November 2, 2026

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उदार भारत फिर लौट रहा है राजनीतिक विमर्श के केंद्र में?

1 नवंबर की दिल्ली रैली ने विपक्षी एकजुटता के साथ लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समावेशी भारत की उम्मीदों को फिर जगाया है।

कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष की विशाल रैली का मोदी सरकार पर वास्तविक राजनीतिक प्रभाव क्या होगा, यह समझने में अभी कुछ समय लग सकता है।

लेकिन इसका एक तात्कालिक असर साफ दिखाई देने लगा है—समाज के एक हिस्से और उदारवादी जनमत पर छाया भय का माहौल टूटता नजर आ रहा है। जो लोग धीरे-धीरे यह मानने लगे थे कि सत्तावादी शासन अब एक स्थायी वास्तविकता बन चुका है, उन्हें कुछ राहत और नई उम्मीद मिली है।

लंबे समय से धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक विचारधारा से जुड़े लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, पेशेवरों और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग में यह धारणा मजबूत होती जा रही थी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस)-भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के शासन का कोई अंत दिखाई नहीं देता।

उन्हें लगता था कि भाजपा ने चुनावी राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने और सत्ता को लगातार केंद्रीकृत करने की ऐसी कला विकसित कर ली है कि उसे सत्ता से हटाना लगभग असंभव हो जाएगा।

यह कुछ हैरान करने वाला है कि वे शुरुआत में ही आरएसएस-भाजपा की विचारधारा और उसके राजनीतिक चरित्र को ठीक से समझ नहीं पाए।

आरएसएस और उसके प्रमुख विचारकों—संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से लेकर एम.एस. गोलवलकर तक—की विचारधारा से थोड़ी-बहुत भी परिचितता रखने वाला व्यक्ति यह अनुमान लगा सकता था कि संघ से प्रेरित सरकार की शासन शैली कैसी हो सकती है।

वाजपेयी की विरासत और मोदी का उदय

संभवतः अटल बिहारी वाजपेयी का अपेक्षाकृत उदार व्यक्तित्व और सबके लिए खुले दरवाजे रखने की उनकी राजनीतिक शैली यह धारणा बनाने में सफल रही कि आरएसएस उतना कठोर और असहिष्णु नहीं है, जितना उसके राजनीतिक विरोधी बताते रहे हैं।

भारत की मिली-जुली गंगा-जमुनी तहजीब से प्रभावित और हृदय से कवि रहे वाजपेयी आरएसएस की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध थे, लेकिन उनका व्यवहार नरेंद्र मोदी जैसा कठोर या अहंकारी नहीं था। वेल्स हैन्गेन ने उनके व्यक्तित्व में एक प्रकार का ऐसा आत्मविश्वास देखा था, जो असहमति रखने वाले हर व्यक्ति को शत्रु मानने की प्रवृत्ति में नहीं बदलता था।

Vajpayee Advani Rajnath

इसके अतिरिक्त, मोदी के विपरीत, वाजपेयी पर अपने शक्तिशाली कॉरपोरेट मित्रों के एक खास समूह को बढ़ावा देने का कोई व्यक्तिगत एजेंडा दिखाई नहीं देता था।

जब मोदी यह दावा करते हैं कि उनके सत्ता में आने से पहले भारत ने 70 वर्षों में बहुत कम प्रगति की, तो वे सुविधापूर्वक उन छह वर्षों को भी इसी अवधि में शामिल कर लेते हैं, जब उनकी अपनी पार्टी के संस्थापक नेता ने देश की सरकार का नेतृत्व किया था।

वास्तव में वाजपेयी की अपेक्षाकृत नरम और कूटनीतिक शासन शैली ने ऐसा राजनीतिक वातावरण तैयार करने में भूमिका निभाई, जिसमें मोदी बिना किसी गंभीर प्रतिरोध का सामना किए सत्ता के शीर्ष तक पहुंच सके।

मोदी की शासन शैली भारत की उदार और लोकतांत्रिक राजनीतिक परंपराओं से काफी अलग रही है। स्वतंत्रता आंदोलन से विरासत में मिली प्रतिरोध की भावना और सत्ता प्रतिष्ठान से सवाल पूछने की परंपरा भारतीय राजनीति का अभिन्न हिस्सा रही है।

