मेरे परिवार की आधुनिक और सामाजिक सुधारवादी पृष्ठभूमि तथा कुछ हद तक कानपुर में कॉलेज के दिनों में मार्क्सवाद से हुए मेरे परिचय के कारण, युवावस्था में मैं महात्मा गांधी का कोई बड़ा प्रशंसक नहीं था। लेकिन उनके विचारों और कार्यों से मेरी असहमति के कारण उन कट्टरपंथी संघ परिवार के सदस्यों से बिल्कुल अलग थे, जो जितने संकीर्ण मानसिकता वाले हैं, उतने ही अतार्किक भी।
इसके विपरीत, मुझे लगता था कि महात्मा अपने समय के लिए पर्याप्त आधुनिक और प्रगतिशील नहीं थे और औद्योगिक क्रांति के बाद की उस दुनिया के लिए कुछ अधिक ही पुराने विचारों वाले थे, जो अब वास्तविकता बन चुकी थी। मुझे यह भी लगता था कि महात्मा गांधी में अधिक क्रांतिकारी तेवर होने चाहिए थे और इस नाते उन्हें नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं को भी अपने साथ लेकर चलना चाहिए था।
इसके अलावा, उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के उन योद्धाओं के बलिदानों की अधिक सराहना करनी चाहिए थी, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इनमें रानी लक्ष्मीबाई, लाला हरदयाल और गदर पार्टी के सदस्य, साथ ही तत्कालीन अविभाजित बंगाल और पंजाब के युवा शहीद शामिल थे।
हालांकि मैं चाहता था कि उनमें और अधिक गहरा क्रांतिकारी उत्साह होता, लेकिन भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गांधी के विशाल योगदान, उनके उच्च नैतिक चरित्र और उनके निस्वार्थ त्याग की मैं बहुत सराहना करता था। इन तमाम आरक्षणों के बावजूद, मेरा दृढ़ मत था कि उनकी हत्या मानवता के विरुद्ध किए गए सबसे बड़े अपराधों में से एक थी और जो लोग इस कृत्य का मौन समर्थन करते थे या चुपचाप इसे उचित मानते थे, वे घृणित मानसिकता के लोग थे।
शिक्षा पूरी करने के बाद जब मैंने पत्रकारिता का रास्ता अपनाया, तो गैर अनुरूपतावादी दृष्टिकोण और आलोचनात्मक विवेक मेरे स्वभाव का हिस्सा बन गए। 1970 के दशक में चंडीगढ़ से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक द ट्रिब्यून के पत्रकार के रूप में काम करते हुए और पंजाब विश्वविद्यालय से जुड़ी खबरें करते समय मेरा संपर्क प्रबंधन संकाय के एक प्रोफेसर डॉ. त्रिपाठी से हुआ। वे विश्वविद्यालय परिसर में गांधी अध्ययन केंद्र चलाते थे। वे भी कानपुर से थे।
एक दिन मैंने उनके सामने महात्मा गांधी को लेकर अपनी आपत्तियां रखीं। उन्होंने धैर्यपूर्वक मेरी बात सुनी और सलाह दी कि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले मुझे गांधी के व्यक्तित्व और उनके समय के बारे में अधिक अध्ययन करना चाहिए।
समाजशास्त्र का विद्यार्थी होने के कारण संस्कृति, समाज और सामाजिक इतिहास जैसे विषयों में मेरी स्वाभाविक रुचि थी। उन दिनों, जब न टीवी था और न मोबाइल, मेरे पास खाली समय भी काफी होता था। उसी समय मेरे भीतर का पत्रकार समकालीन इतिहास और उसे आकार देने में गांधी की भूमिका के बारे में पढ़ने और जानने लगा।
द ट्रिब्यून की समृद्ध लाइब्रेरी और मेरे कुछ वरिष्ठ सहयोगी, जैसे सरस्वती सरन कैफ, जे.एम. शर्मा, जसवंत सिंह और एल.के. झा, जो स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम दौर के प्रत्यक्षदर्शी रहे थे, इस अध्ययन में मेरे लिए बहुत उपयोगी साबित हुए। इसके अलावा, मुझे महान समाज वैज्ञानिक प्रो. एस.सी. दुबे और अन्य विद्वानों से बातचीत करने का अवसर भी मिला।
धीरे धीरे मुझे यह महसूस होने लगा कि जिस ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ में गांधी काम कर रहे थे, उसमें शायद उनके पास ब्रिटिश साम्राज्य की ताकत के खिलाफ सविनय अवज्ञा को सबसे प्रभावी हथियार के रूप में अपनाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
