November 7, 2026

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पढ़ाई की कीमत: खून के चंद कतरे

“मेरा शरीर दोबारा खून बना लेगा। लेकिन अगर पढ़ाई का यह मौका हाथ से निकल गया, तो शायद मैं जिंदगी भर बेरोजगार ही रह जाऊंगा।”

दैनिक भास्कर की एक हृदयविदारक पड़ताल में पढ़ी गई यह पंक्ति मुझे भीतर तक झकझोर गई। करीब एक सप्ताह पहले प्रकाशित यह रिपोर्ट विस्तार से बताती है कि किस तरह गरीबी कुछ छात्रों को ऐसे फैसले लेने पर मजबूर कर रही है, जिनकी कल्पना भी सहज समाज में नहीं की जा सकती।

Student Blood Storyरिपोर्ट चौंकाने वाली थी। इसके बावजूद मैंने न तो इस पर कोई व्यापक चर्चा देखी, न बहस और न ही कोई खास प्रतिक्रिया। यह आक्रोश भरी भाषा में लिखा गया खुलासा नहीं था। यह उन युवाओं की मानवीय कहानी थी, जिनके अपने शब्द बता रहे थे कि गरीबी ने उन्हें कितने कठिन विकल्पों के सामने खड़ा कर दिया है।

इस कहानी से मेरा एक निजी जुड़ाव भी है।

मैंने यह रिपोर्ट अपने एक ऐसे मित्र को भेजी, जिसने कभी इसी तरह की परिस्थितियों में अपना खून बेचा था। यह 1986 की बात है। हममें से कुछ दोस्तों को जब इसका पता चला, तो हमने उससे वादा लिया कि वह दोबारा ऐसा कभी नहीं करेगा। कॉलेज और विश्वविद्यालय के बाकी वर्षों में हम एक-दूसरे के साथ खड़े रहे।

हममें से कोई भी बहुत संपन्न परिवार से नहीं था, लेकिन हम इतना जरूर समझते थे कि यह अमानवीय है और ऐसा दोबारा नहीं होना चाहिए। हमने उससे जुड़ी इस बात को किसी को न बताने का वादा भी किया था।

आज वह मित्र दूसरे महाद्वीप में रहता है। चार दशक पहले किए गए उस वादे को तोड़ने की अनुमति उसने मुझे दे दी है।

फोन पर उसने रोते हुए कहा, “तुम चाहो तो मेरा नाम भी लिख सकते हो… पढ़ाई का खून से रिश्ता ही नहीं टूट पा रहा, चालीस साल से…”

यह व्हाट्सऐप वीडियो कॉल थी। तीन बच्चों का पिता, करीब 60 साल का वह व्यक्ति जिस तरह फूट-फूटकर रो रहा था, उसे देखना मेरे लिए मुश्किल हो गया। मैंने वीडियो बंद कर दिया। खुद को संभालने में काफी समय लगा। सच तो यह है कि शायद मुझे इस पीड़ा से उबरने के लिए और 40 साल चाहिए होंगे, लेकिन मेरे पास इतने साल नहीं हैं।

आप दैनिक भास्कर की मूल पड़ताल यहाँ पढ़ सकते हैं। इस रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों और छात्रों के अनुभवों को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के लिए मैं इसका एक संक्षिप्त हिंदी रूप प्रस्तुत कर रहा हूँ। कोशिश है कि मूल रिपोर्ट से अनावश्यक रूप से न भटकूँ और उसके अधिकांश तथ्यों को यथासंभव बरकरार रखूँ।

पढ़ाई जारी रखने के लिए खून बेच रहे हैं छात्र

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे कुछ छात्र अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए खून बेच रहे हैं। ये गरीब किसान परिवारों से आते हैं। उनके परिवारों के पास इतनी जमीन है कि किसी तरह घर का चूल्हा जल सके, लेकिन इतनी आमदनी नहीं कि लगातार महंगी होती पढ़ाई का खर्च उठाया जा सके।

कोचिंग, हॉस्टल और भोजन का खर्च अब उनके परिवारों की क्षमता से बाहर हो चुका है। ऐसे में इन युवाओं ने पैसे जुटाने का एक और रास्ता तलाश लिया है। कुछ महीने में दो बार खून बेचते हैं, जबकि कुछ के बारे में बताया गया कि वे महीने में चार बार तक ऐसा कर रहे हैं।