अहिंसक जन आंदोलन, सत्ता के सर्वोच्च पदों पर बैठे लोगों के प्रति बेबाकी और राजनीतिक सत्ता को चुनौती देने की स्वतंत्रता—ये स्वतंत्र भारत में कभी वर्जित नहीं रहे। समय के साथ ये हमारी लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा बन गए।

आरएसएस की विचारधारा और भारत की लोकतांत्रिक परंपराएं

स्वाधीनता संग्राम के दौरान संपन्न और कुलीन पृष्ठभूमि से आने वाले अनेक नेताओं ने अपने विशेषाधिकारों और संपत्ति का त्याग कर स्वतंत्रता की लड़ाई में हिस्सा लिया। उनके उदाहरण ने, भारतीय संस्कृति की उस परंपरा के साथ मिलकर, जिसमें राजाओं की तुलना में ऋषियों और संतों को अधिक सम्मान दिया जाता रहा है, भारतीयों की कई पीढ़ियों को धन-संपत्ति और राजनीतिक सत्ता से भयभीत न होना सिखाया।

यह सांस्कृतिक विरासत आरएसएस की अनुशासित और कठोर विचारधारा के बिल्कुल विपरीत थी। प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठा का दावा करने के बावजूद, इस संगठन ने द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले यूरोप में उभरे फासीवादी आंदोलनों से काफी प्रेरणा ली थी।

Rss Genie Modi

Rss Genie Modi

आरएसएस के कुछ हलकों में हिटलर के जर्मनी का उदाहरण कभी-कभी प्रशंसा के साथ दिया जाता था। इसके समर्थन में यह तर्क रखा जाता था कि सदियों की गुलामी और उत्पीड़न झेलने वाले हिंदुओं को मुस्लिम उत्पीड़न से अपनी रक्षा करने के लिए एक अनुशासित और संघर्षशील शक्ति के रूप में संगठित होने की आवश्यकता है।

यह विचार भारतीय समाज और उसके इतिहास की विकृत समझ को दर्शाता है। इसके बावजूद, हिंदुओं के कुछ वर्गों में इसे समर्थन मिला, विशेषकर उन लोगों के बीच जिन्होंने विभाजन और पाकिस्तान से विस्थापन की त्रासदी झेली थी।

भारतीय जनसंघ की स्थापना 1951 में हुई थी, जो आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी का पूर्ववर्ती संगठन बना। लेकिन आरएसएस की व्यापक वैचारिक परियोजना का मूल उद्देश्य उन पारंपरिक सामाजिक और सत्ता-संबंधी ढांचों को बनाए रखना रहा है, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से उच्च जातियों के हिंदुओं को विशेषाधिकार प्रदान किए हैं।

ये सामाजिक संरचनाएं भारत में इस्लाम के आगमन और मुस्लिम शासकों के आने से भी बहुत पहले से मौजूद थीं।

संभव है कि मोदी आरएसएस के भीतर मौजूद इन सभी गहरे वैचारिक आग्रहों को पूरी तरह न समझ पाए हों, लेकिन उन्होंने उसके बहुसंख्यकवादी और अल्पसंख्यक-विरोधी एजेंडे को असाधारण उत्साह के साथ लागू किया।

Media Ghantaउनके कॉरपोरेट समर्थकों ने उन्हें वित्तीय संसाधन, प्रबंधन संबंधी विशेषज्ञता और प्रभावशाली मीडिया मंचों तक पहुंच उपलब्ध कराई।

भारत के जटिल सामाजिक इतिहास की उनकी सीमित समझ ने भी उन्हें देश की असाधारण सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता को पहचानने से रोके रखा।

भारतीय जनता पार्टी के भीतर और उसके बाहर, राजनीतिक सत्ता, धन और सरकारी तंत्र के संयुक्त इस्तेमाल के जरिए असहमति की आवाजों को व्यवस्थित रूप से दबाया गया।

सत्ता के प्रति अनुकूल नौकरशाही और समझौतावादी मीडिया ने मोदी की एक ऐसी छवि गढ़ने में मदद की, जो वास्तविकता से कहीं अधिक विराट थी।

