April 19, 2026

  • Facebook Icon
  • Twitter Icon
  • Youtube Icon
  • Instagram Icon

आस्था, बाबा और तार्किकता को विदाई

आसाराम बापू बलात्कार के मामले में सजा काट रहे हैं. राम रहीम इंसान हत्या और दुष्कर्म के दोषी पाये गए हैं और जेल में हैं, इन दिनों को पेरोल मिलने की खबरें हमें अक्सर पढ़ने को मिलती रहती हैं. ये दोनों वर्तमान दौर के शीर्ष बाबाओं में शामिल हैं. इनके पास ढेर सारी धन-संपदा है, महँगी मोटरगाड़ियाँ हैं, कई आश्रम हैं और श्रद्धालुओं की बड़ी फौज है जो उनके लिए कुछ भी करने को तैयार रहती है.

Godmen Modi Asaramये दोनों धोखेबाजों और लम्पटों के गिरोहों के मुखिया हैं. इनके जैसे कई बाबा पूरे देश में हैं जो पवित्रता का चोला ओढ़े अत्यंत घृणित काम करते हैं. पिछले कुछ दशकों में ऐसे बाबाओं की संख्या में बहुत बढ़ोत्तरी हुई है. फिर, कुछ ऐसे बाबा भी हैं जिन्होंने अलग तरीकों से धन-दौलत और अनुयायियों के साम्राज्य खड़े किए हैं. ये ढोंगी बाबा, अंधश्रद्धा के साम्राज्यों – जो समाज में बढ़ती असुरक्षा के माहौल में फल-फूल रहे हैं – का एक हिस्सा मात्र हैं.

भारत में बाबाओं की जड़ें अंधश्रद्धा में हैं जिसका वे बहुत कुटिलता से इस्तेमाल करते हैं और आम लोगों का शोषण कर धन-संपदा व औरतें हासिल करते हैं. एप्सटीन जैसे लोग यही काम अलग तरीके से कर रहे हैं.

हाल में ऐसा ही एक मामला महाराष्ट्र के नासिक में सामने आया है. यहां अहोक कुमार खरात नाम के एक व्यक्ति को लोगों के आस्था का दुरूपयोग कर छल-कपट करने के आरोप में पुलिस ने हिरासत में लिया. महाराष्ट्र की बहुत सी बड़ी-बड़ी हस्तियां उसके पास आती थीं और महाराष्ट्र महिला आयोग की प्रमुख रूपाली चकंकर भी उसकी अनुयायी थीं.

रुपाली का इस धोखेबाज के साथ एक वीडियो सामने आया है जिसमें वे उसके पैर धो रही हैं और उसे धूप से बचाने के लिए छाता लगा रही हैं. खरात का दावा है कि वह मर्चेन्ट नेवी का पूर्व कप्तान है, उसे दैवीय शक्तियां प्राप्त हैं. वह ज्योतिषी और अंकशास्त्री होने का नाटक करता था. कई मंत्री और बड़े-बड़े लोग उसके पास आते थे.

वह इमली के पालिश किए हुए बीजों को बहुमूल्य रत्न बताकर बेचने के अलावा बहुत से ऐसे काम करता था जिनसे उसे बहुत कमाई होती थी. शुरू में उसकी शिकार हुई बहुत सी महिलाएं इसलिए चुप रहीं क्योंकि उसके बड़े-बड़े लोगों से नजदीकी ताल्लुकात थे.

Kharat Rupali Cartoon

इसके साथ ही, सम्मान से देखे आने वाले मगर लम्पट और धोखेबाज धर्मगुरू-बाबाओं की फलती-फूलती जमात में से एक और घृणास्पद बढ़ोत्तरी हो गई. पहले भी चन्द्रास्वामी, धीरेन्द्र ब्रम्हचारी, आचार्य रजनीश और महेश योगी सहित बहुत से धर्मगुरू हो चुके हैं जिनकी समाज के धार्मिक एवं राजनैतिक परिदृश्य में सशक्त मौजूदगी थी.