Bhaskar Student Storyदैनिक भास्कर की छिपे कैमरे से की गई पड़ताल हमें उनकी इस मजबूरी से रूबरू कराती है। ये छात्र नीट और एसएससी जैसी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि शिक्षा उन्हें उन हालात से बाहर निकाल सकती है जिनमें उनका जन्म हुआ।

उनके पिता किसान हैं, लेकिन उनके पास इतनी कम जमीन है कि पूरे परिवार का खर्च उठाना मुश्किल है। छात्र अपने खर्च खुद उठाने की कोशिश करते हैं और कभी-कभी खून बेचकर मिले पैसों में से कुछ रकम गांव में अपने परिवार को भी भेजते हैं।

रिपोर्टर की मुलाकात प्रयागराज में इलाहाबाद मेडिकल एसोसिएशन के ब्लड बैंक के बाहर ऐसे ही एक छात्र से हुई। वह दो महीने से हॉस्टल की फीस नहीं दे पाया था। एसएससी परीक्षा की तैयारी कर रहा यह छात्र अपने परिवार का इकलौता बेटा था। उसकी मां का निधन हो चुका था। गांव में उसकी दो छोटी बहनें पढ़ाई जारी रखने के साथ-साथ घर के कामकाज में भी हाथ बंटाती थीं।

उसके पिता किसान थे। छात्र के मुताबिक, खेत से होने वाली आमदनी मुश्किल से परिवार के रोजमर्रा के खाने का खर्च पूरा कर पाती थी।

उसे हॉस्टल की फीस भरने के लिए पैसों की जरूरत थी। रहने की जगह नहीं होगी तो पढ़ाई कैसे जारी रखेगा? इसी मजबूरी में वह ब्लड बैंक पहुंचा था।

रिपोर्टर ने मरीज के परिजन बनकर उससे कहा कि तीन यूनिट खून की जरूरत है और कोई डोनर नहीं मिल रहा। छात्र ने तुरंत मदद की पेशकश कर दी।

रिपोर्टर ने पूछा, “कितने पैसे लोगे?”

छात्र ने जवाब दिया, “मुझे 8,000 रुपये दे दो, मैं खून दे दूंगा।”

आखिर परीक्षा की तैयारी कर रहे एक छात्र को अपना खून बेचने की जरूरत क्यों पड़ रही थी?

उसका जवाब जितना सीधा था, उतना ही दुखद भी। पिता किसान हैं और कोचिंग की फीस बहुत ज्यादा है। घर से जो पैसे आते हैं, उनसे उसका खर्च पूरा नहीं हो पाता।

रिपोर्टर ने पूछा कि वह ट्यूशन क्यों नहीं पढ़ाता या कोई दूसरा काम क्यों नहीं कर लेता?

छात्र के पास इसका जवाब भी तैयार था। शायद उस पूरी मुलाकात का सबसे विचलित कर देने वाला वाक्य यही था:

“खून तो दोबारा बन जाएगा, लेकिन अगर मैंने पढ़ाई नहीं की तो बेरोजगार ही रह जाऊंगा।”

उसने माना कि खून बेचने के बाद कुछ दिनों तक उसकी तबीयत खराब रहती है। लेकिन अब उसने इसे भी अपनी जिंदगी का हिस्सा मान लिया था। उसके लिए पैसे जुटाना ज्यादा जरूरी था। वरना उसके पास गांव लौटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।

जरा सोचिए, इस युवा के सामने कौन-कौन से विकल्प हैं? वह शहर में कोई दौलत कमाने नहीं आया। न ही वह किसी ऐशो-आराम की जिंदगी के पीछे भाग रहा है।

Farmer Studentवह सिर्फ हॉस्टल में रहने की जगह चाहता है, कोचिंग की फीस भरना चाहता है और उस शिक्षा की संभावना को जिंदा रखना चाहता है जो शायद उसकी जिंदगी बदल सके। परिवार अपनी हैसियत के मुताबिक पहले ही सब कुछ दे चुका है। अब वह इस अवसर की कीमत उस चीज से चुका रहा है जिसे कभी कमाई का जरिया नहीं बनना चाहिए था—अपने खून से।

मुझे इस बात ने भी झकझोरा कि दैनिक भास्कर की यह रिपोर्ट कुछ ही दिनों में खामोशी में गुम हो गई। एक सप्ताह बाद अखबार शायद रद्दी बन चुका होगा और सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म भी ऐसी खबरें बहुत कम लोगों तक पहुंचाते हैं।

