विरासत एक जीवित अनुभव होता है। एक आकर्षक तमाशा नहीं।
कृपया संलग्न किए वीडियो को देखिये। यह कुछ टुकड़ों को जोड़ कर बनाया है। मेरे पास ऐसे दर्जनों और टुकड़े भी आये, और कुछ तो इसलिए सम्मलित नहीं किये क्योंकि उन्हें देखना विचलित कर रहा था और दिखाना मेरे बस की बात नहीं लगी। यह जो टुकड़े जोड़े हैं, यही काफी हैं अपना और आपका हृदय छलनी करने के लिए।
समस्या केवल यह नहीं है कि रामलीला के मंच पर फिल्मी गानों पर नृत्य किया गया, या शूर्पणखा के प्रसंग को किसी लोकप्रिय फिल्मी गीत के सहारे प्रस्तुत किया गया। प्रश्न इससे कहीं अधिक गहरा है। हम अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराओं के साथ क्या कर रहे हैं? क्या हम उनका निर्वाह कर रहे हैं, उनका पुनर्पाठ कर रहे हैं, या धीरे-धीरे उन्हें उस मनोरंजन उद्योग के हवाले कर रहे हैं जिसकी सबसे बड़ी कसौटी है दर्शक का ध्यान खींचना, उसे उत्तेजित करना और उसका मनोरंजन करना?
यदि रामलीला के अनेक मंचों पर, छोटे-बड़े शहरों में, शूर्पणखा के प्रसंग से लेकर रावण के दरबार तक, फिल्मी गीतों और नृत्यों की एक ऐसी शृंखला दिखाई देती है जिसमें कथा, चरित्र और प्रसंग केवल नृत्य प्रस्तुत करने के बहाने बनकर रह जाते हैं, तो इसे महज कुछ आयोजकों की खराब रुचि कहकर नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। यह हमारी सामूहिक सांस्कृतिक चेतना में आ रहे बदलाव का संकेत है।
मैं अतीत की रामलीला से किसी अंधी श्रद्धा के कारण नहीं जुड़ा हूँ, ना ही आधुनिकता को हर सांस्कृतिक परिवर्तन का दोषी मानने वाला व्यक्ति हूँ। रामलीला स्वयं सदियों से बदलती रही है। लोक परम्पराओं ने अपने समय, भाषा, संगीत, अभिनय और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार रामकथा को नए रूप दिए हैं। लेकिन परिवर्तन और अवमूल्यन एक ही चीज नहीं हैं। नवीनता और सतहीपन में भी फर्क है। लोकप्रियता और सांस्कृतिक जीवंतता को एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जा सकता।
इसलिए असली सवाल यह है कि किसी परम्परा में परिवर्तन करते समय क्या बचाया जा रहा है, क्या बदला जा रहा है और क्या अनजाने में या जानबूझकर नष्ट किया जा रहा है?
दिल्ली के मंडी हॉउस वाले श्रीराम भारतीय कला केन्द्र में लगभग एक दशक तक रामलीला देखी मैंने, अक़्सर बहुत तन्मयता से। और बहुत बार भीगी आँखों से। जीवन और मौत के बड़े बड़े ख़्याल कितने दिन तक बेचैन कर देते थे। सोचता था यह रामलीला आखिर है क्या? एक नाटक? एक उत्सव? या एक धार्मिक अनुष्ठान? आसान नहीं था जवाब। क्योंकि रामलीला इन तीनों का सम्मिलित रूप रही है। वह नाटक भी है, सामुदायिक उत्सव भी और अनेक लोगों के लिए भक्ति का माध्यम भी।
रामलीला की परम्परा में रामकथा का मंचन केवल किसी प्राचीन आख्यान को दोहराने का उपक्रम नहीं रहा। उसके माध्यम से समाज अपने नैतिक आदर्शों को सामने रखता रहा है, अपने बच्चों को एक सांस्कृतिक संसार से परिचित कराता रहा है, अपने सामुदायिक जीवन को एक साझा स्मृति से जोड़ता रहा है। बहुत से दर्शकों के लिए राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान केवल किसी नाटक के पात्र नहीं होते। उनके साथ श्रद्धा, आत्मीयता, नैतिक अपेक्षाओं और भावनात्मक संबंधों का संसार जुड़ा होता है।
