September 15, 2026

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अनवांछित टकराव

पंजाब बनाम केंद्र: चीफ जस्टिस तय करने का अधिकार किसका?

परामर्श, प्रक्रिया और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर उठते गंभीर सवाल

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति ने पंजाब सरकार और केंद्र के बीच एक असामान्य टकराव को जन्म दे दिया है।

पंजाब सरकार ने इस नियुक्ति पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि केंद्र ने राज्य के विचार प्राप्त किए और उन पर विचार किए बिना प्रक्रिया आगे बढ़ा दी। दूसरी ओर, केंद्र का पक्ष है कि राज्य से परामर्श का अर्थ उसकी सहमति लेना नहीं है और न ही इससे राज्य को नियुक्ति पर वीटो का अधिकार मिल जाता है।

इसके बावजूद न्यायमूर्ति मिश्रा ने 7 सितंबर 2026 को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में शपथ ले ली।

इसलिए मौजूदा विवाद सिर्फ एक न्यायाधीश की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। यह हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की नियुक्ति की संवैधानिक प्रक्रिया, केंद्र और राज्य के बीच परामर्श के वास्तविक अर्थ, इस पूरी प्रक्रिया के दौरान दोनों सरकारों के आचरण और अंततः न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है।

पंजाब की आपत्ति क्या है?

पंजाब की आपत्ति मुख्य रूप से उस तरीके को लेकर दिखाई देती है, जिस तरह नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी की गई।

राज्य सरकार का कहना है कि उसकी संवैधानिक भूमिका को दरकिनार किया गया और केंद्र ने मुख्यमंत्री भगवंत मान की प्रतिक्रिया का इंतजार किए बिना नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी।

Justice Ashwani Kumar Mishra

न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा

रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि पंजाब की आपत्तियां केवल नियुक्ति प्रक्रिया तक सीमित नहीं थीं और राज्य ने पंजाब से जुड़े न्यायमूर्ति मिश्रा के कुछ पुराने फैसलों को लेकर भी चिंताएं जताई थीं।

ये दोनों अलग-अलग मुद्दे हैं।

यदि राज्य की शिकायत यह है कि निर्धारित परामर्श प्रक्रिया का सही ढंग से पालन नहीं किया गया, तो यह संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया का सवाल है और इसकी स्वतंत्र रूप से जांच होनी चाहिए।

लेकिन यदि नियुक्ति का विरोध मुख्य रूप से न्यायाधीश द्वारा दिए गए फैसलों से असहमति पर आधारित है, तो एक अलग और अधिक कठिन सवाल पैदा होता है। क्या कोई सरकार इसलिए किसी न्यायाधीश की नियुक्ति का विरोध कर सकती है क्योंकि उसके फैसले सरकार के खिलाफ गए हैं या उससे सरकार असहमत है?

किसी प्रतिकूल फैसले को सरकार कानूनी उपायों के जरिए चुनौती देने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है। लेकिन किसी फैसले से कार्यपालिका को असुविधा होने मात्र से वह फैसला न्यायिक पक्षपात का प्रमाण नहीं बन जाता।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता के व्यापक सिद्धांत को देखते हुए यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है।

पंजाब ने अपना जवाब लंबित क्यों रखा?

इस विवाद में पंजाब सरकार के अपने आचरण को लेकर भी सवाल उठते हैं।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 6 अगस्त को न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश की थी। रिपोर्टों के अनुसार केंद्र ने 10 अगस्त को संबंधित राज्य सरकारों से राय मांगी थी, जबकि पंजाब सरकार के अपने अनुसार उसे राय मांगने वाला पत्र 12 अगस्त को मिला।

केंद्र ने 5 सितंबर को नियुक्ति की अधिसूचना जारी कर दी और न्यायमूर्ति मिश्रा ने 7 सितंबर को शपथ ले ली।