एक ऐसे समय में, जब हमें बताया जाता है कि भारत की Gen Z जाग उठी है और शिक्षा तक पहुंच जैसे मुद्दों पर आवाज उठा रही है, तब इस कहानी का किसी बड़ी सार्वजनिक बहस का हिस्सा न बन पाना पूरे समाज पर सवाल खड़ा करता है। यह उन हालात पर भी सवाल है जिनमें शिक्षा हासिल करने की कोशिश इतनी महंगी और कष्टदायक होती जा रही है।

ऐसी खबरों के लिए मैदान में उतरने वाले पत्रकारों के प्रति मेरे मन में गहरा सम्मान है। पत्रकारिता केवल दफ्तर में कुछ घंटे काम करने और महीने के अंत में वेतन पाने का काम नहीं है। कई बार इसका मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत भारी असर पड़ता है। पत्रकार इंसानियत के सबसे अच्छे और सबसे बदसूरत, दोनों रूप देखते हैं।

कल्पना कीजिए कि आप एक के बाद एक छात्रों से बात कर रहे हैं। उन्हें खून बेचने के लिए कतार में खड़ा देख रहे हैं। उन्हें किसी ऐसे परिवार की तलाश करते देख रहे हैं जिसे खून की जरूरत है। फिर आप उन्हें अपने खून की बेहतर कीमत पाने के लिए उस परिवार से मोलभाव करते देखते हैं, जो खुद किसी गंभीर संकट से गुजर रहा हो। क्या यह सब देखने के बाद कोई पत्रकार रात को अपने बिस्तर पर लौटकर पहले जैसा रह सकता है?

अखबारों में पत्रकारों के मानसिक तनाव को समझने और उससे उबरने के लिए कोई व्यवस्था क्यों नहीं होती, यह बात मुझे हमेशा हैरान करती है।

इस रिपोर्ट में सामने आए दूसरे छात्रों के अनुभव कहानी को और भी भयावह बना देते हैं। एक छात्र हॉस्टल में रहने के लिए पैसे जुटा रहा है, दूसरा कोचिंग और मेस का खर्च उठाने के लिए खून बेच रहा है, जबकि तीसरे के परिवार ने उसे डॉक्टर बनाने के सपने के लिए अपनी जमीन गिरवी रख दी है। तीनों अपने परिवारों के बड़े त्याग से मिले शिक्षा के अवसर को किसी तरह बचाए रखना चाहते हैं।

और युवा जिंदगियां, मजबूरी की और कहानियां

एक अन्य छात्र आनंद एसएससी परीक्षा की तैयारी कर रहा था। वह कोचिंग की फीस जुटाने के लिए ब्लड बैंक आया था। इससे महज दस दिन पहले उसने एक दूसरे ब्लड बैंक में अपना खून बेचकर मेस का बिल चुकाया था। अब उसे फिर पैसों की जरूरत थी।

उसके पिता बीमार थे और परिवार को उससे आर्थिक मदद की भी उम्मीद थी। इसके बावजूद आनंद को भरोसा था कि अगर वह एक दिन सरकारी अधिकारी बन गया तो उसकी सारी परेशानियां खत्म हो जाएंगी। उसने कहा कि यही उम्मीद उसे आगे बढ़ने की ताकत देती है।

Blood Saleजब उससे पूछा गया कि वह खून क्यों बेच रहा है, तो उसने कहा:

“मुझे पैसों की जरूरत है। पहले कोचिंग की फीस भरने के लिए खून बेचा था। अब मेस का बिल देना है।”

क्या इस बात को समझना मुश्किल है? वह मेस में खाना खाने का खर्च उठाने के लिए अपना खून बेच रहा है। लेकिन शायद इस सवाल को उठाना भी हमारे लिए विलासिता बन गया है।

एक और सवाल ज्यादा जरूरी था—क्या दस दिन के भीतर दोबारा खून देना खतरनाक नहीं है?

