September 11, 2026

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जब अदालत ने पुलिस राज पर सवाल उठाया

अल्लाहाबाद हाई कोर्ट का एनएसए फैसला पुलिस और नौकरशाही के लिए चेतावनी

अल्लाहाबाद हाई कोर्ट का 25 वर्षीय कानून कार्यकर्ता को कठोर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत गिरफ्तार किए जाने के मामले में दिया गया फैसला पुलिस और नौकरशाही के लिए एक बड़ी चेतावनी है। मजदूरों के लिए न्याय की मांग को लेकर प्रदर्शन में शामिल होने वाले इस कानून कार्यकर्ता पर एनएसए लगाया गया था। ऐसे में अदालत की टिप्पणी उन अधिकारियों के लिए आंखें खोलने वाली होनी चाहिए जो संविधान के बजाय सरकार के प्रति अपनी निष्ठा को प्राथमिकता देते दिखाई देते हैं।

इस फैसले की खास बात यह भी है कि अदालत ने केवल कार्रवाई को गलत नहीं ठहराया, बल्कि उन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की दिशा में कदम उठाया जिन्होंने बिना उचित विवेक का इस्तेमाल किए मुकदमे दर्ज किए, राजनीतिक नेताओं को खुश करने के लिए कानून का इस्तेमाल किया या जांच में गंभीर लापरवाही बरती। सभी अदालतों को ऐसे मामलों में यही दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है—गलत कार्रवाई करने वाले अधिकारियों, जिनमें पुलिसकर्मी भी शामिल हैं, की व्यक्तिगत जवाबदेही तय होनी चाहिए।

अदालत ने गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की जिलाधिकारी मेधा रूपम द्वारा कानून की छात्रा आकृति चौधरी को एनएसए के तहत निरुद्ध करने के फैसले को बेहद कड़ी टिप्पणी के साथ खारिज किया और इसे “उपहास के योग्य” बताया। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि संबंधित अधिकारी और इस कार्रवाई में शामिल अन्य अधिकारियों के प्रति उसकी नाराजगी को उनके सेवा अभिलेखों में दर्ज किया जाए।

Police Protest Accountabilityअदालत यहीं नहीं रुकी। उसने कार्यकर्ता को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया और कहा कि यह राशि उस जिलाधिकारी के वेतन से वसूली जाए जिसने बिना उचित विवेक के निरुद्धि का आदेश पारित किया था। अदालत ने यह जिम्मेदारी उन अन्य अधिकारियों तक भी तय करने को कहा जो इस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। इसमें वह थाना प्रभारी भी शामिल है जिसने एनएसए के तहत निरुद्धि की कार्रवाई का आधार बनने वाली प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार की थी।

अदालत ने पाया कि ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो कि कार्यकर्ता ने हिंसा के लिए किसी को उकसाया या भड़काया था। इसके विपरीत, अदालत को रिकॉर्ड तैयार करने में हेरफेर और प्रदर्शन में शामिल लोगों को एक संदेश देने की जानबूझकर की गई कोशिश के संकेत मिले।

राज्य की ओर से जिलाधिकारी के माध्यम से अधिकारों के जिस “लापरवाह और मनमाने इस्तेमाल” को अदालत ने रेखांकित किया, उस पर उसने नौकरशाही को भी कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने चेताया कि इस तरह का व्यवहार उत्तर प्रदेश को एक “ऑरवेलियन डिस्टोपिया” में बदल सकता है—ऐसी व्यवस्था जहां राज्य का नियंत्रण नागरिक स्वतंत्रताओं पर हावी हो जाए।

दरअसल, योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद से राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर आलोचक अक्सर अखिलेश यादव सरकार के कथित “जंगल राज” की जगह “पुलिस राज” कायम होने का आरोप लगाते रहे हैं।

Yogi Bulldozerमौजूदा सरकार पर “बुलडोजर न्याय” के जरिए कानून की सीमाओं की अनदेखी करने के आरोप भी लगते रहे हैं। प्रदर्शनकारियों के घरों को कमजोर आधारों पर गिराने, खासकर मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों के खिलाफ ऐसी कार्रवाइयों, कथित फर्जी मुठभेड़ों और संदिग्धों की सार्वजनिक पिटाई जैसी घटनाओं ने राज्य में कानून के शासन को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

ऐसी कार्रवाइयां पुलिस और सरकारी अधिकारियों द्वारा राज्य सरकार की स्पष्ट सहमति या मिलीभगत के बिना नहीं की जा सकतीं। इसके बावजूद सत्ता के दुरुपयोग के मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई अक्सर नजर नहीं आती।

ऐसे माहौल में, जब राज्य सरकार पर लोकतांत्रिक सिद्धांतों की अनदेखी के आरोप लग रहे हों, यह फैसला उसके लिए जागने की घंटी होना चाहिए। यह स्पष्ट संदेश देता है कि सरकार और उसके अधिकारी कानून से ऊपर नहीं हैं। उन्हें संविधान और कानून में तय सीमाओं के भीतर ही काम करना होगा।

इससे पहले भी अदालतें राज्य की ज्यादतियों और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ चेतावनी देती रही हैं। लेकिन नोएडा का यह फैसला इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसमें उन सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई है जिन्होंने कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया और अपने अधिकारों का मनमाना इस्तेमाल किया।

देश में ऐसे अनगिनत मामले हैं जिनमें निर्दोष लोगों पर झूठे या बेबुनियाद मुकदमे थोप दिए जाते हैं। हमारी धीमी न्याय-व्यवस्था के कारण ऐसे लोग लंबे समय तक विचाराधीन कैदी बने रहते हैं और वर्षों तक अपनी बेगुनाही साबित करने की कोशिश करते रहते हैं।

ऐसे मामलों में इसरो के उस वैज्ञानिक का मामला याद आता है जिस पर जासूसी का आरोप लगाया गया था, लेकिन 15 वर्ष से अधिक समय बाद वह आरोपों से मुक्त हुआ। कुछ मामलों में अदालतों ने जांच अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। लेकिन नोएडा के मामले की खासियत यह है कि अदालत ने कानून के दुरुपयोग के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर आर्थिक दायित्व भी डाला है।

New Laws Justiceइसी तरह उन सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए जिन्हें किसी जिम्मेदारी के लिए नियुक्त किया गया है, लेकिन वे अपना कर्तव्य निभाने में विफल रहते हैं।

हाल में दिल्ली में छात्रों के लिए पेइंग गेस्ट आवास के रूप में इस्तेमाल हो रही एक इमारत के ढहने का मामला इसका उदाहरण है। इमारत के मालिक की गिरफ्तारी उचित कदम है, लेकिन अवैध निर्माण को रोकने और नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार सरकारी अधिकारियों को केवल निलंबित कर देना पर्याप्त नहीं है।

जिन अधिकारियों को अवैध निर्माण रोकने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उन्हें भी अपनी ड्यूटी में विफल रहने के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। उनके खिलाफ आपराधिक लापरवाही का मामला दर्ज कर यह तय किया जाना चाहिए कि अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहने की कीमत कौन चुकाएगा।

देश की सभी अदालतों को न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ के इस फैसले से सीख लेनी चाहिए और जब भी सरकारी अधिकारी अपने अधिकारों का दुरुपयोग करें या अपने कर्तव्य में गंभीर चूक करें, तो उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय करनी चाहिए।

लोकतंत्र में कानून का शासन तभी सार्थक है जब कानून लागू करने वालों पर भी वही कानून लागू हो। सत्ता का अधिकार किसी अधिकारी को मनमानी का अधिकार नहीं देता। Punjab Today Logo
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