12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत की कूटनीतिक मेजबानी की क्षमता से कहीं अधिक बुनियादी सवाल की परीक्षा लेगा। सवाल यह है कि क्या विस्तारित ब्रिक्स अपनी बढ़ती संख्या और वैश्विक प्रभाव को वास्तविक राजनीतिक और आर्थिक ताकत में बदल सकता है।
भारत के लिए यह शिखर सम्मेलन रणनीतिक स्वायत्तता दिखाने का अवसर है। साथ ही यह इस बात की परीक्षा भी है कि क्या नई दिल्ली ऐसे मंच में कुछ हद तक सामंजस्य ला सकती है, जिसकी पहचान अब उसके बढ़ते प्रभाव के साथ-साथ आंतरिक विरोधाभासों से भी होने लगी है।
भारत 2012, 2016 और 2021 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर चुका है। मौजूदा अध्यक्षता का विषय है, “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण।” लक्ष्य महत्वाकांक्षी है। लेकिन असली सवाल यह है कि जब सदस्य देशों के बीच युद्ध, व्यापार, मुद्रा, सुरक्षा और पश्चिम के साथ संबंधों को लेकर गंभीर मतभेद हों, तब क्या ब्रिक्स आकर्षक नारों और घोषणाओं से आगे बढ़कर कुछ ठोस कर पाएगा?
संकट के दौर में ब्रिक्स
18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 11 सदस्य देशों को एक साथ ला रहा है। इनमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया और सऊदी अरब शामिल हैं। इनके अलावा साझेदार देश भी इस व्यापक व्यवस्था का हिस्सा हैं।
भारत की अध्यक्षता के दौरान देशभर में ब्रिक्स से जुड़ी 350 से अधिक बैठकें आयोजित की गई हैं। वैश्विक वित्तीय सुधार, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, डिजिटल बुनियादी ढांचा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, आतंकवाद तथा विकास वित्त जैसे मुद्दे एजेंडे में रहे हैं।
महत्वपूर्ण खनिजों, कृषि, ऊर्जा, दवा और विनिर्माण के क्षेत्र में सहयोग भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता को ठोस आर्थिक आधार दे सकता है। डिजिटल सार्वजनिक ढांचे और न्यू डेवलपमेंट बैंक में भारत का अनुभव भी व्यावहारिक सहयोग के नए रास्ते खोल सकता है।
लेकिन यह शिखर सम्मेलन कहीं अधिक कठिन भू-राजनीतिक माहौल में हो रहा है।
ईरान से जुड़ा जारी संघर्ष ब्रिक्स के भीतर के तीखे मतभेदों को सामने ला चुका है। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात की सुरक्षा चिंताएं और क्षेत्रीय हित अलग-अलग हैं। दूसरी ओर, अन्य ब्रिक्स देशों के अमेरिका, यूरोप और व्यापक पश्चिम एशिया के साथ अपने-अपने संबंध हैं।
इसलिए नई दिल्ली का यह सम्मेलन महज कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है।
सवाल यह है कि क्या ब्रिक्स सामूहिक रूप से कुछ हासिल कर पाएगा या फिर शिखर सम्मेलन के अंत में ऐसा बयान सामने आएगा, जिसमें हर पक्ष को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त अस्पष्टता बरती गई हो?
एकजुटता की चुनौती
ब्रिक्स की बुनियादी कमजोरी उसकी रणनीतिक असंगति है।
विस्तार ने उसका भू-राजनीतिक वजन तो बढ़ाया है, लेकिन साथ ही आम सहमति बनाना भी कठिन कर दिया है। रूस और ईरान पश्चिम से टकराव की स्थिति में हैं, जबकि कई अन्य सदस्य पश्चिमी देशों के साथ महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक संबंध रखते हैं। चीन और भारत रणनीतिक प्रतिस्पर्धी हैं, फिर भी दोनों ग्लोबल साउथ की आवाज को अधिक प्रभावी बनाने की वकालत करते हैं।
अब यह समस्या केवल सैद्धांतिक नहीं रह गई है।
मई में नई दिल्ली में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक ने विवादित भू-राजनीतिक मुद्दों पर आम सहमति बनाने की कठिनाई को उजागर कर दिया। सदस्य देश संयुक्त बयान पर सहमत नहीं हो सके और अंततः भारत को अध्यक्ष के बयान से काम चलाना पड़ा। पश्चिम एशिया के संकट ने इन मतभेदों को और स्पष्ट कर दिया।
ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच का मतभेद एक असहज वास्तविकता को सामने लाता है। ब्रिक्स का विस्तार अपने सदस्यों के हितों में सामंजस्य कायम करने की क्षमता से कहीं तेज हो सकता है।
यह एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। यदि कोई समूह बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट के समय एक साझा रुख तक नहीं पहुंच सकता, तो वह वैश्विक शासन व्यवस्था का वैकल्पिक स्तंभ बनने की दिशा में वास्तव में कितना आगे जा सकता है?
