।
इसलिए जंतर-मंतर के आंदोलन को केवल जेन ज़ी का स्वतःस्फूर्त गुस्सा मानकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। इसे आदर्शवाद, सामाजिक चेतना और समानतावादी आकांक्षाओं के संभावित पुनर्जागरण के रूप में समझने की ज़रूरत है।
युवाओं के आक्रोश और राजनीतिक असंतोष की गहरी जड़ें
इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यवस्था में ठहराव और निराशा ने इस आंदोलन को जन्म देने में भूमिका निभाई है। लेकिन यह ठहराव केवल आर्थिक या भौतिक नहीं है; यह वैचारिक भी है।
मुझे इस संदर्भ में अपने परिवार की एक घटना याद आती है। 1990 के दशक के आरंभ में मेरे एक चचेरे भाई ने, जो मुझसे लगभग 25 वर्ष छोटा था, बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि आंदोलन के आसपास चल रही बयानबाज़ी से प्रभावित होकर मुस्लिम-विरोधी विचार व्यक्त करने शुरू कर दिए थे।
मैंने उससे इस पर बात की और उसे याद दिलाया कि हमारे परिवार की परंपरा धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करने की रही है। हमारे वकील दादा ने एक मुस्लिम मुंशी को नौकरी पर रखा था, जिन्हें परिवार के सभी सदस्य लगभग बड़े-बुज़ुर्ग जैसा सम्मान देते थे। वे भी हम बच्चों के साथ अपने परिवार के बच्चों जैसा स्नेह रखते थे।
मेरी बात सुनकर मेरा चचेरा भाई आहत हुआ और चुप हो गया, लेकिन वह अपने विचारों से सहमत नहीं हुआ।
इस घटना ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि नई पीढ़ी के सामने केवल आर्थिक अवसरों और व्यक्तिगत सफलता का प्रश्न नहीं है। उसके सामने यह भी सवाल है कि वह किस विचारधारा, किस पहचान और किस सामाजिक उद्देश्य के साथ अपना भविष्य जोड़ना चाहती है।
मेरी पीढ़ी के युवावस्था के दिनों में समानता और सामाजिक न्याय के विचारों का एक अलग आकर्षण था। समाजवाद और मार्क्सवादी विचारधारा ने अनेक युवाओं को यह विश्वास दिया था कि समाज को अधिक न्यायपूर्ण और समानतापूर्ण बनाया जा सकता है। तब आदर्शवाद केवल व्यक्तिगत जीवन की सफलता तक सीमित नहीं था; वह समाज को बदलने की इच्छा से भी जुड़ा हुआ था।
बाद के दशकों में यह वैचारिक वातावरण धीरे-धीरे बदलने लगा। आर्थिक उदारीकरण, वैश्वीकरण और बाज़ार के विस्तार ने लोगों के सामने नए अवसर खोले। व्यक्तिगत उन्नति, बेहतर जीवन-स्तर और आर्थिक समृद्धि को सफलता के प्रमुख मानदंडों के रूप में देखा जाने लगा।
इस परिवर्तन ने लोगों के जीवन में कई सकारात्मक बदलाव किए। लेकिन इसके साथ ही सामूहिक हित, सामाजिक जिम्मेदारी और समानता जैसे सवाल धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श में पीछे छूटते गए।
उदारीकरण से उपभोक्तावाद तक: बदलती पीढ़ियों के सपने
1980 और 1990 के दशकों में बड़ी हुई पीढ़ी ने उदारीकरण और वैश्वीकरण के दौर में प्रवेश किया। उसके लिए बेहतर नौकरी, अधिक आय, निजी संपत्ति और आरामदायक जीवन की आकांक्षाएँ अधिक महत्त्वपूर्ण होती गईं।
इसके बाद सूचना प्रौद्योगिकी, इंटरनेट और मोबाइल क्रांति ने समाज को एक नए युग में पहुँचा दिया। आज के युवाओं के हाथ में ऐसी तकनीक है, जिसकी कल्पना पिछली पीढ़ियाँ नहीं कर सकती थीं। वे दुनिया भर की सूचनाओं तक तुरंत पहुँच सकते हैं, अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं और समान सोच वाले लोगों से जुड़ सकते हैं।