दूसरे शब्दों में, पंजाब के अपने ही पक्ष के अनुसार राज्य सरकार के पास केंद्र का पत्र मिलने और नियुक्ति की अधिसूचना जारी होने के बीच तीन सप्ताह से अधिक का समय था।

यहां एक सीधा सवाल उठता है:

यदि पंजाब को नियुक्ति पर गंभीर आपत्तियां थीं, तो उसने उस अवधि के दौरान अपनी आपत्तियां केंद्र के सामने क्यों नहीं रखीं?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र की ओर से कहा गया है कि संबंधित अन्य राज्यों ने समय पर अपनी राय दे दी थी, जबकि पंजाब की प्रतिक्रिया लंबित रही।

Punjab Centre Chief Justice Disputesअतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सत्य पाल जैन ने भी कहा है कि पंजाब के पास अपनी राय देने के लिए पर्याप्त समय था और नियुक्ति की अधिसूचना जारी होने से पहले राज्य ने अपनी आपत्तियां नहीं बताईं।

लेकिन इससे कानूनी सवाल अपने आप केंद्र के पक्ष में तय नहीं हो जाता।

पंजाब ने समय पर जवाब नहीं दिया, इसका यह अर्थ नहीं कि यदि लागू मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर में नियुक्ति से पहले राज्य की राय प्राप्त करना आवश्यक था, तो केंद्र उस प्रक्रिया को नजरअंदाज कर सकता था।

इसी तरह, यदि कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं है, तो इसका यह अर्थ भी नहीं हो सकता कि कोई राज्य अनिश्चितकाल तक चुप रहे और नियुक्ति अधिसूचित होने के बाद आपत्ति दर्ज करे।

कानूनी स्थिति मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर की वास्तविक आवश्यकताओं, केंद्र और राज्य के बीच हुए पत्राचार, पंजाब को दिए गए अवसर और उन परिस्थितियों पर निर्भर करेगी जिनमें केंद्र ने आगे बढ़ने का फैसला किया।

इसलिए पंजाब को स्पष्ट करना चाहिए कि उसे केंद्र का अनुरोध कब मिला, क्या उसने 5 सितंबर से पहले कोई जवाब दिया था, उसकी वास्तविक आपत्तियां क्या थीं और उसने उन्हें पहले क्यों नहीं बताया।

दूसरी ओर, केंद्र को भी स्पष्ट करना चाहिए कि क्या राज्य को अपनी राय रखने का अवसर देने के बाद, उसकी प्रतिक्रिया प्राप्त हुए बिना आगे बढ़ना कानूनी रूप से उचित था।

संवैधानिक जवाबदेही दोनों सरकारों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।

क्या हाल के हाईकोर्ट के आदेशों से पंजाब नाराज हुआ?

इस विवाद का एक और पहलू भी गंभीरता से देखने की जरूरत है।

क्या पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के हालिया आदेशों और कार्यवाही ने पंजाब सरकार की न्यायपालिका के प्रति नाराजगी को बढ़ाया है?

यह सवाल पूरी तरह संदर्भहीन नहीं है। पिछले कुछ महीनों में हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार की वित्तीय स्थिति, प्रशासनिक कामकाज, पुलिस व्यवस्था और भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़े कई मामलों पर सुनवाई की है।

ये मामले चीफ जस्टिस की नियुक्ति से अलग हैं, लेकिन मौजूदा टकराव की राजनीतिक और प्रशासनिक पृष्ठभूमि को समझने में इनकी भूमिका हो सकती है।

DA/DR विवाद और सरकारी खर्च

हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार के कर्मचारियों और पेंशनरों के महंगाई भत्ते यानी DA और महंगाई राहत यानी DR से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर भी विस्तार से सुनवाई की है।