रामलीला के दर्शक और साधारण व्यावसायिक मनोरंजन के दर्शक के बीच यही एक महत्वपूर्ण अंतर है। मनोरंजन में दर्शक किसी प्रस्तुति को देखकर प्रसन्न हो सकता है, हँस सकता है, रोमांचित हो सकता है और फिर उसे भूलकर घर लौट सकता है। लेकिन धार्मिक-सांस्कृतिक प्रस्तुति से उसका संबंध कभी-कभी इससे बहुत आगे जाता है। वह उसमें अपने जीवन के आदर्शों, अपनी आस्थाओं और अपनी सामूहिक पहचान का प्रतिबिम्ब देखता है।
कौन कहता है कि रामलीला में मनोरंजन नहीं होना चाहिए? हास्य, संगीत, वीरता, नाटकीय तनाव, प्रेम, करुणा और दृश्य वैभव, यह सभी उसके स्वाभाविक अंग हो सकते हैं। लोकनाट्य की जीवंतता का एक बड़ा कारण ही यह है कि वह दर्शक को बाँधकर रखता है।
लेकिन यहाँ एक बुनियादी अंतर समझना आवश्यक है।
मनोरंजन किसी धार्मिक-सांस्कृतिक प्रस्तुति का एक तत्व हो सकता है; समस्या तब पैदा होती है जब मनोरंजन ही उसका एकमात्र उद्देश्य बन जाता है।
जब ऐसा होता है, तब कथा केवल एक बहाना रह जाती है। पात्र अपनी नैतिक और भावनात्मक जटिलता खोने लगते हैं। प्रसंग का अपना अर्थ पीछे चला जाता है और मंच पर वह सामग्री प्रमुख हो जाती है जो सबसे अधिक तालियाँ, सीटियाँ या मोबाइल कैमरों का ध्यान आकर्षित कर सके। तब रामलीला के मंच पर रामकथा नहीं, रामकथा के लोकप्रिय दृश्यों का इस्तेमाल करके मनोरंजन प्रस्तुत किया जा रहा होता है।
शूर्पणखा का प्रसंग एक जटिल कथा है, एक गंभीर बात कहता है, कथा में एक निर्णायक मोड़ लाता है। उसके बाद की घटनाएँ सीता-हरण, राम-रावण संघर्ष और अंततः लंका के युद्ध तक पहुँचती हैं। इस प्रसंग में आकर्षण, इच्छा, अस्वीकृति, अपमान, हिंसा, प्रतिशोध और सत्ता के अहंकार जैसे कई प्रश्न उपस्थित होते हैं। अस्सी और नब्बे के दशक में फ़ेमिनिस्टों ने इस प्रसंग और इसकी प्रस्तुति पर बहुत स्टीक सवाल उठाये थे। उन प्रश्नों पर आधुनिक दृष्टि से भी विचार किया जा सकता है।
शूर्पणखा को केवल हास्यास्पद, कुरूप या दंड की पात्र स्त्री के रूप में प्रस्तुत करना अनिवार्य नहीं है। कोई निर्देशक उसके चरित्र में इच्छा, असुरक्षा, आक्रामकता, आत्मसम्मान या सामाजिक मर्यादाओं से टकराव जैसे पहलुओं को भी तलाश सकता है। इन व्याख्याओं पर बहस हो सकती है, और होनी भी चाहिए।
लेकिन यदि इस जटिल प्रसंग को किसी भड़काऊ या द्विअर्थी फिल्मी गीत पर नृत्य कराने का अवसर बना दिया जाए, तो एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है: क्या उस प्रस्तुति ने कथा के अर्थ में कुछ जोड़ा, या उसने कथा का उपयोग करके एक स्वतंत्र मनोरंजक प्रदर्शन प्रस्तुत कर दिया? दोनों में अंतर है।
किसी पात्र का नृत्य अपने आप में आपत्तिजनक नहीं है। भारतीय नाट्य परम्पराओं में नृत्य, संगीत, श्रृंगार और शारीरिक अभिव्यक्ति का पुराना स्थान है। शूर्पणखा की इच्छा या आकर्षण को नृत्य के माध्यम से व्यक्त करना भी कलात्मक रूप से संभव है। समस्या तब है जब चरित्र की इच्छा को केवल देह-प्रदर्शन, यौन संकेतों और परिचित फिल्मी मुद्राओं तक सीमित कर दिया जाता है।
तब चरित्र की जगह उसकी एक रूढ़ छवि ले लेती है। कथा की जगह उसका एक आकर्षक दृश्य ले लेता है।
और यह भी ध्यान देने योग्य है कि किसी महिला पात्र की इच्छा को हास्य या तमाशे में बदल देना, विशेषकर जब उसका अंत शारीरिक अपमान और विकृति से जुड़ा हो, दर्शकों को स्त्री की इच्छा के प्रति एक विशेष दृष्टि का अभ्यस्त बना सकता है। हर प्रस्तुति ऐसा प्रभाव उत्पन्न करेगी, यह कहना उचित नहीं होगा; लेकिन मंचन की भाषा और उसके निहितार्थों की जाँच करना आवश्यक है।
शूर्पणखा का प्रसंग मंच पर क्यों है? कथा को आगे बढ़ाने के लिए, चरित्र को समझने के लिए, या केवल एक नृत्य प्रस्तुत करने के लिए?
