जब “विकसित भारत” के सपने को साकार करने का लक्ष्य अब लगभग दो दशक दूर रह गया है, तब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की लगभग सभी प्रमुख संस्थाएं कमजोर और चरमराती हुई दिखाई दे रही हैं। पिछले कुछ दिनों में विभिन्न क्षेत्रों से आई खबरें कम से कम इतना तो संकेत देती ही हैं कि स्थिति चिंताजनक है।
संसद हो, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया, कानून लागू करने वाली एजेंसियां या चुनाव आयोग, इन संस्थाओं के मानकों और कामकाज में एक स्पष्ट और तेज गिरावट दिखाई दे रही है।
संसद और न्यायपालिका पर उठते सवाल
संसद के हाल ही में समाप्त हुए मानसून सत्र को ही लें। लोकसभा की कार्यवाही सत्र के लगभग हर दिन बार-बार स्थगित करनी पड़ी। विपक्ष के विरोध के बीच कई विधेयक महज कुछ मिनटों में पारित कर दिए गए। यह सरकार की उस विफलता को दर्शाता है जिसमें वह विपक्ष तक पहुंच बनाने और मुद्दों के समाधान के लिए गंभीर प्रयास करने में असफल रही।
प्रधानमंत्री और गृह मंत्री भी केवल संक्षिप्त उपस्थिति को छोड़कर सत्र में शामिल नहीं हुए, जबकि वे इस दौरान संसद परिसर में मौजूद रहे।
बार-बार हुए व्यवधानों के कारण यह पिछले एक दशक के सबसे कम उत्पादक सत्रों में से एक रहा। संसद अपनी निर्धारित कार्यावधि के केवल 15 प्रतिशत समय ही काम कर सकी। महीने भर चले सत्र में लोकसभा की कार्यवाही मात्र 17.5 घंटे चली। प्रश्नकाल, जिसके लिए सामान्यतः सत्र के प्रत्येक दिन एक घंटा निर्धारित होता है, पूरे सत्र में सिमटकर केवल नौ मिनट रह गया।
न्यायपालिका के कामकाज पर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं। ताजा मामला सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश द्वारा राजस्थान हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की ईमानदारी पर सवाल उठाने और उन पर अपनी शक्तियों के दुरुपयोग का आरोप लगाने का है। हाई कोर्ट में वकालत करने वाले वकीलों को भी विरोध प्रदर्शन करना पड़ा और मांग करनी पड़ी कि संबंधित न्यायाधीश को न्यायिक और प्रशासनिक दायित्वों से मुक्त किया जाए।
बाद में न्यायाधीश अवकाश पर चले गए, या उनसे ऐसा करने के लिए कहा गया, लेकिन इन आरोपों ने न्यायपालिका के एक हिस्से के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर यह वही संस्था है जिससे नैतिकता और ईमानदारी के सर्वोच्च मानकों की अपेक्षा की जाती है।
मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया पर चिंता
चुनाव आयोग भी अपने कई कृत्यों और चूकों के कारण लगातार अपनी विश्वसनीयता खोता रहा है। मतदाता सूचियों के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी एसआईआर, के संचालन को लेकर आयोग के पास जवाब देने के लिए बहुत कुछ है।
आयोग ने अपनी पात्रता साबित करने का पूरा बोझ नागरिकों पर डाल दिया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपने 2002 से पहले या उसके बाद मतदान किया था, आपको मतदाता होने की अपनी पात्रता के प्रमाण देने होंगे, जिनमें आपके माता-पिता और दादा-दादी से संबंधित दस्तावेज भी शामिल हो सकते हैं। यहां तक कि रक्षा सेवाओं के अधिकारियों, राजनयिकों और अन्य जाने-माने नागरिकों से भी अपनी वास्तविक पहचान और पात्रता साबित करने को कहा गया है।
कोई आश्चर्य नहीं कि अब तक प्रकाशित प्रारूप मतदाता सूचियों में 13 करोड़ नाम हटाए जाने की बात सामने आई है, जो पिछली मतदाता सूची की तुलना में 13.37 प्रतिशत की कमी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मृत्यु, पलायन या मतदाताओं के उपलब्ध न होने जैसे कारणों से नामों का वास्तविक रूप से हटाया जाना आवश्यक हो सकता है। लेकिन नए मतदाताओं की लगातार बढ़ती संख्या को भी इस गणना में शामिल किया जाना चाहिए।
महाराष्ट्र में मतदाताओं की संख्या में अचानक आई बढ़ोतरी और फिर भारी गिरावट को कैसे समझा जाए? राज्य में 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए मतदाता सूचियों के अनुसार मतदाताओं की संख्या 9.2 करोड़ थी। केवल चार महीने के भीतर विधानसभा चुनावों के लिए यह संख्या तेजी से बढ़कर 9.7 करोड़ हो गई और अब एसआईआर के बाद यह घटकर 7.7 करोड़ रह गई है!
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बढ़ता क्रोनी कैपिटलिज्म
सप्ताह की एक और चिंताजनक खबर सोनिया गांधी की आत्मकथा को प्रकाशित न करने के पेंगुइन इंडिया के फैसले से जुड़ी थी। बताया जाता है कि प्रकाशकों को नरेंद्र मोदी, सांप्रदायिक घटनाओं और भारतीय क्षेत्र में चीन की घुसपैठ से संबंधित संदर्भों पर आपत्ति थी। सोनिया गांधी ने इन संदर्भों को हटाने से इनकार कर दिया।
महत्वपूर्ण बात यह है कि पेंगुइन इंडिया की एक सहयोगी संस्था ने घोषणा की है कि वह पुस्तक के बिना संपादित संस्करण को अमेरिका में प्रकाशित करेगी। यह भी कहा गया है कि पहले संस्करण के लिए एक लाख प्रतियां छापने का आदेश दिया गया है। यानी पुस्तक भारत को छोड़कर दुनिया भर में अपने मूल, बिना संपादित रूप में उपलब्ध होगी।
सोशल मीडिया के इस दौर में उन अंशों को, जिन्हें प्रकाशक और संभवतः सरकार भी जनता तक नहीं पहुंचने देना चाहती थी, लोगों तक पहुंचने में अधिक समय नहीं लगेगा।
इस तरह का हस्तक्षेप, या जिसे आप सरकार का अदृश्य हाथ भी कह सकते हैं, अभिव्यक्ति और बोलने की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों के प्रयोग को लेकर गंभीर सवाल उठाता है। यदि सत्ता में बैठे लोग किसी सामग्री से असहमत हैं, तो वे अपनी बात रखने के लिए दूसरी पुस्तक लिख सकते हैं या लिखवा सकते हैं।
फिर एस्सेल समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा से जुड़ी खबर भी सामने आई, जिन्हें 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकार किए गए दावों के मुकाबले मात्र 6.25 करोड़ रुपये का भुगतान कर अपनी व्यक्तिगत दिवालियापन कार्यवाही का निपटारा करने की अनुमति दे दी गई। यह भारत में इतने स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे क्रोनी कैपिटलिज्म की धारणा को और मजबूत करता है।
लोकतंत्र इस तरह काम नहीं करते। जाने-माने लेखक, पत्रकार और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा कि हमें खुद को लोकतंत्र कहना बंद कर देना चाहिए। इसके बजाय इसे “चुनावी निरंकुशता” कहा जाना चाहिए।
देश में सत्ता के बढ़ते केंद्रीकरण को देखते हुए यह वर्णन पूरी तरह अनुचित भी नहीं लगता। ![]()
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