3 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को लंबित DA/DR की किस्तें और बकाया निर्धारित अवधि में जारी करने का निर्देश दिया था।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि जब तक ये बकाया भुगतान नहीं हो जाते, तब तक राज्य प्रिंट या सोशल मीडिया में बड़े पैमाने पर विज्ञापन अभियानों जैसे “अनुत्पादक खर्च” न करे। अदालत ने यह भी कहा था कि ऐसे खर्च सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों को मिलने वाले वैध बकाये को रोकने का आधार नहीं हो सकते।

मुख्य सचिव को आदेश का पालन सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया गया था।

इसके बाद विवाद ने एक और रूप ले लिया।

7 सितंबर को आवेदकों की ओर से अदालत में आरोप लगाया गया कि राज्य सरकार ने 1 सितंबर को पूरे पन्ने के विज्ञापन प्रकाशित किए थे और करीब 340 करोड़ रुपये खर्च किए। राज्य की ओर से अदालत को बताया गया कि 3 अगस्त के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

सितंबर में भी मामला जारी रहा। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि वह अपनी चुनौती सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आगे बढ़ाए और अपनी विशेष अनुमति याचिका में मौजूद खामियों को 10 दिनों के भीतर दूर करे। अदालत ने वित्तीय सहायता और अन्य कल्याणकारी योजनाओं, नीतियों और घोषणाओं से जुड़ी जानकारी भी मांगी।

यह मामला सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल उठाता है।

सरकारी प्रचार का अपना वैध उद्देश्य हो सकता है। सरकारों को अपनी योजनाओं और नीतियों की जानकारी जनता तक पहुंचाने का अधिकार है। लेकिन सार्वजनिक धन से होने वाला प्रचार खर्च भी आवश्यकता, पारदर्शिता, जवाबदेही और जनहित की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।

यह सवाल आम आदमी पार्टी सरकार के व्यापक प्रचार और प्रचारात्मक अभियानों के संदर्भ में और महत्वपूर्ण हो जाता है, जिनमें पंजाब से बाहर की गतिविधियां भी शामिल रही हैं।

जब सार्वजनिक धन खर्च होता है, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि वह खर्च वास्तविक जनहित के उद्देश्य से हो रहा है या राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए।

हालांकि, सरकारी खर्च को लेकर हाईकोर्ट की चिंता को उसके वास्तविक आदेश और उसमें दिए गए कानूनी तर्कों के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। सार्वजनिक धन को लेकर न्यायिक चिंता मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अदालत किसी राजनीतिक दल या सरकार के प्रति पक्षपाती है।

निखिल सराफ की PIL और मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े आरोप

एक अन्य महत्वपूर्ण मामला अधिवक्ता निखिल सराफ द्वारा दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। इसमें प्रवर्तन निदेशालय यानी ED की ओर से पंजाब के DGP को भेजे गए उन पत्राचार का मुद्दा उठाया गया है, जिनमें मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े लोगों पर कथित भ्रष्टाचार के आरोपों का उल्लेख है।

मामले में बड़े पैमाने पर और संस्थागत भ्रष्टाचार, पद के कथित दुरुपयोग, आपराधिक साजिश तथा सरकारी, टेंडर और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में कथित हेरफेर जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान ED को पंजाब के DGP को भेजे गए संबंधित पत्राचार अदालत के समक्ष रखने का निर्देश दिया और राज्य सरकार से जवाब मांगा। पीठ ने संकेत दिया कि आरोपों की प्रकृति गंभीर है और उन पर सावधानीपूर्वक जवाब की जरूरत है।

इसके बाद ED ने एक बहु-करोड़ रुपये के मनी लॉन्ड्रिंग और भूमि उपयोग परिवर्तन से जुड़े मामले में निजी व्यक्तियों और पंजाब सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग फिर उठाई।

31 अगस्त के एक संचार में ED ने DGP से फिर FIR दर्ज करने और उसकी प्रति एजेंसी को उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था।

Ed Hc Punjab Corruptionहाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगे हैं और जांच एजेंसी तथा राज्य पुलिस के बीच हुए संचार और लगाए गए आरोपों को उसके समक्ष रखने को कहा है।

इससे यह सवाल भी उठता है कि जब किसी केंद्रीय जांच एजेंसी की ओर से मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े लोगों के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार की जानकारी राज्य पुलिस को दी जाती है, तो राज्य सरकार की जिम्मेदारी क्या बनती है? क्या उसे आरोपों की पारदर्शी तरीके से जांच कर कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए?