इसका उत्तर शायद सफलता की परिभाषा बदलने में है।
ब्रिक्स को हर भू-राजनीतिक संकट पर साझा रुख अपनाने की जरूरत नहीं है। जरूरत ऐसे तंत्र विकसित करने की है, जिनके जरिए अलग-अलग राजनीतिक हित रखने वाले देश उन क्षेत्रों में सहयोग कर सकें, जहां उनके हित एक-दूसरे से मिलते हैं।
एकता के लिए सर्वसम्मति जरूरी नहीं है।
अगर ब्रिक्स विस्तार के बाद भी प्रभावी बने रहना चाहता है, तो यह उसका सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत हो सकता है।
भारत को पश्चिम-विरोधी जाल से बचना होगा
ब्रिक्स को खुद को अमेरिका या पश्चिम-विरोधी गठबंधन बनने से भी बचाना होगा।
कई सदस्य बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के पक्षधर हैं, लेकिन वे वाशिंगटन या यूरोप के साथ टकराव नहीं चाहते। खासकर भारत की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है कि एक भू-राजनीतिक गुट की जगह दूसरा गुट खड़ा हो जाए।
इसलिए नई दिल्ली की विश्वसनीयता इस बात से तय होगी कि वह वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करते हुए ब्रिक्स को भू-राजनीतिक टकराव का औजार बनने से किस हद तक रोक पाती है।
ग्लोबल साउथ के लिए एक प्रभावी मंच रणनीतिक रूप से उपयोगी है। लेकिन पश्चिम के खिलाफ किसी वैचारिक गठबंधन में बदल जाना प्रतिकूल होगा।
भारत की नीति किसी एक खेमे को चुनने के बजाय अपने लिए रणनीतिक गुंजाइश बनाए रखने पर आधारित है।
नई दिल्ली में इसी दृष्टिकोण की परीक्षा होगी। भारत को रक्षा, ऊर्जा और पुराने रणनीतिक संबंधों के कारण रूस की जरूरत है। उसे सीमा विवाद के बावजूद चीन के साथ स्थिर संबंधों की जरूरत है। अमेरिका और यूरोप के साथ उसके आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक संबंध लगातार गहरे हो रहे हैं। इसके साथ ही खाड़ी और व्यापक पश्चिम एशिया में भी भारत के महत्वपूर्ण हित हैं।
भारतीय कूटनीति की असली ताकत इसी में है कि वह इन सभी रिश्तों को एक साथ संभाल सके।
डी-डॉलराइजेशन: महत्वाकांक्षा बनाम हकीकत
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में डी-डॉलराइजेशन एक बार फिर महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगा। लेकिन बयानबाजी को आर्थिक वास्तविकता समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए।

स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान तंत्र लेनदेन की लागत तथा तीसरे देशों की वित्तीय प्रणालियों पर निर्भरता को कम कर सकते हैं। लेकिन अमेरिकी डॉलर को दुनिया की प्रमुख वैश्विक मुद्रा के स्थान से हटाना पूरी तरह अलग मामला है।
यह अंतर समझना जरूरी है।
ब्रिक्स देश किसी साझा ब्रिक्स मुद्रा के निर्माण के बिना भी धीरे-धीरे डॉलर-प्रधान वित्तीय ढांचे पर अपनी निर्भरता कम कर सकते हैं। लेकिन विभिन्न देशों की मुद्राओं की परिवर्तनीयता, मौद्रिक नीतियों, वित्तीय नियमन, पूंजी बाजार और बाजार की गहराई में भारी अंतर है। इसलिए निकट भविष्य में साझा ब्रिक्स मुद्रा की संभावना वास्तविक नहीं दिखती।
अधिक व्यावहारिक लक्ष्य वित्तीय विविधीकरण होना चाहिए। भारत को इसलिए डी-डॉलराइजेशन को राजनीतिक नारे में बदलने के प्रलोभन से बचना चाहिए।
रणनीतिक विविधीकरण समझदारी है। वित्तीय दिखावा नहीं।
ब्रिक्स के लिए अधिक उपयोगी एजेंडा सीमा-पार भुगतान प्रणालियों को बेहतर बनाना, जहां व्यावसायिक रूप से संभव हो वहां स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देना और ऐसे वित्तीय तंत्र मजबूत करना होगा जो किसी एक मुद्रा या भुगतान नेटवर्क पर अनावश्यक निर्भरता को कम करें।
विस्तार: ताकत या कमजोरी?
