15 से 30 अगस्त तक बेल्जियम और नीदरलैंड में होने वाले एफआईएच हॉकी विश्व कप से पहले भारतीय पुरुष और महिला टीमों को अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने, संयोजन तय करने और पदक की दौड़ के लिए तैयारी में पूरी तरह जुटा होना चाहिए था। लेकिन इस समय चर्चा खेल से ज्यादा जर्सी के रंग पर हो रही है।
दो दशकों से अधिक समय तक भारतीय हॉकी की पहचान रही प्रतिष्ठित नीली जर्सी को छोड़कर केसरिया रंग अपनाने के फैसले ने खिलाड़ियों, पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों, प्रशासकों और खेल प्रेमियों के बीच तीखी बहस छेड़ दी है।
कोच ग्राहम रीड के कार्यकाल में भारतीय हॉकी के पुनरुत्थान से लेकर टोक्यो और पेरिस ओलंपिक में लगातार दो कांस्य पदक जीतने तक “मेन इन ब्लू” केवल एक टीम का नाम नहीं रहा, बल्कि भारतीय हॉकी की नई पहचान बन गया था। ऐसे समय में, जब विश्व कप सिर पर है, हॉकी इंडिया ने पुरुष और महिला दोनों टीमों के लिए केसरिया जर्सी पेश कर दी। नतीजा यह हुआ कि खेल से इतर भावनात्मक और कुछ हद तक राजनीतिक बहस शुरू हो गई।
‘बेहतर दृश्यता’ का तर्क और उठते सवाल
हॉकी इंडिया का कहना है कि यह फैसला केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि तकनीकी भी है। अधिकारियों का तर्क है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय हॉकी नीले सिंथेटिक टर्फ पर खेली जाती है और ऐसे में नीली जर्सी पहनने पर तेज़ गति के दौरान खिलाड़ियों को अपने साथी खिलाड़ियों को पहचानने में थोड़ी कठिनाई हो सकती है। उनके अनुसार केसरिया रंग अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। साथ ही यह भारतीय तिरंगे का रंग भी है, जो साहस और बलिदान का प्रतीक माना जाता है।
यह तर्क सुनने में तार्किक लग सकता है, लेकिन इससे सभी सहमत नहीं हैं।
मेरे लिए भी एम्स्टलवीन का वैगेनर स्टेडियम केवल एक हॉकी मैदान नहीं, बल्कि यादों से जुड़ी एक जगह है। यहीं भारत अपने ग्रुप-ए अभियान की शुरुआत वेल्स, इंग्लैंड और पाकिस्तान के खिलाफ करेगा।

सुरजीत सिंह रंधावा
भारत ने 1975 में अपना पहला और अब तक का एकमात्र हॉकी विश्व कप जीता था। लेकिन मेरी पीढ़ी के लिए 1973 का एम्स्टर्डम विश्व कप आज भी अलग मायने रखता है। 1968 और 1972 ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद वह टीम शायद विदेश जाने वाली सबसे मजबूत भारतीय टीमों में से एक थी।
आज भी बहुत से लोग नहीं भूले होंगे कि फाइनल में डिफेंडर सुरजीत सिंह रंधावा के दो पेनाल्टी कॉर्नर गोलों की बदौलत भारत ने मेज़बान नीदरलैंड के खिलाफ शुरुआती 12 मिनट में ही 2-0 की बढ़त बना ली थी। अंततः पेनाल्टी शूटआउट में खिताब हाथ से निकल गया, लेकिन मन में हमेशा यह विश्वास रहा कि एक दिन उस हार का हिसाब चुकाया जाएगा।
आज जब भारत फिर उसी धरती पर विश्व कप खेलने जा रहा है, तो वह भावना भी केसरिया जर्सी के विवाद की छाया में दबती दिखाई दे रही है।
यह भी याद रखना चाहिए कि भारत ने पहले विश्व कप में बार्सिलोना में कांस्य पदक जीता था। लेकिन 1975 की ऐतिहासिक जीत के बाद विश्व कप भारत के लिए कभी वैसी यादगार प्रतियोगिता नहीं बन पाया।
