मैंने कई लोगों से तीन सवालों के जवाब देने को कहा था।
- मुग़लों ने अपनी मातृभाषा तुर्की के बजाय फ़ारसी को राजदरबार की भाषा क्यों बनाया?
- फ़ारसी, जो ईरान की भाषा है, भारत कैसे पहुँची और सदियों तक देश के अनेक हिस्सों में दरबारी भाषा कैसे बनी रही?
- फ़ारसी और उर्दू में बुनियादी अंतर क्या है और उर्दू भाषा का जन्म कैसे हुआ?
कोई भी इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। इसलिए मैं स्वयं इनका उत्तर प्रस्तुत कर रहा हूँ।
फ़ारसी दरबारी भाषा कैसे बनी और उर्दू का उदय कैसे हुआ?
मुग़लों ने तुर्की के बजाय फ़ारसी क्यों चुनी?
मुग़लों ने अपनी मातृभाषा तुर्की के बजाय फ़ारसी को दरबार की भाषा इसलिए बनाया, क्योंकि दरबारी भाषा में परिष्कार, शालीनता, लालित्य और गरिमा होनी चाहिए। फ़ारसी को फ़िरदौसी, हाफ़िज़, रूमी, सादी और उमर ख़य्याम जैसे महान कवियों ने अत्यंत परिष्कृत, सुरुचिपूर्ण और प्रभावशाली भाषा के रूप में विकसित किया था।
इस दृष्टि से तुर्की फ़ारसी की बराबरी नहीं कर सकती थी। तुर्की में उस समय ऐसे लेखक और कवि नहीं थे जिनकी तुलना ऊपर उल्लिखित फ़ारसी साहित्यकारों से की जा सके। यही कारण था कि फ़ारसी भारत सहित दक्षिण-पूर्व एशिया के बड़े हिस्से में फैल गई।
इस प्रकार, यद्यपि बाबर ने अपनी आत्मकथा तुज़ुक-ए-बाबरी तुर्की में लिखी थी, लेकिन उनके पौत्र अकबर ने उसका फ़ारसी में अनुवाद करवाया और उसे बाबरनामा नाम दिया। अकबर की जीवनी अकबरनामा, जिसे अबुल फ़ज़ल ने लिखा, फ़ारसी में है।
यही बात उनके पुत्र जहाँगीर की आत्मकथा जहाँगीरनामा और शाहजहाँ की जीवनी शाहजहाँनामा के बारे में भी कही जा सकती है।
फ़ारसी भारत कैसे पहुँची?
कुछ लोगों के मन में यह सवाल उठ सकता है कि फ़ारसी भारत कैसे आई, जबकि यह भारत की मूल भाषा नहीं है।
इसका उत्तर यह है कि समाज का अभिजात वर्ग अक्सर आम लोगों से अपनी अलग पहचान बनाने के लिए किसी विदेशी भाषा का इस्तेमाल करता है। उदाहरण के लिए, आज भारत का अभिजात वर्ग अंग्रेज़ी बोलता है।
किसी विदेशी भाषा का उच्च वर्ग या राजदरबार की भाषा बन जाना कोई अनोखी बात नहीं है। उदाहरण के लिए, उन्नीसवीं सदी तक फ़्रेंच भाषा रूस, जर्मनी और यूरोप के बड़े हिस्से के अभिजात वर्ग की भाषा थी।
जब कोई रूसी कुलीन व्यक्ति दूसरे रूसी कुलीन व्यक्ति से बात करता था, तो अक्सर फ़्रेंच में बात करता था, जबकि अपने सेवक से रूसी में बोलता था। इसी तरह, जर्मन अभिजात वर्ग के लोग आपस में फ़्रेंच में बातचीत करते थे, लेकिन अपने सेवकों से जर्मन में।
टॉल्स्टॉय के उपन्यास वॉर एंड पीस में भी हम देखते हैं कि रूसी सेनापति, जो सभी रूसी अभिजात वर्ग से थे, आपस में अक्सर फ़्रेंच में बात करते थे, जबकि उनका शत्रु नेपोलियन स्वयं फ़्रेंच था।
दिल्ली सल्तनत की दरबारी भाषा भी फ़ारसी थी, जबकि दिल्ली के अधिकांश सुल्तान अफ़ग़ान थे, फ़ारसी नहीं। उनकी मातृभाषा पश्तो थी, लेकिन उन्होंने फ़ारसी को दरबारी भाषा बनाया, क्योंकि उसे पश्तो की तुलना में अधिक परिष्कृत, सुरुचिपूर्ण और गरिमापूर्ण माना जाता था।
अकबर के वित्त मंत्री राजा टोडरमल ने पूरे मुग़ल साम्राज्य के राजस्व और न्यायिक अभिलेख फ़ारसी में लिखवाने की व्यवस्था की थी।
फ़ारसी और उर्दू में क्या अंतर है?
