भारतीय संसद ने गुरुवार को एक विधेयक पारित किया, जिसके तहत ‘वंदे मातरम्’ गीत का अपमान अब एक आपराधिक अपराध होगा। इस विधेयक के माध्यम से वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के समान दर्जा प्रदान किया गया है।
संस्कृत शब्द ‘वंदे मातरम्’ का शाब्दिक अर्थ है, “मैं माता की पूजा करता हूँ”, जहाँ ‘माता’ से आशय मातृभूमि भारत से है।
कई मुसलमान इस गीत को गाने पर आपत्ति जताते हैं। उनका कहना है कि इस्लाम केवल अल्लाह की इबादत की अनुमति देता है। वे कहते हैं कि वे अपनी मातृभूमि भारत से प्रेम करते हैं, लेकिन पूजा केवल अल्लाह की ही कर सकते हैं।
लेकिन इसके अतिरिक्त भी, इस गीत को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में समझना आवश्यक है। यह गीत मूलतः उपन्यास ‘आनन्द मठ’ में आया था। इसलिए इस विषय को उसके सही ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहिए।
‘आनन्द मठ’ का ऐतिहासिक संदर्भ
यह गीत मूल रूप से बंगाली लेखक बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित उपन्यास ‘आनन्द मठ’ में शामिल था।
बंकिमचन्द्र को महान बंगाली उपन्यासकार माना जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि कोई महान साहित्यकार सांप्रदायिक भी हो सकता है। साहित्यिक प्रतिभा अपने आप वैचारिक निरंतरता या धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण की गारंटी नहीं देती।
उर्दू के महान कवि इकबाल, उदाहरण के लिए, अपने आरंभिक जीवन में धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रवादी थे, जब उन्होंने “सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा” लिखा। लेकिन बाद में वे अत्यधिक सांप्रदायिक हो गए। उन्होंने पैन-इस्लामिक विचारों का समर्थन किया, जैसा कि उनकी कविता ‘शिकवा’ में दिखाई देता है, और जिन्ना के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का भी समर्थन किया।
बंकिमचन्द्र भी, इकबाल की तरह, अत्यंत प्रतिभाशाली साहित्यकार थे। लेकिन शरतचन्द्र या प्रेमचन्द के विपरीत, वे कट्टर सांप्रदायिक थे। वे मुसलमानों को नापसंद करते थे और उन्हें अक्सर “यवन” कहकर संबोधित करते थे।
उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनन्द मठ’ के अंतिम अध्याय का एक संवाद प्रस्तुत है। इसमें एक दैवी शक्ति संन्यासियों के नेता सत्यानन्द को अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष बंद करने के लिए प्रेरित करती है।
संवाद इस प्रकार है (यहाँ ‘वह’ से आशय दैवी शक्ति है और ‘स’ से आशय सत्यानन्द है):
वह: तुम्हारा कार्य पूरा हो चुका है। मुस्लिम सत्ता नष्ट हो चुकी है। अब तुम्हारे लिए करने को कुछ नहीं बचा। व्यर्थ के रक्तपात से कोई लाभ नहीं होगा।
स: मुस्लिम सत्ता तो समाप्त हो गई, लेकिन हिन्दू राज्य अभी स्थापित नहीं हुआ है। कलकत्ता पर अब भी अंग्रेजों का शासन है।
वह: अभी हिन्दू राज्य स्थापित नहीं होगा। यदि तुम अपने कार्य में लगे रहे तो लोग व्यर्थ मारे जाएंगे। इसलिए अब मेरे साथ चलो।
स: (अत्यंत व्यथित होकर) प्रभु, यदि हिन्दू राज्य स्थापित नहीं होगा तो शासन कौन करेगा? क्या मुस्लिम शासक फिर लौट आएंगे?
वह: नहीं। अंग्रेज शासन करेंगे।
सत्यानन्द विरोध करते हैं, लेकिन अंततः उन्हें अपनी तलवार रख देने के लिए मना लिया जाता है।
वह: तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी हो चुकी है। तुमने अपनी मातृभूमि का भाग्य संवार दिया है। तुमने अंग्रेजी सरकार की स्थापना कर दी है। अब युद्ध छोड़ दो। लोगों को हल चलाने दो। धरती फसलों से समृद्ध हो और लोग संपन्न हों।
स: (आँखों में आँसू भरकर) मैं अपनी माता को उसके शत्रुओं के रक्त से समृद्ध कर दूँगा।
वह: अब शत्रु कौन है? अब कोई शत्रु नहीं है। अंग्रेज हमारे मित्र भी हैं और शासक भी। युद्ध में कोई उन्हें पराजित नहीं कर सकता।
बंकिमचन्द्र की राजनीतिक सोच और ‘वंदे मातरम्’ पर बहस
बंकिमचन्द्र ने पहले लिखा था कि मुसलमान पठानों (अफ़गानों) के शासन में बंगाल की बुद्धि और प्रतिभा का विकास हुआ। लेकिन बाद में उन्होंने पूरी तरह अपना रुख बदल लिया और मुसलमानों की तीखी आलोचना शुरू कर दी। इस प्रकार उन्होंने अंग्रेजों की “फूट डालो और राज करो” की नीति को और मजबूत किया।
‘आनन्द मठ’ के पाँचवें संस्करण में बंकिम लिखते हैं:
“भारत में अंग्रेजों को इसलिए शासन करना पड़ा ताकि हिन्दू धर्म अपनी प्राचीन शक्ति पुनः प्राप्त कर सके। मैं तुम्हें वही बताता हूँ जो ज्ञानी लोग जानते हैं। सच्चा धर्म तैंतीस करोड़ देवताओं की पूजा में नहीं है।
सच्चा हिन्दू धर्म ज्ञान में निहित है और वे (अंग्रेज) उसके अच्छे शिक्षक हैं। इसलिए हमें अंग्रेजी शासन स्वीकार कर लेना चाहिए। अंग्रेजी सत्ता अटूट रहेगी। अंग्रेजों के शासन में हमारे लोग सुखी रहेंगे और अपने धर्म का प्रचार करने में कोई बाधा नहीं होगी। इसलिए, हे बुद्धिमान, अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष बंद करो और मेरे साथ चलो।”
क्या यह उन अंग्रेजों की घोर खुशामद नहीं थी जिन्होंने भारत को लूटा और उसे निर्धन बना दिया?
यही वह हिन्दू “राष्ट्रवाद” था जिसका प्रचार बंकिमचन्द्र करते थे। उनके अनुसार अंग्रेज हिन्दू धर्म के रक्षक थे। यह उपन्यास औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध का संदेश नहीं देता। बल्कि यह अंग्रेजी शासन के सामने आत्मसमर्पण और उसके साथ सहयोग करने की वकालत करता है, साथ ही मुसलमानों के प्रति शत्रुता भी व्यक्त करता है। क्या इससे अंग्रेजों की “फूट डालो और राज करो” की नीति को बल नहीं मिला?
इसलिए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ‘वंदे मातरम्’ मूलतः ‘आनन्द मठ’ में प्रकाशित हुआ था, जो अंग्रेजी शासन का समर्थन करता था और मुसलमानों के प्रति शत्रुतापूर्ण था।
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