इस व्यक्तित्व-पूजा से प्रोत्साहित होकर मोदी का व्यवहार लगातार एक निरंकुश शासक जैसा होता गया। ऐसा लगता था कि वे यह भूल गए थे कि लोकतंत्र में सबसे शक्तिशाली सरकार भी संवैधानिक और संस्थागत सीमाओं के भीतर ही काम करती है।

विपक्षी प्रतिरोध और भय के माहौल का टूटना

हजार वर्षों के बाद कथित रूप से हिंदू शासन की पुनर्स्थापना को लेकर पैदा हुआ शुरुआती उत्साह जब धीरे-धीरे कम होने लगा, तब आर्थिक वास्तविकताएं सामने आने लगीं। इसके साथ ही भाजपा के चुनावी प्रदर्शन में भी कमजोरी के संकेत दिखाई देने लगे।

इसके बावजूद विपक्षी दल, उदारवादी विचार मंच, मध्यवर्गीय पेशेवर और बुद्धिजीवी इन बदलावों के महत्व को व्यापक रूप से पहचानने में असफल रहे। उनमें से अनेक ने यह मान लिया था कि उन्हें एक ऐसे शासन के साथ जीना होगा, जिसे वे नव-फासीवादी व्यवस्था के रूप में देखते थे।

राहुल गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव और लालू प्रसाद यादव जैसे कुछ विपक्षी नेताओं के लगातार प्रयासों को अक्सर निरर्थक मानकर खारिज कर दिया गया। इसी तरह कुछ पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा उठाई जा रही आवाजों को भी राजनीतिक परिस्थितियों को बदलने में अक्षम समझा गया।

लेकिन सत्तावादी और अनुशासित समाज को नियति मानकर स्वीकार कर चुके लोग भी गलत थे। मोदी शासन में असहमति की गुंजाइश निश्चित रूप से सीमित हुई और सार्वजनिक विरोध तथा प्रदर्शन पहले की तुलना में अधिक कठिन और जोखिम भरे बने। लेकिन भारत का राजनीतिक भविष्य किसी एक शासन की अंतिम घोषणा से तय नहीं हो सकता—चाहे चुनावी प्रक्रियाओं में कथित हेरफेर के आरोप ही क्यों न हों।

Delhi Rally Nov 1भारत इतना जटिल और विविधतापूर्ण देश है कि उसे किसी संकीर्ण और सांप्रदायिक विचारधारा के नियंत्रण में हमेशा के लिए नहीं रखा जा सकता। सत्ता से सवाल पूछने और दमनकारी शासकों का विरोध करने की हमारी एक लंबी परंपरा रही है।

लोकतांत्रिक शासन के 75 वर्षों, लोकसभा के बारह चुनावों और राज्यों की विधानसभाओं के लगभग 500 चुनावों ने इन लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों और संस्थाओं को और मजबूत किया है।

आरएसएस-भाजपा नेतृत्व, विशेषकर मोदी और उनके गुजरात से जुड़े राजनीतिक समूह ने यह मानकर गलती की कि राजनीतिक व्यवस्था पर उनका लगभग पूर्ण नियंत्रण अनिश्चितकाल तक कायम रह सकता है।

इसी तरह विपक्ष और नागरिक समाज के वे लोग भी गलत साबित हुए, जिन्होंने सत्तावादी शासन को एक अपरिवर्तनीय वास्तविकता मानना शुरू कर दिया था।

1 नवंबर की रैली अपने आप में भारतीय राजनीति का निर्णायक मोड़ साबित हो, यह जरूरी नहीं है। लेकिन इसका बड़ा महत्व उन लोगों में विश्वास बहाल करने में है, जो लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, बहुलतावाद और संवैधानिक मूल्यों में आस्था रखते हैं।

इस रैली ने उन्हें यह याद दिलाया है कि प्रतिरोध संभव है और राजनीतिक बदलाव की संभावना अभी समाप्त नहीं हुई है।

समावेशी, धर्मनिरपेक्ष और उदार भारत का विचार एक बार फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लौटता दिखाई दे रहा है।Punjab Today Logo
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