फ़ारसी और उर्दू के बीच अंतर समझने के लिए पहले यह समझना आवश्यक है कि किसी वाक्य की भाषा निर्धारित करने में उसकी क्रिया की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। हिंदी में इसे ‘क्रिया’ और उर्दू में ‘फ़ेअल’ कहा जाता है।
मान लीजिए मैं कहता हूँ, “Mr Ram, aaiye to my house for dinner with your wife for dinner at 8 pm.” इस वाक्य में अधिकांश शब्द अंग्रेज़ी के हैं, लेकिन इसकी क्रिया ‘आइए’ हिंदुस्तानी की है। इसलिए यह अंग्रेज़ी नहीं, बल्कि हिंदुस्तानी यानी सरल हिंदी का वाक्य है।
इसी तरह, किसी भी उर्दू शायर का शेर उठाकर देख लीजिए। उसमें क्रिया सामान्यतः हिंदुस्तानी की होगी, जबकि संज्ञाएँ और विशेषण अक्सर फ़ारसी या अरबी के होंगे। यदि शेर की क्रिया फ़ारसी की है, तो वह फ़ारसी का शेर होगा; और यदि क्रिया अरबी की है, तो वह अरबी का शेर होगा।
मिसाल के तौर पर ग़ालिब का यह शेर देखिए:
“देखो मुझे जो दीदा-ए-इबरत निगाह हो
मेरी सुनो जो गोश-ए-नसीहत नियोश है।”
इस शेर में ‘देखो’, ‘सुनो’ और ‘है’ जैसी क्रियाएँ सरल हिंदी की हैं, जबकि कई संज्ञाएँ और विशेषण फ़ारसी या अरबी से आए हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि उर्दू एक देशज भाषा है, क्योंकि इसकी क्रियाओं का आधार हिंदुस्तानी है। इसलिए इसे फ़ारसी और अरबी जैसी विदेशी भाषाओं की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए।
मुग़ल दरबार की भाषा फ़ारसी से उर्दू कैसे बनी?
एक सवाल यह भी है कि शक्तिशाली मुग़लों के शासनकाल में, यानी औरंगज़ेब तक, दरबार की भाषा फ़ारसी थी, लेकिन बाद के मुग़लों के समय में धीरे-धीरे उर्दू दरबारी भाषा कैसे बन गई?
इसका कारण यह था कि बाद के मुग़ल वास्तविक अर्थों में सम्राट नहीं रह गए थे। उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई थी और वे आम लोगों के अधिक निकट आ गए थे। उन्हें भी आम आदमी की तरह जीवन की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। इसलिए उन्हें ऐसी भाषा का सहारा लेना पड़ा जो आम लोगों की भाषा के अधिक करीब थी।
लेकिन फिर उनके दरबार की भाषा आम लोगों की हिंदुस्तानी क्यों नहीं बनी?
इसका कारण यह था कि आर्थिक रूप से कमजोर हो जाने के बावजूद बाद के मुग़लों ने अपनी गरिमा, संस्कृति और आत्मसम्मान बनाए रखा था। उन्हें इस बात पर गर्व था कि वे तैमूर के वंशज और महान मुग़ल शासकों की परंपरा से आते हैं।
इसलिए वे आम लोगों की तरह व्यवहार किए जाने को तैयार नहीं थे। उन्होंने फ़ारसी छोड़कर हिंदुस्तानी को तो अपनाया, लेकिन वह आम आदमी की हिंदुस्तानी नहीं थी। उसमें फ़ारसी भाषा की परिष्कृत शैली, नफ़ासत और शब्दावली का समावेश था।
दूसरे शब्दों में, वे ऐसी हिंदुस्तानी बोलते थे जिसमें फ़ारसी की शालीनता, परिष्कार और सांस्कृतिक समृद्धि शामिल थी।
इस प्रकार उर्दू ऐसे अभिजात वर्ग की भाषा बनी, जो आर्थिक रूप से भले ही कमजोर हो गया था, लेकिन अपनी गरिमा, गौरव और आत्मसम्मान बनाए रखना चाहता था।
उर्दू के महानतम शायर ग़ालिब के बारे में एक प्रसिद्ध प्रसंग है। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने एक नौकरी का प्रस्ताव केवल इसलिए ठुकरा दिया था क्योंकि जब वे अपनी सेवाएँ देने पहुँचे तो उनके स्वागत के लिए कोई मौजूद नहीं था।
उर्दू बोलने वालों की इसी आत्मसम्मान की भावना को जोश मलीहाबादी के इन पंक्तियों में देखा जा सकता है:
“हश्र में भी ख़ुसरवाना शान से जाएँगे हम
और अगर पुरसिश न होगी, तो पलट आएँगे हम।”
अर्थात, क़यामत के दिन भी हम शान से जाएँगे और यदि हमारा सम्मान नहीं हुआ तो वापस लौट आएँगे।
उर्दू का दोहरा स्वरूप और भारतीय समाज में उसका स्थान
इस प्रकार उर्दू एक ओर अभिजात वर्ग की भाषा है, तो दूसरी ओर आम लोगों की भी भाषा है।
यह आम आदमी की भाषा इसलिए है क्योंकि इसकी बुनियाद हिंदुस्तानी है, जो आम लोगों की भाषा रही है। लेकिन यह केवल आम आदमी की भाषा नहीं है, क्योंकि इसके ऊपर फ़ारसी की एक परिष्कृत परत भी है, जो इसे नफ़ासत, शालीनता और गरिमा प्रदान करती है।
