October 17, 2026

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भाजपा बोलना जानती है, लेकिन सुनना नहीं

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके नेताओं ने वर्षों के दौरान संवाद और प्रचार की कला में महारत हासिल कर ली है, लेकिन लोगों की आवाज़ और उनकी शिकायतें सुनने की क्षमता का वैसा ही प्रदर्शन वे नहीं कर पाए हैं।

पार्टी ने बूथ स्तर तक अपना मजबूत नेटवर्क खड़ा किया है, जिसके माध्यम से वह अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों तक अपनी बात पहुंचाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने भी पार्टी की पहुंच बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इसके अलावा, भक्तों की एक बड़ी फौज भी है, जो मोदी और अन्य नेताओं से इतनी प्रभावित नजर आती है कि उन्हें उनके किसी काम में कोई गलती दिखाई ही नहीं देती।

मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने भी देशभर में अपना संदेश पहुंचाने के लिए सरकारी तंत्र के इस्तेमाल की नई ऊंचाइयां छुई हैं। सरकारी स्वामित्व वाले दूरदर्शन और आकाशवाणी के माध्यम से सरकार अपनी बात लोगों तक पहुंचाती है। ‘मन की बात’ जैसे कार्यक्रम भी सरकार का दृष्टिकोण सामने रखने के लिए बनाए गए हैं।

संसद और मीडिया के प्रति सरकार का रवैया

संसद में भी सरकार विपक्ष को अपनी बात रखने का बहुत कम अवसर देती दिखाई देती है। शायद पिछले एक दशक से अधिक समय में संसद के सत्र इतने कम उत्पादक रहे हों। सबसे बड़ा विवाद विपक्ष की इस मांग को लेकर है कि प्रधानमंत्री या गृह मंत्री उसके सवालों का जवाब दें, लेकिन इस मांग का कोई नतीजा नहीं निकला है।

Bjp Modi Protests

Bjp Modi Protests

प्रधानमंत्री मोदी के नाम एक तरह का रिकॉर्ड भी दर्ज हो चुका है। प्रधानमंत्री बनने के बाद एक दर्जन साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद उन्होंने न तो कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की है और न ही मीडिया के सवालों का सामना किया है।

इसके पीछे यही अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री बनने से पहले कुछ पत्रकारों के साथ उनके अनुभव अच्छे नहीं रहे होंगे। खासकर, 2002 के गुजरात दंगों से जुड़े सवालों को लेकर।

लोगों या आंदोलनकारियों की बात न सुनने की यह प्रवृत्ति केवल इसलिए दिखाई देती है कि पार्टी लगातार चुनावी जीत हासिल करती रही है। विभिन्न मुद्दों पर समय-समय पर अपनाया गया उसका रवैया इसकी स्पष्ट मिसाल है।

किसान आंदोलन, परीक्षा पत्र लीक और युवाओं का आक्रोश

कृषि कानूनों के मामले में सरकार ने किसानों की बात सुनने से एक साल से भी अधिक समय तक इनकार किया। आखिरकार उसे विवादास्पद कृषि कानून वापस लेने पड़े। इस दौरान किसान नेताओं के साथ गंभीर संवाद नहीं किया गया, जिसके कारण किसानों में गहरा असंतोष पैदा हुआ। स्थिति को और बिगाड़ने का काम कुछ पार्टी नेताओं ने किया, जिन्होंने किसानों को उग्रवादी और राष्ट्रविरोधी तक करार दिया।

Exam Paper Leak

इसी तरह, प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र बार-बार लीक होने और शिक्षा क्षेत्र के कुप्रबंधन के बावजूद सरकार अड़ियल रवैया अपनाए रही। प्रश्नपत्रों के लीक होने की घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए। इसके परिणामस्वरूप कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर आंदोलन हुआ।

सरकार को कार्रवाई करने में लगभग एक महीना लग गया। वह भी तब, जब प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया गया। इसमें लाठीचार्ज, आंसू गैस और यहां तक कि पैलेट गन से फायरिंग भी शामिल थी। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा बहुत पहले आ जाना चाहिए था।

चुनाव आयोग पर सवाल और जवाबदेही की मांग

द इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल में चुनाव आयोग को लेकर हुए खुलासों के बाद सरकार ने एक बार फिर अड़ियल रुख अपना लिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग जोर पकड़ रही है।

Polling Vote Scकांग्रेस के नेतृत्व वाले राजनीतिक दलों के अलावा, कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में छात्र भी 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने और आयोग के कामकाज में हुई अनगिनत अनियमितताओं को लेकर जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।

इसके बावजूद सरकार ने इस मुद्दे पर पूरी तरह चुप्पी साध रखी है। उसने न तो प्रदर्शनकारियों तक पहुंचने का कोई प्रयास किया है और न ही इस मामले पर अपना पक्ष रखने की जरूरत समझी है।

इसके विपरीत, असहमति की आवाजों को दबाने के लिए सख्ती का सहारा लिया जा रहा है। उपलब्ध साक्ष्यों और मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए ज्ञानेश कुमार के लिए बेहतर होगा कि वे अपने पद से इस्तीफा दे दें। इसमें कोई संदेह नहीं कि सत्ता में बैठे लोग उन्हें ऐसा करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इससे हमारी चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता बहाल करने में कम से कम कुछ मदद तो मिल ही सकती है। Punjab Today Logo
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