हालांकि, इस मामले में जनहित याचिका की पोषणीयता और कार्यवाही के कानूनी दायरे से जुड़े सवाल भी मौजूद हैं। मामले में हाईकोर्ट के अंतिम निष्कर्ष और निर्देश ही यह तय करेंगे कि इससे जुड़े कानूनी और प्रशासनिक सवालों की स्थिति क्या बनती है।

यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि आरोप अभी केवल आरोप हैं।

किसी PIL का दायर होना, नोटिस जारी होना या किसी जांच एजेंसी द्वारा सामग्री अदालत में रखना अपने आप में भ्रष्टाचार साबित नहीं करता।

फिर भी यह मामला एक वैध सार्वजनिक सवाल जरूर उठाता है:

जब कोई केंद्रीय जांच एजेंसी मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े लोगों के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार की जानकारी देती है, तो राज्य सरकार की जिम्मेदारी क्या है कि वह आरोपों की पारदर्शी तरीके से जांच करे और की गई कार्रवाई के बारे में बताए?

प्रशासनिक फैसले और पुलिस व्यवस्था

अदालत के सामने पंजाब के प्रशासन और पुलिस व्यवस्था से जुड़े सवाल भी पहुंचे हैं।

एक हालिया जनहित याचिका में सवाल उठाया गया कि पंजाब चार साल से अधिक समय तक नियमित पुलिस महानिदेशक यानी DGP के बिना क्यों रहा।

हाईकोर्ट ने अब राज्य सरकार से जवाब मांगा है और हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। याचिका में दावा किया गया है कि अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था लंबे समय तक जारी रहने से पुलिस बल के सर्वोच्च स्तर पर स्थिर और स्वतंत्र नेतृत्व को लेकर सवाल उठते हैं। मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को निर्धारित है।

मामला केवल किसी एक पुलिस अधिकारी की नियुक्ति का नहीं है। यह संस्थागत स्थिरता, जवाबदेही और राज्य सरकार द्वारा अपनी सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक संस्थाओं में से एक को संचालित करने के तरीके से जुड़े व्यापक सवाल उठाता है।

हालांकि, हाईकोर्ट द्वारा किसी चुनौती को सुन लेना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि राज्य सरकार ने कानून का उल्लंघन किया है। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि पंजाब के प्रशासन और पुलिस व्यवस्था से जुड़े सवाल लगातार अदालत के सामने पहुंच रहे हैं।

पुलिस अत्याचार और सरकार की जवाबदेही

पुलिस अत्याचार के आरोपों से जुड़ी हालिया जनहित याचिकाएं और अन्य कार्यवाहियां भी ध्यान देने योग्य हैं।

ऐसे मामलों में कानून लागू करने वाली एजेंसियों के कामकाज, नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा और सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही से जुड़े गंभीर सवाल उठ सकते हैं।

जहां अवैध हिरासत, पुलिस दुर्व्यवहार या मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आरोप सामने आए हैं, वहां हाईकोर्ट ने उचित मामलों में हस्तक्षेप किया है।

लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले संबंधित मामले में लगाए गए आरोपों, अदालत की टिप्पणियों, दिए गए निर्देशों और मौजूदा स्थिति को अलग-अलग देखना जरूरी है।

यही सिद्धांत भ्रष्टाचार या सरकारी पद के दुरुपयोग के आरोपों पर भी लागू होता है। इन मामलों की जांच और फैसला उचित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ही होना चाहिए।

इन घटनाक्रमों से क्या संकेत मिलता है?