इसलिए उर्दू का दोहरा स्वरूप है। यह आम जनता की ज़ुबान भी है और अभिजात वर्ग की भाषा भी।
यह बात विरोधाभासी लग सकती है, लेकिन यही उर्दू की खूबसूरती है। यह आम लोगों की समस्याओं, चिंताओं, दुखों और आशाओं को व्यक्त करती है, लेकिन ऐसा करते हुए इसकी अभिव्यक्ति में शालीनता, परिष्कार और गरिमा भी बनी रहती है।
जैसा कि पहले कहा गया है, उर्दू मूलतः दो भाषाई परंपराओं का मेल है। एक ओर हिंदुस्तानी या सरल हिंदी है, जो आम लोगों की भाषा है, और दूसरी ओर फ़ारसी है, जो लंबे समय तक अभिजात वर्ग की भाषा रही।
यह भी स्पष्ट किया जा चुका है कि उर्दू मूलतः फ़ारसी का कोई रूप नहीं, बल्कि हिंदुस्तानी का एक विशेष रूप है, क्योंकि इसकी क्रियाएँ हिंदुस्तानी से आती हैं।
इसी आधार पर कहा जा सकता है कि उर्दू की विषयवस्तु यानी उसमें व्यक्त भावनाएँ और विचार आम लोगों के जीवन से आते हैं, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति की शैली अभिजात वर्ग की है।
दूसरे शब्दों में, उर्दू आम लोगों की परेशानियों, दुखों, चिंताओं, आशाओं और आकांक्षाओं को व्यक्त करती है, लेकिन उसका अंदाज़-ए-बयाँ आम आदमी का नहीं, बल्कि एक अभिजात व्यक्ति का होता है।
उर्दू के महानतम शायर ग़ालिब को साधारण और आम बोलचाल की अभिव्यक्ति से परहेज़ था। वे स्वयं को अभिजात मानते थे और आम लोगों से अलग दिखने की तीव्र इच्छा रखते थे। उनकी शायरी मौलिकता और परंपरा से हटकर सोचने के लिए जानी जाती है।
ग़ालिब का दृढ़ विश्वास था कि कविता की भाषा आम लोगों की रोज़मर्रा की बोलचाल जैसी नहीं होनी चाहिए। यही कारण है कि उनकी शायरी में फ़ारसी का प्रभाव बहुत अधिक है। वे अपने विचारों को सीधे कहने के बजाय रूपकों, संकेतों और इशारों के माध्यम से व्यक्त करते थे।
यही बात अनेक दूसरे उर्दू शायरों पर भी लागू होती है। वे अपनी भावनाओं और विचारों को सरल तथा सीधे शब्दों में व्यक्त करने के बजाय रूपकों, संकेतों, इशारों और घुमावदार अभिव्यक्तियों का सहारा लेते थे। इसका उद्देश्य अपनी अभिव्यक्ति को अधिक परिष्कृत और विशिष्ट बनाना था।
कभी-कभी इससे उनकी रचनाएँ समझने में कठिन हो जाती थीं। महान उर्दू आलोचक और जीवनीकार हाली का मानना था कि ग़ालिब के लगभग एक-तिहाई शेर इतने जटिल हैं कि उन्हें उर्दू की सामान्य समझ के दायरे में रखना कठिन है। कई बार एक ही शेर के अनेक अर्थ निकाले जा सकते हैं।
फिर भी, उर्दू की यही अभिजात शैली और नफ़ासत उसे प्रभावशाली बनाती है। इसी के माध्यम से वह आम लोगों की भावनाओं और विचारों को भी अत्यंत ताकत के साथ व्यक्त कर पाती है।
फ़ारसी की जगह उर्दू का आना
भारत में जब तक शक्तिशाली मुग़ल सम्राट रहे, यानी 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु तक, फ़ारसी दरबार की भाषा बनी रही। उसका प्रभुत्व इतना अधिक था कि उत्तर भारत में उर्दू को कभी वैसी प्रतिष्ठा नहीं मिली और वह दरबारी भाषा नहीं बन सकी। उसे अपेक्षाकृत कमतर भाषा माना जाता था।
इसके बजाय उर्दू को दक्षिण भारत और गुजरात में आश्रय मिला, जहाँ वह वहाँ की सल्तनतों के अभिजात वर्ग की भाषा बनी।
दिलचस्प बात यह है कि उर्दू उत्तर भारत की भाषा थी, लेकिन उसका विकास दक्षिण भारत में हुआ। गोलकुंडा, बीजापुर, अहमदनगर और अन्य दक्षिणी सल्तनतों में मुस्लिम शासकों ने उसे संरक्षण दिया और वह वहाँ दरबारी भाषा बन गई।
इस प्रकार महान मुग़लों के शासनकाल में उर्दू दक्षिण भारत और गुजरात में दरबारी भाषा बन गई, लेकिन उत्तर भारत में शक्तिशाली मुग़लों के रहते फ़ारसी को हटाने में सफल नहीं हुई।
दक्षिण भारत में उर्दू को इसलिए भी प्रतिष्ठा मिली क्योंकि वहाँ वह एक बाहरी भाषा थी। स्थानीय भाषाएँ तेलुगु, तमिल, कन्नड़ और अन्य थीं। जैसा कि मैंने पहले कहा है, किसी समाज का अभिजात वर्ग अक्सर आम लोगों से अलग पहचान बनाने के लिए विदेशी भाषा को अपनाता है।