बहुत जगह से रावण के दरबार के दृश्य वाले वीडियो मिले हैं। मैंने इस वीडियो में भी एक आध टुकड़ा लगाया है। मैं मंचन में भव्यता, शक्ति, भय, अहंकार और वैभव का प्रदर्शन समझ सकता हूँ। अलग-अलग रामायणों में रावण का चरित्र भी एक जैसा नहीं है। यदि वह विद्वान है, शक्तिशाली शासक है, शिवभक्त है, संगीत का ज्ञाता है तो साथ ही अहंकार, अधिकार-लिप्सा तथा नैतिक अतिक्रमण का प्रतीक भी बनता है।
इसलिए उसके दरबार को संगीत और नृत्य से सजाना अपने आप में अनुचित नहीं है। लेकिन यदि रावण के दरबार का अर्थ ही फिल्मी गीतों पर नाचती हुई स्त्रियों की कतार बन जाए, तो दृश्य की सांस्कृतिक कल्पना सीमित हो जाती है। रावण का दरबार सत्ता और वैभव का स्थान होने के साथ-साथ उसके चरित्र की परीक्षा का भी स्थल है। सत्ता कल भी और आज भी अपने चारों ओर चाटुकारिता, प्रदर्शनप्रियता और विलासिता का संसार निर्मित करती है, परन्तु जब प्रस्तुति स्वयं उसी प्रदर्शनप्रियता की नकल करने लगती है, तब व्यंग्य और अनुकरण के बीच का अंतर मिट सकता है।
मान लीजिए कि किसी निर्देशक का उद्देश्य रावण की भोगवादी सत्ता को दिखाना है। वह जानबूझकर एक अतिरंजित, भड़कीला और असहज दृश्य रचता है। यह एक वैध नाटकीय प्रयोग हो सकता है। लेकिन यदि उद्देश्य केवल दर्शकों को आकर्षित करना है और नृत्य के बाद कथा फिर अपनी गति पकड़ लेती है, तो उस दृश्य को रावण की सत्ता पर कोई आलोचनात्मक टिप्पणी मान लेना कठिन होगा।
रामायण की कथा हमारी कल्पना को बड़ा करती है। इस तरह का भौंडापन उसे बॉलीवुड के घटिया साँचे में ढाल सकता है। इससे रावण का दरबार अपनी स्वतंत्र सांस्कृतिक कल्पना खोकर किसी फिल्मी सेट का विस्तार बन जाता है।
मैं यह समझ सकता हूँ कि पिछले कई दशकों में लोकप्रिय भारतीय सिनेमा ने हमारी सामूहिक कल्पना को गहराई से प्रभावित किया है। नायक कैसे प्रवेश करेगा, खलनायक कैसे दिखाई देगा, प्रेम कैसे व्यक्त होगा, स्त्री का आकर्षण किस तरह प्रदर्शित किया जाएगा, युद्ध कैसा लगेगा, भावनात्मक उत्कर्ष पर संगीत कितना ऊँचा होगा, इन सबके लिए सिनेमा ने एक व्यापक दृश्य और श्रव्य शब्दावली निर्मित की है, लेकिन लोकप्रिय संस्कृति का प्रसार और सांस्कृतिक परम्परा का आत्मसमर्पण दो अलग बातें हैं।
जब सवाल यह हो कि किसी रामलीला में कोई नया गीत शामिल किया जाए, तो यह पूछना उचित होगा कि क्या वह गीत उस दृश्य को कोई नया अर्थ देता है? क्या उसकी भाषा, लय और भाव कथा की संवेदना के अनुकूल हैं? क्या उसके प्रयोग से दर्शक पात्र को बेहतर समझता है? या वह केवल एक पहचानी हुई धुन के कारण तत्काल प्रतिक्रिया प्राप्त करने का साधन है?
मेरी मुश्किल फ़िल्मी गानों से नहीं है। फिल्मी संगीत का विवेकपूर्ण उपयोग रामलीला को नया जीवन दे सकता है। कोई नया संगीतकार रामकथा के लिए मौलिक धुनें रच सकता है। कोई निर्देशक समकालीन संगीत की सहायता से प्राचीन कथा में नए अर्थ खोज सकता है। लेकिन इन दृश्यों में आप को क्या दिख रहा है?