इन परिवर्तनों ने व्यक्तियों को अभूतपूर्व अवसर दिए। लेकिन उदारीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति की एक बड़ी सीमा भी थी। दोनों का प्रभाव मुख्यतः व्यक्ति-केंद्रित रहा। उन्होंने व्यक्तिगत उन्नति के लिए व्यापक अवसर तो उपलब्ध कराए, लेकिन समाज को समग्र रूप से देखने और उसके प्रति जिम्मेदारी महसूस करने की प्रेरणा अपेक्षाकृत कम दी।
इन परिवर्तनों ने भौतिक आकांक्षाओं को पूरा करने, दुनिया से जुड़ने और व्यक्तिगत जीवन को बदलने में मदद की। लेकिन सामाजिक जिम्मेदारी के प्रश्न पर उनका प्रभाव सीमित रहा।
कहावत है कि मनुष्य केवल रोटी के सहारे नहीं जीता।
जब भौतिक आकांक्षाएँ तेजी से उपभोग की संस्कृति से प्रभावित हो रही हों और इंटरनेट की दुनिया युवाओं की मुट्ठी में हो, तब भी आज के युवा व्यक्तिगत सफलता से आगे कुछ तलाशते दिखाई देते हैं। उन्होंने अपने माता-पिता से काफी हद तक राजनीति से दूर रहने वाली जीवनशैली विरासत में पाई है, लेकिन अब वे उसकी सीमाओं को भी समझने लगे हैं।
उनके पास पिछली पीढ़ियों की तुलना में अधिक वस्तुएँ, अधिक सूचनाएँ और अधिक अवसर हो सकते हैं। फिर भी उनमें से अनेक को लगता है कि जीवन में कुछ आवश्यक चीज़ की कमी है—एक व्यापक सामाजिक उद्देश्य की कमी।
संभव है कि वे उसी सामाजिक चेतना को फिर से खोज रहे हों, जो लंबे समय तक व्यक्तिगत सफलता और आर्थिक उन्नति की दौड़ में पीछे छूट गई थी।
मेरे विचार में जंतर-मंतर पर हो रहे घटनाक्रम का गहरा महत्त्व इसी में निहित है।
जेन ज़ी का आंदोलन और सामाजिक चेतना का पुनर्जागरण
इस घटनाक्रम को केवल जेन ज़ी का क्षणिक आक्रोश मानकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। न ही इसे किसी एक परीक्षा, सरकार के किसी एक फैसले या किसी एक राजनीतिक विवाद पर उपजे गुस्से तक सीमित किया जाना चाहिए।
यह मानवतावाद और कमजोर तथा वंचित लोगों के प्रति चिंता की भावना के पुनर्जागरण का संकेत हो सकता है। दशकों से धन, करियर और व्यक्तिगत सफलता के दबावों के बीच यह भावना काफी हद तक दब गई थी।
दिलचस्प बात यह है कि ऐसे आंदोलनों में भाग लेने वाले या उनका समर्थन करने वाले अनेक लोग स्वयं आर्थिक रूप से वंचित वर्गों से नहीं आते। वे आवश्यक रूप से गरीबी या अभाव के प्रत्यक्ष शिकार नहीं होते।
फिर भी उनकी सामाजिक चेतना उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित कर सकती है। वे उन लोगों के लिए अपना आराम, करियर और सुरक्षा तक दाँव पर लगाने को तैयार हो सकते हैं, जिनके पास उनसे कम साधन और अवसर हैं।
यही बात इस घटनाक्रम को महत्त्वपूर्ण बनाती है।
यह मान लेना भी गलत होगा कि जंतर-मंतर का आंदोलन केवल भावनाओं की एक ऐसी लहर है, जो जल्द ही समाप्त हो जाएगी।
यदि इसके पीछे की मूल प्रेरणाओं को सही ढंग से समझा जाए, तो यह युवाओं के बीच समाजवादी और समानतावादी सोच के एक नए रूप के उभरने का संकेत हो सकता है—ऐसी सोच, जो शायद पुराने नारों, विचारधारात्मक लेबलों या संगठनात्मक ढाँचों के बिना सामने आ रही हो।
भारत में आदर्शवाद हमेशा से युवावस्था की प्रमुख विशेषताओं में रहा है। जब युवाओं को स्थापित राजनीतिक विमर्श में कोई ऐसा आदर्श नहीं मिलता, जिससे वे जुड़ सकें, तो वे स्वाभाविक रूप से किसी दूसरे विकल्प की तलाश शुरू कर देते हैं।
इसलिए विद्रोही युवाओं को आदतन हेय दृष्टि से देखने वाले रूढ़िवादी और पेशेवर अभिजात वर्ग को इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेना चाहिए।
भारत के भविष्य के लिए जंतर-मंतर का आंदोलन क्यों महत्त्वपूर्ण है?