दक्षिण भारत के सुल्तानों ने उर्दू को संरक्षण दिया। कविता और साहित्य को फलने-फूलने के लिए संरक्षण की आवश्यकता होती है, क्योंकि कवि को भी अपना पेट पालना होता है।
उस समय उत्तर भारत में उर्दू को कमतर समझा जाता था और फ़ारसी को आदर्श भाषा माना जाता था। इसके विपरीत, दक्षिण भारत और गुजरात में उर्दू अभिजात वर्ग के बीच लोकप्रिय हुई और उसे संरक्षण मिला।

औरंगज़ेब
इस संदर्भ में दक्षिण भारत के महान उर्दू कवि वली दकनी का उदाहरण उल्लेखनीय है। जब वे लगभग 1700 ईस्वी में औरंगज़ेब के शासनकाल में दिल्ली आए, तब तक उनकी प्रसिद्धि दिल्ली पहुँच चुकी थी। दिल्ली में वे बहुत लोकप्रिय हुए, क्योंकि उनकी कविता उर्दू में थी, जिसे आम लोग समझ सकते थे। इसके विपरीत, दिल्ली के अधिकांश शायर फ़ारसी में लिखते थे, जिसे आम जनता नहीं समझती थी।
वली दकनी को अक्सर उर्दू का जनक माना जाता है, क्योंकि उन्होंने दिल्ली के शायरों को यह संभावना दिखाई कि आम लोगों की समझ में आने वाली भाषा में भी उच्च कोटि की शायरी की जा सकती है। इस तरह उन्होंने उत्तर भारत में उर्दू को प्रतिष्ठा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद जब बाद के मुग़लों का दौर शुरू हुआ, तभी फ़ारसी की जगह धीरे-धीरे उर्दू ने लेनी शुरू की। यह बदलाव बहुत धीमा था और इसे सहजता से स्वीकार नहीं किया गया।
उदाहरण के लिए, 1857 के विद्रोह के समय तक जीवित रहे ग़ालिब फ़ारसी में अपनी शायरी को अधिक महत्व देते थे और अपनी उर्दू शायरी को अपेक्षाकृत कमतर मानते थे, जबकि उनकी महानता का आधार मुख्यतः उनकी उर्दू शायरी ही है।
उन्होंने अपने मित्र मुंशी शिव नारायण आराम को एक पत्र में लिखा था:
“मेरे दोस्त, मैं उर्दू में कैसे लिख सकता हूँ? क्या मेरी हैसियत इतनी गिर गई है कि मुझसे इसकी अपेक्षा की जाए?”
उस समय उर्दू में लिखना प्रतिष्ठा के विरुद्ध माना जाता था और सम्मानित लेखक फ़ारसी में लिखना पसंद करते थे।
मैं इसका एक और उदाहरण देना चाहूँगा। मेरे पूर्वज पंडित मानसा राम कटजू लगभग 1800 के आसपास कश्मीर से आए थे। कुरुक्षेत्र में पंडों के रजिस्टर में उन्होंने एक प्रविष्टि दर्ज कराई थी:
“बतलाश-ए-माश-आमदम।”
इसका अर्थ है, “रोज़ी-रोटी की तलाश में आया हूँ”, यानी नौकरी की तलाश में। अंततः उन्हें पश्चिमी मध्य प्रदेश में नवाब जावरा के दरबार में नौकरी मिली।
दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने यह वाक्य उर्दू में नहीं, बल्कि फ़ारसी में लिखा था।
उन दिनों शिक्षित वर्ग लिखने के लिए फ़ारसी का इस्तेमाल करता था। उर्दू भले ही बोलचाल की भाषा रही हो, लेकिन लिखित भाषा फ़ारसी थी।

ग़ालिब
ग़ालिब को अपनी तुर्की वंशावली पर गर्व था। वे उर्दू में लिखने के प्रति अनिच्छुक थे और फ़ारसी को प्राथमिकता देते थे। उनकी शुरुआती उर्दू शायरी भी फ़ारसी के प्रभाव से इतनी बोझिल थी कि उसे समझना कठिन था। उनके श्रेष्ठ शेर वे हैं जो उन्होंने बाद के दौर में लिखे, जब उनकी भाषा में खड़ी बोली का प्रयोग बढ़ा।
औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद 1707 में मुग़ल साम्राज्य का पतन उर्दू के लिए एक तरह से वरदान साबित हुआ, क्योंकि तभी उसे फ़ारसी की जगह लेने का अवसर मिला।
उर्दू का स्वर्णकाल बाद के मुग़लों के दौर में आया और अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र के समय यह अपने शिखर पर पहुँची।
1947 तक भारत के बड़े हिस्से में उर्दू अदालतों और शिक्षित लोगों की भाषा थी, चाहे वे हिंदू हों, मुसलमान हों या सिख। साथ ही, अपने दोहरे स्वरूप के कारण शहरी क्षेत्रों में यह आम लोगों की हिंदुस्तानी भी थी।
चूँकि उर्दू शहरी भारत के बड़े हिस्से में आम लोगों की भाषा थी, इसलिए उसने हर भाषा से शब्द ग्रहण किए और दूसरी भाषाओं के शब्दों को अपनाने में कभी संकोच नहीं किया। उदाहरण के लिए, अकबर इलाहाबादी की शायरी में अनेक अंग्रेज़ी शब्द मिलते हैं।
भारत के आम लोगों को उर्दू क्यों प्रिय है?