ब्रिक्स के विस्तार ने निश्चित रूप से ग्लोबल साउथ में उसकी प्रतिनिधित्व क्षमता बढ़ाई है। लेकिन 11 सदस्य देशों और साझेदार देशों के जुड़ने से इसकी कूटनीतिक संरचना भी कहीं अधिक जटिल हो गई है।
यदि हर महत्वपूर्ण फैसले के लिए आम सहमति जरूरी होगी, तो विस्तार धीरे-धीरे ब्रिक्स को एक प्रभावशाली मंच से बदलकर केवल कूटनीतिक चर्चा के मंच में बदल सकता है।
इसलिए ब्रिक्स को पूर्ण सदस्यों और साझेदार देशों के बीच अधिक स्पष्ट अंतर करना होगा। साथ ही उन देशों के लिए अधिक लचीलापन होना चाहिए जो किसी खास क्षेत्र में सहयोग करना चाहते हैं, भले ही वे हर भू-राजनीतिक मुद्दे पर एकमत न हों।
ब्रिक्स अधिक कार्यात्मक दृष्टिकोण अपना सकता है।
देश यूक्रेन के मुद्दे पर एकमत हुए बिना डिजिटल भुगतान पर सहयोग कर सकते हैं। वे पश्चिम एशिया पर साझा रुख अपनाए बिना खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में साथ आ सकते हैं। वे वाशिंगटन, मॉस्को और बीजिंग के साथ अलग-अलग संबंध रखते हुए जलवायु वित्त के क्षेत्र में सहयोग कर सकते हैं।
इससे ब्रिक्स एक मजबूर राजनीतिक गठबंधन के बजाय व्यावहारिक सहयोग का मंच बन सकता है।
ब्रिक्स तभी अधिक प्रभावी होगा जब वह यह स्वीकार करेगा कि एकता के लिए एकमत होना जरूरी नहीं है।
शी जिनपिंग की भारत वापसी
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा ब्रिक्स से आगे भी इस सम्मेलन को महत्वपूर्ण बनाती है।
2020 के खूनी सीमा संघर्ष के बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी, जिसने दोनों देशों के संबंधों को पूरी तरह बदल दिया था। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात औपचारिक ब्रिक्स एजेंडे से अलग भी महत्वपूर्ण होगी।
मोदी के लिए लक्ष्य प्रतीकात्मक मेल-मिलाप नहीं, बल्कि संतुलित और मापी हुई बातचीत होना चाहिए।
सीमा विवाद अभी सुलझा नहीं है। आर्थिक प्रतिस्पर्धा जारी है। दक्षिण एशिया में चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय है। सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय भू-राजनीति को लेकर मतभेद भी बने हुए हैं।
इसके बावजूद दुनिया के दो सबसे अधिक आबादी वाले देशों के बीच लंबे समय तक टकराव भारत की व्यापक महत्वाकांक्षाओं को जटिल बना सकता है। इसलिए वास्तविक लक्ष्य प्रतिस्पर्धी सह-अस्तित्व होना चाहिए।
भारत और चीन को अपने सभी मतभेद खत्म करने की जरूरत नहीं है। जरूरत इस बात की है कि वे इन मतभेदों को पूरे संबंधों को पंगु बनाने से रोकें।
कूटनीतिक नरमी बातचीत, व्यापार और संकट प्रबंधन के लिए जगह बना सकती है। लेकिन वह सीमा विवाद में प्रगति का विकल्प नहीं हो सकती।
हिमालयी सीमा पर भरोसे की जगह किसी शिखर सम्मेलन में हुआ हाथ मिलाना नहीं ले सकता।
पुतिन और भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से एक दिन पहले 11 सितंबर को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात भारत के कूटनीतिक संतुलन को एक और महत्वपूर्ण आयाम देती है।
बातचीत में व्यापार, आर्थिक सहयोग, रक्षा, ऊर्जा और वैश्विक घटनाक्रम प्रमुख मुद्दे रहने की उम्मीद है। नई दिल्ली के लिए इसका समय विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
भारत को रूस के साथ अपने पुराने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखते हुए यूक्रेन युद्ध और रूसी तेल के मुद्दे पर पश्चिमी दबाव का भी सामना करना है। दूसरी ओर, अमेरिका और यूरोप के साथ भारत के आर्थिक और रणनीतिक संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं।