ऊपर जिन मामलों का उल्लेख किया गया है, वे सरकार के कामकाज के अलग-अलग पहलुओं से जुड़े हैं।

कुछ सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के वित्तीय अधिकारों से जुड़े हैं। कुछ सरकारी प्रचार और सार्वजनिक खर्च से। कुछ पुलिस प्रशासन और संस्थागत जवाबदेही से। वहीं कुछ मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े लोगों पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों से संबंधित हैं।

ये मामले उस राजनीतिक माहौल को समझने में मदद कर सकते हैं जिसमें पंजाब ने न्यायमूर्ति मिश्रा की नियुक्ति पर आपत्ति जताई है।

लेकिन वे सरकार की मंशा साबित नहीं करते।

नागरिकों को प्रतिकूल न्यायिक फैसले और न्यायिक पक्षपात के बीच अंतर समझना होगा।

किसी सरकार के खिलाफ आया फैसला अपने आप में यह साबित नहीं करता कि न्यायाधीश उस सरकार या राज्य के खिलाफ हैं।

सरकारों को न्यायिक फैसलों को कानूनी उपायों के जरिए चुनौती देने का पूरा अधिकार है। यदि नियुक्ति की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है तो वे नियुक्ति पर वास्तविक और गंभीर आपत्ति भी उठा सकती हैं।

लेकिन न्यायिक जांच से असहमति या प्रतिकूल फैसलों को किसी न्यायाधीश की स्वतंत्रता पर सवाल उठाने का आधार अपने आप नहीं बनाया जा सकता।

इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार के लिए असुविधाजनक आदेश दिए या नहीं।

असली सवाल यह है कि क्या वे आदेश कानून के अनुरूप थे और क्या सरकार का नियुक्ति का विरोध वास्तविक प्रक्रियागत शिकायत पर आधारित है या न्यायिक जांच से असंतोष ने भी इसमें कोई भूमिका निभाई है।

यही अंतर इस पूरे विवाद के केंद्र में है।

सरकार किसी अदालत के फैसले से असहमत हो सकती है। लेकिन वह यह अपेक्षा नहीं कर सकती कि न्यायपालिका तभी स्वतंत्र हो जब उसके फैसले सरकार के पक्ष में हों।

बड़ा संवैधानिक सिद्धांत

यह विवाद दो बुनियादी सिद्धांतों को सामने लाता है।

“न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका से स्वतंत्र होनी चाहिए।”

न्यायिक स्वतंत्रता संविधान की वह सुरक्षा है जो यह सुनिश्चित करती है कि न्यायाधीश कानून और संविधान के अनुसार फैसले लें, न कि राजनीतिक नाराजगी या दबाव के डर से।

Judiciary

किसी सरकार को न्यायिक फैसले को कानूनी तरीके से चुनौती देने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

उसे यह अधिकार भी होना चाहिए कि यदि नियुक्ति की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है तो वह वास्तविक आपत्ति उठा सके।

लेकिन यदि न्यायाधीशों को केवल इसलिए राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़े कि उनके फैसले सत्ता में बैठे लोगों के लिए असुविधाजनक हैं, तो न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर सकती।

दूसरा सिद्धांत भी उतना ही महत्वपूर्ण है:

“कानून का शासन, व्यक्तियों का नहीं।”

यह प्रसिद्ध अवधारणा जॉन एडम्स से जुड़ी है और संवैधानिक शासन की मूल भावना को व्यक्त करती है।

न तो केंद्र सरकार कानून से ऊपर है और न ही कोई राज्य सरकार।

दोनों को उन प्रक्रियाओं का पालन करना होगा जो उन पर लागू होती हैं और दोनों को न्यायपालिका की संस्थागत स्वतंत्रता का सम्मान करना होगा।