जंतर-मंतर के आंदोलन का भविष्य अभी अनिश्चित है। यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि यह एक स्थायी सामाजिक या राजनीतिक परिवर्तन का रूप ले लेगा। किसी भी आंदोलन की वास्तविक क्षमता केवल उसके शुरुआती उत्साह से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह अपने विचारों को कितनी स्पष्टता देता है और उन्हें किस तरह एक टिकाऊ कार्यक्रम में बदलता है।
क्या यह आंदोलन विभिन्न वर्गों और समूहों की आकांक्षाओं को एक साझा उद्देश्य से जोड़ पाएगा? क्या यह स्थायी संगठन और नेतृत्व विकसित कर सकेगा? क्या यह अपनी ऊर्जा को लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ रचनात्मक संवाद में बदल पाएगा?
इन प्रश्नों के उत्तर ही तय करेंगे कि यह आंदोलन क्षणिक असंतोष बनकर रह जाता है या सामाजिक बदलाव की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा बनता है।
राजनीतिक प्रतिष्ठान के लिए भी यह एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है। युवाओं की आवाज़ को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर दबाने या उनकी शिकायतों को अस्थायी भावनात्मक प्रतिक्रिया बताकर नज़रअंदाज़ करने से समस्या का समाधान नहीं होगा।
युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार के अवसर, गरिमापूर्ण जीवन और निर्णय-प्रक्रिया में सार्थक भागीदारी चाहिए। उन्हें यह विश्वास भी चाहिए कि उनकी मेहनत, उनकी योग्यता और उनकी आवाज़ का समाज में वास्तविक महत्त्व है।
यदि व्यवस्था इन अपेक्षाओं को पूरा करने में विफल रहती है, तो असंतोष और गहरा हो सकता है। लेकिन यदि इस आक्रोश के पीछे छिपी आकांक्षाओं को समझा जाए, तो यही ऊर्जा लोकतंत्र को अधिक जवाबदेह और समाज को अधिक न्यायपूर्ण बनाने में सहायक हो सकती है।
जंतर-मंतर पर उठ रही आवाज़ों को केवल एक पीढ़ी की नाराज़गी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। संभव है कि ये आवाज़ें उस व्यापक प्रश्न को सामने ला रही हों, जिसका सामना भारत को करना है: क्या विकास का अर्थ केवल व्यक्तिगत समृद्धि है, या उसमें सामाजिक न्याय, समानता और सामूहिक कल्याण के लिए भी पर्याप्त स्थान होना चाहिए?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को इस आंदोलन के पीछे छिपी सामाजिक चिंताओं और आकांक्षाओं को समझने की आवश्यकता है। युवाओं की ऊर्जा को केवल नियंत्रित करने की वस्तु मानने के बजाय उसे रचनात्मक दिशा देने का प्रयास किया जाना चाहिए।
जेन ज़ी का यह आंदोलन अंततः क्या रूप लेगा, यह अभी कहना कठिन है। लेकिन इसे बिना समझे खारिज कर देना एक गंभीर भूल होगी। हो सकता है कि इसके भीतर केवल गुस्सा न हो, बल्कि आदर्शवाद, सामाजिक चेतना और न्यायपूर्ण समाज की तलाश भी छिपी हो।
और यदि ऐसा है, तो जंतर-मंतर पर उठ रही आवाज़ों को सुनना केवल राजनीतिक प्रतिष्ठान की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए भी आवश्यक है। ![]()
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