चुनौती यह साबित करना नहीं है कि भारत रूस के अधिक करीब है या पश्चिम के।
चुनौती यह दिखाना है कि रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ दोनों के साथ काम करने और जरूरत पड़ने पर दोनों से असहमति जताने की स्वतंत्रता है।
यह गुटीय राजनीति की तुलना में भारतीय विदेश नीति की कहीं अधिक परिपक्व व्याख्या है।
मोदी की असली परीक्षा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन यह दिखाने का अवसर है कि भारत का कूटनीतिक प्रभाव केवल बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की मेजबानी तक सीमित नहीं है।
वास्तविक उपलब्धि यह होगी कि ऐसे व्यावहारिक ढांचे तैयार किए जाएं जिनके जरिए अलग-अलग भू-राजनीतिक हित रखने वाले देश फिर भी सहयोग कर सकें।
भारत को ब्रिक्स के अंतर्विरोध खत्म करने की जरूरत नहीं है। उसे उन्हें संभालने की जरूरत है।
इसका अर्थ है उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना जहां वास्तव में साझा हित मौजूद हैं। इनमें विकास वित्त, व्यापार सुगमता, डिजिटल बुनियादी ढांचा, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिज, स्वास्थ्य सेवा और प्रौद्योगिकी शामिल हैं।
साथ ही भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि ब्रिक्स भू-राजनीतिक टकराव से संचालित मंच न बन जाए। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विस्तारित ब्रिक्स में ऐसे देश शामिल हैं जो एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी भी हैं, साझेदार भी और प्रतिद्वंद्वी भी।
शिखर सम्मेलन के घोषणापत्र से आगे
नई दिल्ली शिखर सम्मेलन की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि अंत में कितना लंबा घोषणापत्र जारी हुआ या कितने नेता पारंपरिक समूह तस्वीर के लिए एक साथ खड़े हुए।

Beyond The Summit Declaration
इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण परीक्षा यह है कि क्या ब्रिक्स ऐसे संस्थान और तंत्र विकसित कर पाता है जो सदस्य देशों के राजनीतिक मतभेदों के बावजूद काम करते रहें।
यदि ऐसा होता है तो ब्रिक्स अधिक प्रतिनिधित्व वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बन सकता है।
अगर ऐसा नहीं हुआ तो उसका विस्तार ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन सकता है।
भारत के पास एक अनूठा अवसर है, क्योंकि वह ऐसी स्थिति में है जिसे कुछ ही अन्य सदस्य देश दोहरा सकते हैं। उसके रूस के साथ रणनीतिक संबंध हैं, चीन के साथ जटिल लेकिन आवश्यक रिश्ता है, अमेरिका और यूरोप के साथ बढ़ती साझेदारी है और खाड़ी तथा व्यापक ग्लोबल साउथ में गहरे आर्थिक और रणनीतिक हित हैं।
यह स्थिति नई दिल्ली को प्रभाव भी देती है और जिम्मेदारी भी।
चुनौती ब्रिक्स को राजनीतिक रूप से एकरूप बनाने की नहीं है।
चुनौती यह है कि राजनीतिक रूप से विविध ब्रिक्स को उपयोगी बनाया जाए।
नई दिल्ली में भारत की वास्तविक कूटनीतिक उपलब्धि यही होगी कि वह दिखा सके कि एक विभाजित समूह भी व्यावहारिक सहयोग कर सकता है, ग्लोबल साउथ के हितों की रक्षा कर सकता है और अधिक संतुलित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में योगदान दे सकता है, बिना खुद को एक और भू-राजनीतिक खेमे में बदले।
तभी 2026 का ब्रिक्स शिखर सम्मेलन महज ऑप्टिक्स से आगे की कोई बड़ी बात साबित होगा। ![]()
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