क्या अब रामलीला आकर्षक नहीं रही? क्या लोकसंगीत, क्षेत्रीय नृत्य, शास्त्रीय कलाएँ, मौलिक नाट्य-लेखन और समृद्ध मौखिक परम्पराएँ इतनी निर्बल हो चुकी हैं कि दर्शकों को बाँधे रखने के लिए ऐसे फिल्मी गीतों और नाच का सहारा अनिवार्य हो गया है? मैं किसी सांस्कृतिक शुद्धतावाद से नहीं पूछ रहा, बल्कि इतना मात्र अर्ज़ कर रहा हूँ कि शायद अब अपनी कलात्मक क्षमताओं के प्रति हमारा विश्वास ही नहीं रह गया।
यदि राम का मुकुट, सीता का वेश, हनुमान की गदा, रावण के दस सिर वाला मंचन धार्मिक अनुभव उत्पन्न करने में सफल नहीं हो रहे तो इसका मतलब है हम अब करुणा में, मर्यादा में, त्याग में, कर्तव्य में, नैतिक दुविधा में, अन्याय के विरुद्ध खड़े होने में, अथवा मनुष्य की अपनी सीमाओं को पहचानने में जो भाव उत्पन्न होते हैं, उन्हें महसूस नहीं कर पा रहे। अपाहिज हो चुके हैं।
कोई नहीं कहता कि फिल्मी संगीत का इस्तेमाल होते ही धार्मिकता समाप्त हो जाती है लेकिन यदि किसी प्रस्तुति में धार्मिक कथा के सभी बाहरी चिह्न मौजूद हों और उसकी आंतरिक संवेदना लगातार मनोरंजन की माँग के सामने दबती जाए, तो हमें पूछना चाहिए कि वह किस प्रकार का सांस्कृतिक अनुभव निर्मित कर रही है।
अब हम कथा में सहभागी दर्शक नहीं हैं, दृश्य के उपभोक्ता हैं। अगला गीत कौन-सा होगा, नर्तकी कौन-सी मुद्रा बनाएगी और अगला दृश्य मोबाइल में रिकॉर्ड करने लायक होगा या नहीं, यह हमारी रामायण का सच बन चुका है।
रामायण का बड़ा सबक मर्यादा है। और आप ने इन वीडियो में क्या देखा?
यह संकट केवल रामलीला का नहीं है। हमारे समय में अनेक सांस्कृतिक गतिविधियों पर यह दबाव है कि वे अधिक आकर्षक हों, अधिक तेज़ हों, अधिक दृश्यात्मक हों और अधिक आसानी से साझा की जा सकें। धार्मिक आयोजन भी इससे अछूते नहीं हैं।
कथा-वाचन में मंचीय नाटकीयता बढ़ती जा रही है। धार्मिक उत्सवों में संगीत और प्रकाश का वैभव बढ़ा है। सांस्कृतिक आयोजनों को सोशल मीडिया के लिए छोटे-छोटे, प्रभावशाली दृश्यों में बदलने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
यह मंचन बहुत सी रामायण की जगह एक अजब गजब रामायण रच रहे हैं। तुलसीदास की रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण, कम्ब रामायण, कृतिवासी रामायण और अन्य लोक-आख्यान अपनी-अपनी विशिष्टताओं के साथ जीवित हैं। इनके राम, रावण, सीता और शूर्पणखा के चित्रण में महत्वपूर्ण अंतर मिलते हैं।
रामलीला की शक्ति भी इस बहुलता में है। लेकिन इन विविध परम्पराओं की जगह एक ही प्रकार का फिल्मी दृश्य-विधान बन चुका है। एक जैसी नृत्य-मुद्राएँ, एक जैसी उत्तेजना, एक जैसे गाने, और एक जैसा मंचन। विविधता नहीं, प्रदूषित सांस्कृतिक एकरूपता की स्थापिती।
शायद हमें लगता है कई देवताओं और पौराणिक पात्रों को सेलिब्रिटी बनाने की ज़रूरत है। यहीं से भूल शुरू होती है।
उल्लास और उपभोग एक नहीं हैं। भक्ति और प्रदर्शन एक नहीं हैं। धार्मिक प्रतीकों का उपयोग और धार्मिक संवेदना का संप्रेषण भी एक नहीं हैं।
नैतिक पुलिसिंग से बचते हुए धार्मिक और सांस्कृतिक गरिमा की चिंता की बात कैसे करे कोई? क्या यह बहस करे कि कौन-सा गीत अश्लील है, किस नर्तकी की पोशाक अनुचित है या किस प्रकार का नृत्य धार्मिक मंच पर प्रतिबंधित होना चाहिए? ऐसा करने से मूल प्रश्न पीछे छूट सकता है। इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न पूछिए।
हम रामायण से क्या चाहते हैं? यही एक बुनियादी प्रश्न हमें रास्ता दिखायेगा। यह नहीं पूछेंगे तो रामकथा अपनी आवाज़ खो बैठेगी। मात्र किसी कमसिन कन्या का फूहड़ नृत्य बाकी रह जायेगा, और आने वाली पीढ़ी उसे रामलीला कहेगी। ![]()
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