इसी दौरान साईं बाबा का भी बोलबाला रहा जो ऊंगलियां नचाकर राख प्रकट करने जैसे जादू दिखाया करते थे. उनकी दैवीय शक्ति केवल राख और छोटी-छोटी अंगूठियां प्रकट करने तक सीमित थी और उन्होंने इस जादू के जरिए तरबूज प्रकट करने से इंकार कर दिया था. उनसे जुड़े यौन शोषण के मामले भी सामने आए थे.

मां अमृतानंद माई भी दैवीय शक्तियों के लिए प्रसिद्ध रहीं. उन्हें किसिंग अम्मा भी कहा जाता था. निर्मल बाबा, बेनी हिन्न और बहुत से अन्य बंगाली बाबा भी बाज़ार में हैं जो चुटकियों में सभी की तरह-तरह की समस्याएं हल करने का दावा करते हैं.

इतना ही नहीं, इन दिनों जग्गी वासुदेव और बाबा रामदेव जैसे बाबा भी सक्रिय हैं. वासुदेव ने ‘इनर इंजीनियरिंग‘ जैसा चमत्कारी शब्द गढ़ा है और आईटी क्षेत्र में भी उनके अनुयायी हैं. श्रीश्री रविशंकर का अपना अलग तरह का राजनैतिक दबदबा है. उन्होंने अन्ना आंदोलन को सहारा दिया और एक ऐसा आयोजन किया जिससे यमुना नदी के आसपास खासी पर्यावरणीय क्षति हुई.

बाबाओं की सूची काफी लंबी और लगभग अनंत है. लेकिन हम बाबा रामदेव को नजरअंदाज नहीं कर सकते जिन्होंने योग गुरू के रूप में शुरूआत की और बाद में अत्यंत सफल व्यापारी बन गए. उन्होंने वादा किया था कि यदि जनता नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री चुनती है तो पेट्रोल सस्ता (35 रू. लीटर) हो जाएगा और रूपया डालर के मुकाबले मजबूत हो जाएगा.

Fake Babas Godmen

यह साफ-साफ नजर आ रहा है कि समाज में आर्थिक असुरक्षा और असमानता बढ़ रही है और लोगों की आस्था से खेलने वाले बाबाओं की पकड़ आसमान छू रही है. इसके साथ ही समाज में आस्था-आधारित ज्ञान और विश्वास भी बढ़ रहा है. हालांकि काल्पनिक पौराणिक कथाओं को तर्क और विवेक पर तरजीह देने की यह प्रवृत्ति भारत तक सीमित नहीं है.

मुझे याद है कि पाकिस्तान में एक बैठक में जिन्नात के ज़रिये बिजली की कमी दूर करने पर किया गया शोध प्रस्तुत किया गया था! आज़ादी के बाद भारत में विज्ञान और तर्क पर आधारित चिंतन की ज्यादा बेहतर नींव रखी गई थी. इसी के नतीजे में उत्कृष्ट संस्थानों की एक श्रृंखला स्थापित हुई जिसने देश के विकास में बहुमूल्य योगदान दिया. मगर इस संदर्भ में पिछले कुछ दशकों का घटनाक्रम अत्यंत निराशाजनक है.

स्वयं प्रधानमंत्री ने पौराणिक कथाओं को विज्ञान का दर्जा देने की शुरुआत की. एक आधुनिक अस्पताल का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जन रहा होगा जिसने मनुष्य के धड़ पर हाथी का सिर प्रत्यारोपित किया. दूसरे ग्रहों तक जाने की क्षमता रखने वाले पुष्पक विमान के बारे में हम जानते ही थे. ऐसे कई मोदी समर्थक नेता हैं जिन्होंने यह दावा किया है कि अनुवांशिकी विज्ञान, अंतरिक्ष यान और इंटरनेट ये सब प्राचीन भारत में थे.