उर्दू आम लोगों की भाषा रही है, इसलिए वे इसे पसंद करते थे और आज भी करते हैं।
इस बात को तीन उदाहरणों से समझा जा सकता है।
पहला, आज भी हिंदी फ़िल्मों के अनेक गीत उर्दू में होते हैं। हृदय की आवाज़ अपनी भाषा में ही व्यक्त होती है, चाहे कुछ लोग उसे दबाने की कितनी भी कोशिश क्यों न करें।
मुझे याद है कि जब मैं युवा था, मेरी पीढ़ी के लोग ये गीत गाया करते थे:
“ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो।”
या
“दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन।”
उस समय हमें यह एहसास भी नहीं था कि ये गीत महान शायर ग़ालिब के शेरों पर आधारित हैं।
हम “जिन्हें नाज़ है हिंद पर वह कहाँ हैं” भी गाया करते थे। यह साहिर लुधियानवी की फ़िल्म प्यासा की पंक्ति “सना-ख़्वान-ए-तक़दीस-ए-मशरिक़ कहाँ हैं” का सरल रूप है।
आज की युवा पीढ़ी “मुन्नी बदनाम हुई” और “शीला की जवानी” जैसे गीत गाती है, जिन्हें मैं निरर्थक मानता हूँ।
दूसरा उदाहरण रेलवे स्टेशनों के पुस्तक विक्रय केंद्रों का है। वहाँ ग़ालिब, मीर, फ़ैज़, जोश, फ़िराक़, हाली, दाग़, मजाज़, ज़ौक़ और अन्य उर्दू शायरों की किताबें बिकती हैं। आजकल ये किताबें अक्सर देवनागरी लिपि में भी उपलब्ध होती हैं।
हमें बताया जाता है कि हिंदी आम लोगों की भाषा है, उर्दू नहीं। तो फिर रेलवे स्टेशनों पर आम लोग हिंदी कवियों की रचनाओं, जैसे महादेवी वर्मा और सुमित्रानंदन पंत की किताबों के बजाय उर्दू शायरी की किताबें क्यों खरीदते हैं?

तीसरा उदाहरण उन हिंदी लेखकों का है जिनकी पृष्ठभूमि उर्दू से जुड़ी रही है। प्रेमचंद, कृष्ण चंदर, राजिंदर सिंह बेदी, प्रो. गोपीचंद और मलिक राम जैसे लेखक हिंदी साहित्य जगत में भी व्यापक रूप से स्वीकार किए जाते हैं।
उर्दू भारत के लोगों को इसलिए प्रिय है क्योंकि इसका विकास आम लोगों के बीच हुआ है।
उर्दू साहित्य अन्याय और आम जनता की पीड़ा के विरुद्ध प्रतिरोध का साहित्य भी है।
इस संदर्भ में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की इन पंक्तियों पर विचार कीजिए। ग़ालिब के साथ फ़ैज़ मेरे पसंदीदा उर्दू शायरों में से हैं:
“निसार मैं तेरी गलियों पे ऐ वतन कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले।”
यह कविता पाकिस्तान में मार्शल लॉ के दौरान तानाशाही और दमन के विरुद्ध प्रतिरोध का उदाहरण है।
उर्दू देशभक्ति की भाषा भी है। राम प्रसाद बिस्मिल की प्रसिद्ध पंक्तियाँ कौन भूल सकता है:
“सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।”
उर्दू कविता ने कर्मकांड, रूढ़िवाद और दमनकारी सामाजिक परंपराओं के विरुद्ध भी आवाज़ उठाई है। इस अर्थ में इसे कबीर की कविता की उत्तराधिकारी कहा जा सकता है, हालाँकि इसकी अभिव्यक्ति अधिक परिष्कृत है।
ग़ालिब लिखते हैं:
“नहीं कुछ सुबह-ओ-ज़ुन्नार के फंदे में गीराई
वफ़ादारी में शेख़-ओ-बरहमन की आज़माइश है।”
अर्थात, मुसलमान का ताबीज़ या हिंदू का जनेऊ अपने आप में महत्वपूर्ण नहीं है। किसी शेख़ या ब्राह्मण की असली परीक्षा उसके आदर्शों और सिद्धांतों के प्रति निष्ठा से होती है।
सआदत हसन मंटो की कहानियों का भी उल्लेख किया जा सकता है, विशेषकर वे कहानियाँ जिनमें विभाजन की भयावहता को चित्रित किया गया है, जैसे ठंडा गोश्त, टिटवाल का कुत्ता और खोल दो।
आधुनिक भारत में आम लोगों की भाषा होने के कारण उर्दू का स्वरूप लगभग पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष है। इसके अनेक महान शायर तो धर्म की आलोचना तक करते रहे हैं।
मीर का यह शेर देखिए:
“मीर के दीन-ओ-मज़हब को तुम पूछते क्या हो, उन्होंने तो