यह सिद्धांत दोनों पक्षों पर समान रूप से लागू होता है।

केंद्र परामर्श को महज औपचारिकता नहीं मान सकता और राज्य परामर्श को असीमित वीटो के अधिकार में नहीं बदल सकता।

संवैधानिक प्रक्रिया का पालन केवल कागज पर नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक भावना में भी होना चाहिए।

अंततः न्याय व्यवस्था की मजबूती केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि किसी न्यायाधीश की नियुक्ति कौन करता है। यह इस बात पर भी निर्भर करती है कि संवैधानिक संस्थाएं अपने अधिकारों की सीमाओं का कितना सम्मान करती हैं।

परामर्श का अर्थ सहमति नहीं

इस विवाद के केंद्र में मौजूद कानूनी अंतर को स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है।

हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 217 और लागू मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर के तहत होती है।

न्यायिक नियुक्तियों की सिफारिश में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की केंद्रीय भूमिका है, जबकि संवैधानिक व्यवस्था के तहत नियुक्ति की प्रक्रिया को केंद्र सरकार आगे बढ़ाती और अधिसूचित करती है। मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर की सामने आई कानूनी व्याख्या यह है कि संबंधित राज्य सरकार के विचार प्राप्त किए जाने हैं, लेकिन राज्य की सहमति नियुक्ति के लिए अनिवार्य पूर्व शर्त नहीं है।

यदि यही व्याख्या सही है, तो पंजाब यह दावा नहीं कर सकता कि नियुक्ति पर उसके पास स्वतः वीटो का अधिकार है। लेकिन दूसरी ओर, परामर्श की संवैधानिक या प्रक्रियागत आवश्यकता को भी अर्थहीन नहीं माना जा सकता।

केंद्र को यह स्पष्ट करने में सक्षम होना चाहिए कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया और नियुक्ति अंतिम रूप लेने से पहले पंजाब को अपनी राय रखने का वास्तविक और सार्थक अवसर दिया गया।

यही इस विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कानूनी बारीकी है:

परामर्श का अर्थ है अपनी बात रखने का सार्थक प्रक्रियागत अवसर। इसका अर्थ यह जरूरी नहीं कि राज्य को वीटो का अधिकार मिल जाए।

दोनों सरकारों के लिए एक कसौटी

यह विवाद भविष्य में न्यायिक नियुक्तियों के लिए अधिक स्पष्ट और पारदर्शी मानक तय करने का अवसर भी देता है।

केंद्र सरकार को न्यायमूर्ति मिश्रा की नियुक्ति में अपनाई गई प्रक्रिया स्पष्ट करनी चाहिए। पंजाब को अपनी आपत्तियों की प्रकृति और उनके समय के बारे में स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए।

दोनों सरकारों को संवैधानिक मुद्दे को राजनीतिक टकराव में बदलने से बचना चाहिए। दूसरी ओर, न्यायपालिका को राजनीतिक असहमति से पूरी तरह अलग और स्वतंत्र रहना चाहिए।

न्यायपालिका की वैधता इस विश्वास पर टिकी है कि न्यायाधीश संविधान और कानून के अनुसार फैसले करते हैं, न कि उस समय की सरकार की पसंद या नापसंद के अनुसार।

पंजाब की आपत्तियों को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए कि वे एक राज्य सरकार की ओर से आई हैं। लेकिन उन्हें केवल इसलिए स्वीकार भी नहीं किया जाना चाहिए कि उन्हें संघीय अधिकारों की भाषा में पेश किया गया है।

अंतिम कसौटी सीधी है:

क्या न्यायमूर्ति मिश्रा की नियुक्ति की प्रक्रिया कानून के अनुरूप थी और क्या दोनों सरकारें उस न्यायपालिका का सम्मान करने के लिए तैयार हैं जो उनके खिलाफ फैसला आने पर भी स्वतंत्र रहे?

यह सवाल केवल पंजाब का नहीं है।

यह पूरे भारत के लिए महत्वपूर्ण सवाल है। Punjab Today Logo
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