July 31, 2026

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मंत्री का इस्तीफा पर्याप्त नहीं, शिक्षा को व्यापक सुधार चाहिए

इस्तीफा आंदोलन समाप्त कर सकता है, संकट नहीं

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बहुप्रतीक्षित इस्तीफे के बाद आंदोलनरत छात्रों ने अपना विरोध समाप्त कर दिया है। लेकिन सरकार इस पर संतोष नहीं कर सकती। अब उसका ध्यान उस शिक्षा क्षेत्र पर केंद्रित होना चाहिए, जो लंबे समय से उपेक्षा का शिकार रहा है।

इस उपेक्षा का सबसे बड़ा प्रमाण केंद्रीय बजट में शिक्षा मंत्रालय (जिसे पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय कहा जाता था) को मिलने वाला आवंटन है। *सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE)* के इकोनॉमिक आउटलुक मॉड्यूल के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक के दौरान शिक्षा क्षेत्र सरकार की प्राथमिकताओं में लगातार पीछे खिसकता गया है।

ये आंकड़े कुल बजट राशि की तुलना नहीं करते, क्योंकि महंगाई और सरकारी खर्च में वृद्धि के कारण हर वर्ष राशि स्वाभाविक रूप से बढ़ती है। इसके बजाय, वे विभिन्न मंत्रालयों को कुल बजट में मिलने वाले प्रतिशत हिस्से का विश्लेषण करते हैं।

आंकड़े स्पष्ट रूप से बताते हैं कि शिक्षा मंत्रालय की हिस्सेदारी यूपीए सरकार के अंतिम बजट 2013-14 में 4.6 प्रतिशत थी, जो 2025-26 में घटकर केवल 2.5 प्रतिशत रह गई। यानी देश के भविष्य का निर्माण करने वाले इस मंत्रालय का बजटीय हिस्सा लगभग आधा हो चुका है।

घटता बजट, बढ़ती चुनौतियाँ

शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत दो प्रमुख विभाग आते हैं—स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा। आंकड़े बताते हैं कि स्कूली शिक्षा विभाग का बजटीय हिस्सा बारह वर्ष पहले की तुलना में आधे से भी कम रह गया है, जबकि उच्च शिक्षा विभाग का हिस्सा अपने पहले के स्तर के लगभग 60 प्रतिशत तक सिमट गया है।

इसके विपरीत, पिछले 12 वर्षों में सड़क और राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण पर होने वाला खर्च तीन गुना बढ़ गया है। बुनियादी ढांचा निश्चित रूप से आवश्यक है, लेकिन मानव संसाधन के विकास के बिना कोई भी अर्थव्यवस्था दीर्घकाल तक मजबूत नहीं बन सकती।

युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देने के उद्देश्य से 2015-16 में अलग कौशल विकास मंत्रालय बनाया गया। यह एक स्वागतयोग्य पहल थी, लेकिन अपने पहले ही वर्ष इस मंत्रालय को कुल बजट का मात्र 0.06 प्रतिशत हिस्सा मिला और आज यह घटकर केवल 0.05 प्रतिशत रह गया है। इससे स्पष्ट है कि अच्छी योजनाओं को भी पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए।

शिक्षा मंत्रालय का नेतृत्व जिन मंत्रियों को सौंपा गया, उससे भी यह संदेश गया कि इस मंत्रालय को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया। एनडीए सरकार की पहली शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी थीं, जिनकी शैक्षणिक योग्यता को लेकर व्यापक विवाद रहा। धर्मेंद्र प्रधान को भी इस महत्वपूर्ण मंत्रालय के लिए स्वाभाविक विकल्प नहीं माना जाता था।

राज्यों की भी बराबर जिम्मेदारी

शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। इसलिए इसकी जिम्मेदारी केवल केंद्र सरकार की नहीं, बल्कि राज्य सरकारों की भी है।

सभी राज्यों का औसत शिक्षा बजट 2008-09 में 14 प्रतिशत था, जो 2025-26 में घटकर 13 प्रतिशत रह गया है। यह गिरावट केंद्र जितनी बड़ी नहीं है, लेकिन यह भी दर्शाती है कि राज्यों ने भी शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं दी।

सकल नामांकन अनुपात (Gross Enrolment Ratio—GER) भी राज्यों के बीच गहरी असमानता को उजागर करता है। उदाहरण के लिए, बिहार का GER केवल 45 है, जबकि केरल का 94 है। यह केवल आंकड़ों का अंतर नहीं, बल्कि अवसरों की असमानता का भी प्रतीक है।

संकट केवल परीक्षा प्रणाली का नहीं

हालिया छात्र आंदोलन की वजह NEET परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होना था। लेकिन यह कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले एक दशक के दौरान प्रतियोगी परीक्षाओं में लगभग 150 बार प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

द इंडियन एक्सप्रेस  द्वारा 45 बड़े पेपर लीक मामलों की जांच में पाया गया कि इनमें से केवल दो मामलों में ही दोषियों को सजा मिली, जबकि बाकी सभी मामले अब भी न्यायिक प्रक्रिया में लंबित हैं।

इससे स्पष्ट है कि समस्या केवल परीक्षा सुरक्षा की नहीं, बल्कि जवाबदेही और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की भी है।

अब व्यापक सुधारों का समय

यदि भारत को एक मजबूत राष्ट्र और सशक्त अर्थव्यवस्था बनना है, तो शिक्षा—विशेषकर प्राथमिक शिक्षा—को सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल करना ही होगा।

देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को शिक्षण पेशे की ओर आकर्षित करने के लिए शिक्षकों को बेहतर वेतन, सम्मान और कार्य परिस्थितियां उपलब्ध करानी होंगी। जब तक शिक्षा को खर्च नहीं बल्कि भविष्य में निवेश के रूप में नहीं देखा जाएगा, तब तक न तो पेपर लीक रुकेंगे और न ही शिक्षा की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार आएगा।

हालिया छात्र आंदोलन को केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार के लिए एक और समिति गठित करने तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। इसे भारत की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक, संरचनात्मक और दूरगामी सुधारों की शुरुआत का अवसर बनाया जाना चाहिए।

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