न केवल इन सारी पौराणिक कथाओं को गंभीरता से लिया जा रहा है बल्कि रामायण और महाभारत पर शोध के लिए बड़ी धनराशि का आवंटन भी किया जा रहा है. एक ऐसा देश जिसे कुपोषण और संक्रामक बीमारियों से लड़ने को तरजीह देना चाहिए, वह गाय से प्राप्त होने वाली एवं उनसे बनाई गई चीजों – मूत्र, गोबर, दूध, घी और दही – के मिश्रण पंचगव्य पर शोध में धन खर्च कर रहा है! आस्था पर आधारित सोच को बढ़ावा दिया जा रहा है.

Godmen Babas

प्रधानमंत्री बागेश्वर धाम बाबा को अपना छोटा भाई कहते हैं. यह बाबा किसी भी व्यक्ति का अतीत जानने की आध्यात्मिक और रहस्यमयी शक्ति से संपन्न होने का दावा करता है. इसी तरह नई पीढ़ी को भी भारतीय ज्ञान प्रणाली की घुट्टी पिलाई जा रही है. प्राचीन भारत ने निश्चय ही तर्कपूर्ण विचारों के क्षेत्र में बहुत योगदान दिया होगा लेकिन सच और झूठ को अलग करना ज़रूरी है.

यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो पाएंगे कि आस्था-आधारित ज्ञान उन राजनैतिक प्रणालियों में बहुत पसंद किया जाता है जो यथास्थिति को बढ़ावा देती हैं या समाज को उस अतीत की ओर धकेलती हैं, जब तर्कसंगत चिंतन-मनन के परंपरा नहीं था. इसी का अनुसरण करते हुए नई शिक्षा नीति के पाठ्यक्रम में डार्विन के प्रजातियों के विकास के सिद्धांत की उपेक्षा की गई है और रसायनशास्त्र के आधार आवर्त तालिका को हटा दिया गया है.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 (क)(ज) (जिसे 1976 में 42वें संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया) में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद, ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना को बढ़ावा देने को प्रत्येक नागरिक का मूलभूत कर्तव्य बताया गया है. यह जीवन के प्रति एक तर्कसंगत साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है ताकि अंधविश्वासों से उबरा जा सके और सामजिक विकास हो सके.

हम वर्तमान में इसकी ठीक विपरीत दिशा में चल रहे हैं जहां सत्ताधारी पार्टी नई शिक्षा नीति के ज़रिये अंधविश्वासों को प्रोत्साहित कर रही है. यह आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत हानिकारक होगा. इससे भारत में खरात और बागेश्वर धाम जैसे लोग फलेंगे-फूलेंगे और डॉ. दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम. एम. कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसों को चिंतन और विचारों में तार्किकता को प्रोत्साहित करने के लिए अपनी जान गंवानी होगी.

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया. लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)

 

Disclaimer : PunjabTodayNews.com and other platforms of the Punjab Today group strive to include views and opinions from across the entire spectrum, but by no means do we agree with everything we publish. Our efforts and editorial choices consistently underscore our authors’ right to the freedom of speech. However, it should be clear to all readers that individual authors are responsible for the information, ideas or opinions in their articles, and very often, these do not reflect the views of PunjabTodayNews.com or other platforms of the group. Punjab Today does not assume any responsibility or liability for the views of authors whose work appears here.

Punjab Today believes in serious, engaging, narrative journalism at a time when mainstream media houses seem to have given up on long-form writing and news television has blurred or altogether erased the lines between news and slapstick entertainment. We at Punjab Today believe that readers such as yourself appreciate cerebral journalism, and would like you to hold us against the best international industry standards. Brickbats are welcome even more than bouquets, though an occasional pat on the back is always encouraging. Good journalism can be a lifeline in these uncertain times worldwide. You can support us in myriad ways. To begin with, by spreading word about us and forwarding this reportage. Stay engaged.

— Team PT

Punjab Today Logo (hindi)