कश्का खींचा दैर में बैठा, कब का तर्क इस्लाम किया।”
इसी तरह ग़ालिब कहते हैं:
“ईमान मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मेरे पीछे है, कलीसा मेरे आगे।”
अर्थात, आस्था मुझे रोक रही है, जबकि नास्तिकता मुझे अपनी ओर खींच रही है। काबा मेरे पीछे है और गिरजाघर मेरे आगे।
यहाँ ‘कलीसा’ का अर्थ केवल गिरजाघर नहीं है। इसका वास्तविक संकेत आधुनिक सभ्यता की ओर है। इस तरह ग़ालिब और अनेक दूसरे उर्दू लेखक सामंती सभ्यता का विरोध करते हैं और आधुनिकता का समर्थन करते हैं।
उर्दू साहित्य पर सूफ़ी परंपरा का भी गहरा प्रभाव रहा है। सूफ़ियों ने धर्म, जाति और अन्य भेदभावों से ऊपर उठकर सभी मनुष्यों के बीच सार्वभौमिक प्रेम का संदेश दिया। वे आम लोगों से उनकी अपनी भाषा में संवाद करते थे। इस तरह उन्होंने उर्दू के विकास में भी योगदान दिया।
आधुनिक उर्दू शायरों में साहिर लुधियानवी ने धार्मिक मान्यताओं और रूढ़ियों के प्रति अपना विरोध स्पष्ट रूप से व्यक्त किया। उनकी ये पंक्तियाँ देखिए:
“अक़ायिद वहम हैं, मज़हब ख़याल-ए-ख़ाम है साक़ी
अज़ल से ज़ेहन-ए-इंसाँ बस्ता-ए-वहम है साक़ी।”
अर्थात, धार्मिक मत और मान्यताएँ भ्रम हैं और धर्म केवल अधूरी कल्पना है। आरंभ से ही मनुष्य का मस्तिष्क अंधविश्वासों का बंदी रहा है।
वे आगे लिखते हैं:
“बेज़ार है कनिश्त-ओ-कलीसा से एक जहाँ
सौदागरों-ए-दीन की सौदागरी की ख़ैर।”
अर्थात, दुनिया मंदिरों और गिरजाघरों से ऊब चुकी है। धर्म के नाम पर व्यापार करने वालों की ख़ैर हो।
मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि दुनिया की किसी भी भाषा की कविता ने मानव हृदय की आवाज़ और उसके दुखों को उस तरह व्यक्त नहीं किया है, जिस तरह उर्दू ने किया है।
ग़ालिब के इन सरल शब्दों में छिपी गहरी पीड़ा पर विचार कीजिए:
“रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें इतनी पड़ीं मुझ पर कि आसाँ हो गईं।”
अर्थात, जब मनुष्य दुख सहने का आदी हो जाता है तो दुख भी अपना असर खो देता है। मुझ पर इतनी मुश्किलें आईं कि वे भी आसान लगने लगीं।
मीर और नज़ीर जैसे कुछ उर्दू शायरों ने होली, दिवाली, राखी और अन्य हिंदू त्योहारों तथा परंपराओं पर सुंदर कविताएँ लिखी हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि उर्दू कभी किसी एक धर्म की भाषा नहीं रही।
उर्दू साहित्य में अनेक हिंदुओं ने महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है। फ़िराक़, चकबस्त, रतननाथ सरशार और राम प्रसाद बिस्मिल इसके उदाहरण हैं। वली दकनी की कविता में गंगा, जमुना, कृष्ण, राम, सरस्वती, सीता और लक्ष्मी जैसे शब्द बार-बार आते हैं।
विभाजन, उर्दू का पतन और भारत में उसका भविष्य
मेरे विचार में 1947 में भारत के विभाजन ने उर्दू को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया।
इसके बाद भारत में उर्दू को एक विदेशी भाषा और केवल मुसलमानों की भाषा के रूप में प्रचारित किया जाने लगा। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि कुछ मुसलमानों ने भी अपने हिंदू भाइयों के प्रति अपनी देशभक्ति और एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए उर्दू पढ़ना छोड़ दिया।
1947 के बाद आम बोलचाल में प्रचलित फ़ारसी शब्दों को व्यवस्थित रूप से हटाकर उनकी जगह ऐसे संस्कृतनिष्ठ शब्द लाने की कोशिश की गई, जो आम लोगों के बीच प्रचलित नहीं थे।