हालांकि, महात्मा गांधी के प्रति मेरी वास्तविक समझ और प्रशंसा तब शुरू हुई, जब 1989 में मैंने नई दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में काम शुरू किया।

सक्रिय पत्रकारिता में दो दशक से अधिक समय बिताने के बाद मुझे यह अहसास हुआ कि वे वास्तव में एक सच्चे और असाधारण नेता थे। इसके विपरीत, मैं और मेरे जैसे लोग अक्सर अपने पदों या अपनी लिखी खबरों के आधार पर स्वयं को अच्छा पत्रकार समझने लगते हैं।
IIMC में मैंने प्रकाशन प्रमुख और संस्थान की अर्ध शोधपरक पत्रिकाओं Communicator और Sanchar Madhyam के संपादक के रूप में काम शुरू किया। इन दोनों पत्रिकाओं के लिए सामग्री तलाशते और गांधी से संबंधित साहित्य को पढ़ते हुए मुझे महसूस हुआ कि महात्मा गांधी शायद हर समय के सबसे महान जनसंचार विशेषज्ञ थे।
उन्हें उन लोगों की मनोवृत्ति और मनोविज्ञान की गहरी समझ थी, जिनसे वे मिलते, संवाद करते और जिनका नेतृत्व करते थे। यह एहसास मुझे लगभग 30 वर्ष पीछे मेरे स्कूल के दिनों में ले गया।
राष्ट्रवादी कविताओं के लिए राष्ट्रकवि के रूप में प्रसिद्ध सोहनलाल द्विवेदी की एक कविता थी, जिसमें कहा गया था कि करोड़ों लोग महात्मा के हर कदम और हर दिशा का उसी निष्ठा से अनुसरण करते थे, जिस दिशा में वे आगे बढ़ते थे।
इसमें कोई संदेह नहीं कि गांधीजी में लोगों की मनोवृत्ति को समझने, उनके सोचने के स्तर को ऊपर उठाने और उन्हें सही दिशा में ले जाने की अद्भुत क्षमता थी, चाहे वह रास्ता कितना ही कठिन क्यों न हो। इसके साथ ही वे सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के उच्चतम मानदंडों का पालन करते थे। यही कारण था कि उनके समय के बड़े से बड़े लोग उनका सम्मान करते थे और आज भी उन्हें श्रद्धा के साथ याद किया जाता है।
आज दुनिया के 100 से अधिक देशों में गांधी की प्रतिमाएं हैं और 80 से अधिक देशों में गांधी अध्ययन केंद्र हैं।
कुछ विकृत और अस्थिर सोच वाले लोगों को छोड़ दें तो हमारे देश में हम महात्मा गांधी का सम्मान करते हैं और उन्हें श्रद्धा से देखते हैं। लेकिन हम उन्हें बहुत कम समझते हैं।
सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोग, राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता, प्रशासक तथा मीडिया से जुड़े लोग यदि गांधी की तरह लोगों की मनोवृत्ति को समझ सकें, तो वे समाज और आम जनता की कहीं बेहतर सेवा कर सकते हैं।
यह अफसोस की बात है कि आधुनिक परिवहन के तमाम साधनों, शिक्षा, जनजागरूकता और सूचना प्रौद्योगिकी से संचालित अत्यंत प्रभावशाली मीडिया के बावजूद हम लोगों की नब्ज को पहचानने और उन्हें राष्ट्र निर्माण के कार्य के लिए प्रेरित करने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं।
जिस “कनेक्ट” की हम तलाश करते हैं, वह किसी संकीर्ण और सांप्रदायिक मुद्दे पर भावनात्मक अपील में नहीं है। वह हमारे समाज के सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ की व्यापक और गहरी समझ में है। गांधी इस संदर्भ को समझते थे और उन्होंने इसे देश को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने की अपनी रणनीति का मार्गदर्शक सिद्धांत बनाया।
साथ ही उनका उद्देश्य जनता को उदासीनता, निष्क्रियता और बड़े सामाजिक उद्देश्यों के प्रति उपेक्षा की स्थिति से बाहर निकालना भी था, ताकि लोग समाज के व्यापक हित के लिए सक्रिय भूमिका निभा सकें।
हमारे राजनीतिक नेताओं, सार्वजनिक जीवन के लोगों और बुद्धिजीवियों को जितनी जल्दी गांधीवाद के इस मूल तत्व को आत्मसात करना चाहिए, उतना ही हमारी दिशाहीन राजनीति के लिए बेहतर होगा। ![]()
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