आनंद ने इस चिंता को ज्यादा महत्व नहीं दिया। उसका कहना था कि पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए उसे कुछ तो करना ही होगा। उसने बताया कि छात्र ब्लड बैंक की व्यवस्था के बीच अपना रास्ता कैसे निकालते हैं। पहले वे खून देते हैं और उसकी पर्ची लेते हैं। बाद में मरीज की मांग से जुड़ा पत्र दिखाकर पैसे हासिल करते हैं।

इसके बाद मुलाकात हुई विवेक से, जो मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए होने वाली नीट परीक्षा की तैयारी कर रहा था। उसकी कहानी में पूरे परिवार के त्याग और उम्मीदों का बोझ साफ दिखाई देता है।

उसने कहा, “कोई भी अपनी मर्जी से खून नहीं बेचता।”

उसके पिता को उससे बहुत उम्मीदें थीं। उसे कोचिंग के लिए प्रयागराज भेजने के वास्ते परिवार ने अपनी दो बीघा कृषि जमीन गिरवी रख दी थी। पिता ने बेटे की पढ़ाई के लिए कर्ज भी लिया था। लेकिन विवेक अभी तक परीक्षा पास नहीं कर पाया था। अब उसके पास केवल एक और प्रयास बचा था।

वह ब्लड बैंक इसलिए आया था क्योंकि दिवाली से पहले उसे कोचिंग की फीस जमा करनी थी।

Mortgageउसने बताया कि उसके पिता किसान हैं और घर का खर्च चलाना भी मुश्किल से संभव हो पाता है। खून बेचकर मिलने वाले पैसे से वह अपनी फीस भर सकता था। एक बिचौलिया उसे ब्लड बैंक लेकर आया था, लेकिन वह भी रकम में से अपना हिस्सा लेता। विवेक को लगा कि किसी जरूरतमंद मरीज के परिजन से सीधे बात करना बेहतर होगा।

जब उससे पूछा गया कि पैसे जुटाने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है, तो उसने कहा:

“अगर हमारा परिवार आर्थिक रूप से मजबूत होता तो कोई परेशानी ही नहीं होती।”

लेकिन ऐसा नहीं था। इसलिए जब भी कोई जरूरी खर्च सामने आता, वह खून बेचने के लिए आ जाता।

एक तीसरा छात्र आशीष भी नीट की तैयारी कर रहा था। उसने रिपोर्टर को बताया कि प्रयागराज में बाहर से आकर पढ़ने वाले कई छात्र इसी तरह पैसों का इंतजाम कर रहे हैं।

उसके परिवार ने उसे इस उम्मीद के साथ शहर भेजा था कि एक दिन वह डॉक्टर बनकर लौटेगा। लेकिन अब हर छोटे-बड़े खर्च के लिए माता-पिता से पैसे मांगना उसके लिए मुश्किल होता जा रहा था। पिता की उम्मीदों का बोझ उस पर था। कोचिंग की फीस महंगी थी और बार-बार घर से पैसे मांगना उसे अच्छा नहीं लगता था।

इसलिए उसने भी अपने खर्च का इंतजाम खुद करने का रास्ता तलाश लिया था।

इन युवाओं के खून बेचने की बात करने के तरीके में एक अजीब-सी सहजता दिखाई देती है। कुछ के लिए यह तत्काल आर्थिक जरूरत पूरी करने का एक सामान्य उपाय बनता जा रहा था। जब एक छात्र से खून की कीमत के बारे में पूछा गया तो उसने एक चौंकाने वाली तुलना की। उसके मुताबिक, छात्र के खून की कीमत ज्यादा मिलती है, जबकि नशे के आदी व्यक्ति के खून के लिए कम पैसे दिए जाते हैं।

मजबूरी का अर्थशास्त्र

चार छात्रों से बातचीत के बाद रिपोर्टरों ने एक पैटर्न पहचाना। उन्हें पता चला कि प्रयागराज में रहने वाले कई छात्र महंगी कोचिंग, अध्ययन सामग्री और पढ़ाई से जुड़े दूसरे खर्चों के लिए खून बेचने का रास्ता अपना रहे हैं।

मुझे नहीं पता कि रिपोर्टर ने इन छात्रों से उनके शहर की उस राजनीति के बारे में भी बात की या नहीं, जहां लोगों को मुगलकालीन नाम हटाने और शहरों का नाम कथित तौर पर हिंदू पहचान के अनुरूप बदलने जैसे मुद्दों पर उत्तेजित किया जा सकता है।