उदाहरण के लिए, ‘ज़िला’ शब्द को बदलकर ‘जनपद’ कर दिया गया।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक मामले की सुनवाई के दौरान मेरे सामने ‘प्रतिभू आवेदन पत्र’ शीर्षक से एक आवेदन आया। मैंने संबंधित वकील से पूछा कि ‘प्रतिभू’ का अर्थ क्या है। उन्होंने बताया कि इसका अर्थ ज़मानत का आवेदन है।
मैंने उनसे कहा कि उन्हें ‘प्रतिभू’ जैसे शब्द के बजाय ‘बेल’ या ‘ज़मानत’ शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए था, जिन्हें हर कोई समझता है।
एक अन्य अवसर पर सुबह की सैर के दौरान मैंने एक बोर्ड देखा, जिस पर ‘प्रवरण केंद्र’ लिखा था। मैं उसका अर्थ नहीं समझ सका। नीचे देखने पर उसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘सेलेक्शन सेंटर’ लिखा हुआ था।
मेरे विचार में वहाँ ‘भर्ती दफ़्तर’ या ‘रोज़गार दफ़्तर’ लिखा जाना चाहिए था, न कि ऐसा शब्द जिसे आम आदमी समझ ही न सके।
हिंदुस्तानी में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले फ़ारसी शब्दों को हटाकर उनकी जगह ऐसे संस्कृत शब्दों को रखने की नीति, जिन्हें आम लोग नहीं समझते, ब्रिटिश शासन की फूट डालो और राज करो की नीति का परिणाम थी। ब्रिटिश शासन ने अपने कट्टर स्थानीय समर्थकों के माध्यम से यह विचार फैलाया कि हिंदी या संस्कृतनिष्ठ हिंदुस्तानी हिंदुओं की भाषा है, जबकि उर्दू मुसलमानों की भाषा है।
सच्चाई यह थी कि उर्दू भारत के शिक्षित वर्ग की साझा भाषा थी, चाहे वह हिंदू हो, मुसलमान हो या सिख।
इसमें कोई संदेह नहीं कि फ़ारसी और अरबी के अनेक शब्द हिंदुस्तानी में आए और आम बोलचाल का हिस्सा बन गए। लेकिन यह एक गलत धारणा है कि किसी भाषा में विदेशी शब्दों के आने से वह कमजोर हो जाती है। वास्तव में इससे भाषा समृद्ध होती है।
उदाहरण के लिए, अंग्रेज़ी में फ़्रेंच, जर्मन, अरबी, उर्दू और अन्य भाषाओं के अनेक शब्द शामिल हुए हैं। इससे अंग्रेज़ी कमजोर नहीं, बल्कि अधिक समृद्ध हुई है।
हिंदुस्तानी में आम इस्तेमाल के फ़ारसी और अरबी शब्दों को हटाने की इस संकीर्ण नीति के परिणामस्वरूप ऐसी हिंदी विकसित हुई जो अनावश्यक रूप से संस्कृतनिष्ठ हो गई। आम भारतीयों के लिए उसे समझना कई बार कठिन हो जाता है।
हमारी अदालतों में सरकारी अधिसूचनाओं में इस्तेमाल की जाने वाली हिंदी को समझना भी अक्सर मुश्किल होता है।
फ़ारसी शब्दों के प्रति इस विरोधी नीति ने भारत में उर्दू को लगभग समाप्त करने जैसी स्थिति पैदा कर दी।
प्रसिद्ध उर्दू आलोचक शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने डॉ. अथर फ़ारूक़ी को दिए एक साक्षात्कार में कहा था:
“यह मेरे लिए, और मेरे जैसे दूसरे लोगों के लिए भी, दुख की बात है कि भारत में हमारी पीढ़ी के लिए उर्दू साहित्य एक जीवंत वास्तविकता नहीं रह गया है। वह किताबों में दफ़न होकर रह गया है।”
सादर, मैं उनसे सहमत नहीं हूँ।
तमाम विरोधी प्रयासों के बावजूद, जो भाषा दिल की आवाज़ बनती है, उसे तब तक मिटाया नहीं जा सकता जब तक लोगों के दिल धड़कते रहेंगे।
भारत में उर्दू के जीवित होने का प्रमाण देश के उत्तर, पश्चिम, दक्षिण और पूर्व में होने वाले मुशायरों में उमड़ने वाली बड़ी भीड़ है। इन मुशायरों में समाज के सभी वर्गों के लोग शामिल होते हैं।
यदि उर्दू विदेशी भाषा है, तो यह आश्चर्य की बात है कि भारत के लोग इसे इतना प्यार क्यों करते हैं, इसकी शायरी की किताबें क्यों खरीदते हैं और इसके गीत क्यों गाते हैं।
मेरा सुझाव है कि उर्दू शायरों की रचनाएँ देवनागरी लिपि में भी प्रकाशित की जानी चाहिए, जैसा कि प्रकाश पंडित और अन्य लोगों ने किया था। इससे वे लोग भी उर्दू शायरी पढ़ सकेंगे जो फ़ारसी लिपि नहीं जानते।
मेरे विचार में लिपि को लेकर बहुत कठोर रुख नहीं अपनाना चाहिए।
कुछ प्रगतिशील लेखक चाहते थे कि पूरी उर्दू केवल देवनागरी लिपि में लिखी जाए। मैं इस विचार से सहमत नहीं हूँ। इस मामले में लचीलापन होना चाहिए और लोगों को अपनी पसंद की लिपि चुनने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
एक संभावना यह भी है कि पुस्तक के बाएँ पृष्ठ पर फ़ारसी लिपि में और दाएँ पृष्ठ पर देवनागरी लिपि में उर्दू पाठ प्रकाशित किया जाए। कठिन शब्दों के अर्थ नीचे सरल हिंदी यानी हिंदुस्तानी में दिए जा सकते हैं।
महान उर्दू शायर जोश मलीहाबादी ने एक बार कहा था कि 1947 के बाद उर्दू को इसलिए भारी नुकसान हुआ क्योंकि उसका रिश्ता रोज़ी-रोटी से टूट गया। यह बात सही है।
लोगों ने उर्दू पढ़ना और सीखना इसलिए भी छोड़ दिया क्योंकि 1947 के बाद यह भाषा उन्हें पहले की तरह रोज़गार दिलाने में मददगार नहीं रही।
इस संदर्भ में मैं एक सुझाव देना चाहता हूँ।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में मैंने रमेश उपाध्याय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, रिट याचिका संख्या 29290/1990 में 18 जनवरी 1993 को एक निर्णय दिया था। उसमें मैंने सुझाव दिया था कि हमारी दो महान सांस्कृतिक भाषाओं, संस्कृत और उर्दू, को कक्षा तीन से आठ तक पाँच वर्षों के लिए सभी स्कूलों में अनिवार्य किया जाना चाहिए।
अब तक इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया गया है। यदि इसे स्वीकार कर लिया जाए, तो भारत के अनेक हिस्सों में उर्दू जानने वाले हजारों लोगों को स्कूलों में नौकरी मिल सकेगी।
इस तरह उर्दू का संबंध फिर से रोज़ी-रोटी से जुड़ सकेगा। उर्दू जानने वाले अनेक लोगों को रोज़गार मिलेगा और हमारे बच्चों को इस महान सांस्कृतिक भाषा की बुनियादी जानकारी प्राप्त होगी, जिसे वे आगे अपनी इच्छा के अनुसार विकसित कर सकते हैं।
मैं हिंदी और उर्दू के लेखकों से भी अपील करना चाहूँगा कि वे सरल भाषा का इस्तेमाल करें।
अक्सर हिंदी या उर्दू की कोई रचना पढ़ते समय यह समझना मुश्किल हो जाता है कि उसमें लिखा क्या है। यदि कोई बात समझ में ही न आए तो ऐसे साहित्य का क्या उपयोग?
आज भारत और पाकिस्तान के लोग गरीबी, बेरोज़गारी और बढ़ती महँगाई जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं। साहित्य को इन समस्याओं के विरुद्ध आम लोगों के संघर्ष में योगदान देना चाहिए। ऐसा वह सरल और समझ में आने वाली भाषा के इस्तेमाल से कर सकता है, जैसी भाषा विंस्टन चर्चिल के युद्धकालीन भाषणों में या प्रेमचंद और शरतचंद्र की कहानियों में मिलती है।
यह याद रखना चाहिए कि मीर और ग़ालिब ने मुख्यतः अभिजात वर्ग और शिक्षित लोगों की चुनिंदा महफ़िलों के लिए लिखा था। आधुनिक युग में उर्दू लेखकों को आम जनता के लिए लिखना चाहिए। इसके लिए उन्हें सरल भाषा का इस्तेमाल करना होगा।
उर्दू कविता: दिल की आवाज़
समापन से पहले मैं उर्दू कविता के बारे में कुछ कहना चाहूँगा।
मैंने इंग्लैंड, अमेरिका, फ़्रांस, जर्मनी, रूस, स्पेन, लैटिन अमेरिकी देशों और फ़ारस सहित अनेक देशों की कविता पढ़ी है। मैंने भारत की हिंदी, संस्कृत, बांग्ला और तमिल कविता का भी व्यापक अध्ययन किया है।
मेरे विचार में दुनिया की किसी भी भाषा में मानव हृदय की आवाज़ इतनी ताकत और नफ़ासत के साथ व्यक्त नहीं होती, जितनी उर्दू में होती है। इस दृष्टि से उर्दू कविता दुनिया की महानतम कविता है।
उर्दू के एक शेर में विचारों की ऐसी सघनता हो सकती है कि वह किसी गहरे विचार या यहाँ तक कि पूरे ऐतिहासिक युग का सार व्यक्त कर दे। ![]()
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