इस पूरे आर्थिक लेन-देन की एक और परत सामने आई। छात्रों को बताया जाता था कि ब्लड बैंक की प्रोसेसिंग फीस 1,500 रुपये है। यानी अगर कोई छात्र अपना खून 5,000 रुपये में देने को तैयार होता है, तो उसके हाथ में वास्तव में केवल 3,500 रुपये ही आते हैं।

Coaching

कुछ छात्र बार-बार खून बेचते पकड़े जाने से बचने के लिए एक से अधिक ब्लड बैंकों में जाते थे। कुछ दूसरे लोग बिचौलियों के बजाय खुद संभावित मरीजों के परिजनों को तलाशते और सीधे सौदा करते थे, ताकि रकम में से किसी और को हिस्सा न देना पड़े।

इन मुलाकातों से जो तस्वीर उभरती है, वह केवल गरीबी की कहानी नहीं है। यह उन युवाओं की कहानी है जिनके परिवारों ने उनमें बड़े सपने लगाए हैं, लेकिन आर्थिक हालात उन सपनों को पूरा करना लगातार कठिन बनाते जा रहे हैं।

एक पिता अपने बेटे को मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कराने के लिए जमीन गिरवी रख देता है। दूसरा अपने परिवार को दो वक्त का खाना खिलाने में ही मुश्किल महसूस करता है और बेटे की कोचिंग तथा रहने का खर्च उठाने की स्थिति में नहीं है। दूसरी ओर, उनके बच्चे यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि परिवार का त्याग बेकार न जाए।

वे शिक्षा, रोजगार और एक बेहतर जिंदगी की तलाश में शहर आए हैं। लेकिन इस दौड़ में बने रहने की कीमत इतनी भारी हो गई है कि कुछ युवा अपनी शारीरिक सेहत का हिस्सा बेचकर पढ़ाई का खर्च उठाने को तैयार हैं।

यह उस समाज की बेहद विचलित करने वाली तस्वीर है, जहां एक युवा का खून उसकी शिक्षा का खर्च जुटाने का साधन बन जाता है। जिस शरीर को वर्षों तक पढ़ाई के लिए स्वस्थ और मजबूत बने रहना चाहिए, उसी शरीर से पढ़ाई का खर्च निकालने की नौबत आ गई है।

Student Hostelऔर शायद सबसे दर्दनाक विडंबना यह है कि ये छात्र किसी ऐशो-आराम की जिंदगी नहीं मांग रहे। वे सिर्फ सम्मान के साथ जीने का एक अवसर खरीदने की कोशिश कर रहे हैं।

आप अपनी सुविधानुसार भुगतान के बदले खून लेने की नैतिकता, वैधता और सुरक्षा पर बहस कर सकते हैं। लेकिन इस मूल बात को नजरअंदाज मत कीजिए कि ये वे छात्र हैं जो पढ़ाई जारी रखने के लिए दृढ़ हैं और इसकी कीमत अपने खून से चुकाने को तैयार हो गए हैं।

हमने ऐसी खबरों को इतना सामान्य बना दिया है कि अब वे शहर में किसी बड़ी बहस को जन्म भी नहीं देतीं। जब भविष्य में हमारे समय का इतिहास अधिक सक्षम और वास्तविक जनपक्षीय इतिहासकार लिखेंगे, तो शायद हमें ऐसे समाज के रूप में याद किया जाएगा जिसने सड़कों पर बहते खून और सड़क किनारे बिकते खून की इकाइयों—दोनों को अनदेखा कर दिया।

किसी भी युवा को, खासकर Gen Z को, इस तरह की कीमत नहीं चुकानी चाहिए।

इसलिए अगली बार जिस व्यक्ति से मिलें, उससे इस कहानी पर बात कीजिए। इसे अपने सोशल मीडिया पर साझा कीजिए। ऐसी खबरें सामने लाने वाले पत्रकारों का आभार व्यक्त कीजिए और इस तरह की पत्रकारिता को प्रोत्साहित कीजिए। साथ ही, उस राजनीति के बारे में भी गंभीरता से सोचिए जो खून जमा देने वाली ऐसी कहानियों से भी विचलित नहीं होती। Punjab Today Logo


लेखक चंडीगढ़ स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्होंने अपनी पहचान सार्वजनिक न करने का निर्णय लिया है। उनका आग्रह है कि पाठक हिंदी दैनिक में प्रकाशित मूल रिपोर्ट अवश्य पढ़ें और इस पड़ताल को सामने लाने वाले पत्रकारों को उचित श्रेय दें।
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