हॉकी इंडिया की ‘बेहतर दृश्यता’ वाली दलील ने भी सभी को आश्वस्त नहीं किया।
पूर्व भारतीय कप्तान और ओलंपियन वीरेन रासक्विन्हा ने इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि नीला रंग भारतीय खेलों की पहचान बन चुका है।
वहीं जूनियर टीम के कोच और महान गोलकीपर पी. आर. श्रीजेश ने विश्व कप पर ध्यान केंद्रित करने की अपील करते हुए एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यदि नीली जर्सी वास्तव में नुकसानदेह है, तो फिर भविष्य में किसी भी टीम को नीली जर्सी नहीं पहननी चाहिए।
उनकी अपील के पीछे स्पष्ट सोच थी। उनका मानना है कि खिलाड़ियों का ध्यान मैदान से बाहर के विवादों में नहीं, बल्कि विश्व कप जीतने पर होना चाहिए।

दिलीप तिर्की
सबसे चौंकाने वाली प्रतिक्रिया हॉकी इंडिया के अध्यक्ष और भारत के महान डिफेंडरों में शामिल डॉ. दिलीप तिर्की की ओर से आई। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि जर्सी बदलने का फैसला उनकी जानकारी के बिना लिया गया और उन्होंने हॉकी इंडिया की कार्यकारी समिति से इस प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण मांगा।
एक पल में ही यह मामला केवल जर्सी के डिजाइन का नहीं रहा, बल्कि हॉकी इंडिया के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, परामर्श और पारदर्शिता का मुद्दा बन गया।
बाद में उन्होंने, चाहे टीम के हित में या किसी अन्य कारण से, सिंथेटिक टर्फ पर ‘बेहतर दृश्यता’ वाले तर्क का समर्थन कर दिया। हरमनप्रीत नहीं बल्कि हार्दिक सिंह सहित कुछ खिलाड़ियों ने भी इस फैसले का समर्थन किया।
इस बदलाव के समर्थकों का कहना है कि आधुनिक खेल विज्ञान के अनुसार रंगों का बेहतर अंतर खिलाड़ियों को पलक झपकते निर्णय लेने में मदद कर सकता है। दूसरी ओर आलोचकों का सवाल है कि अभी तक ऐसा कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है जिससे यह सिद्ध हो सके कि केवल जर्सी का रंग बदलने से शीर्ष स्तर पर परिणाम भी बदल जाते हैं।
नीला सिर्फ एक रंग नहीं, भारतीय हॉकी की पहचान है
इतिहास इस बहस को एक अलग नज़रिये से देखने की भी मांग करता है।
2014 के हॉकी विश्व कप में भारतीय टीम ने अपनी पारंपरिक नीली जर्सी छोड़कर मुख्यतः पीले रंग की जर्सी पहनी थी। यह प्रयोग न तो परिणामों के लिहाज़ से सफल रहा और न ही खिलाड़ियों की पहचान बन सका। कुछ ही समय बाद टीम फिर अपनी पारंपरिक नीली जर्सी में लौट आई। हाँ, मोज़ों, कॉलर और बाजुओं पर नारंगी रंग की झलक ज़रूर जोड़ी गई, लेकिन भारतीय हॉकी की पहचान फिर वही नीला रंग बन गया।
यही नीली जर्सी बाद में टोक्यो और पेरिस ओलंपिक में लगातार दो कांस्य पदकों की गवाह बनी। इसलिए आज जब इसे अचानक केसरिया रंग से बदलने की बात होती है तो बहुत से लोगों को लगता है कि यह केवल रंग बदलने का मामला नहीं है। यह उस पहचान से दूरी बनाने जैसा है, जिसके साथ भारतीय हॉकी की हाल की सबसे बड़ी सफलताएँ जुड़ी रही हैं।
नई जर्सी तैयार करने वाली कंपनी शिव नरेश भारत की सबसे पुरानी स्वदेशी खेल परिधान कंपनियों में से एक है। 1987 में नई दिल्ली में स्थापित इस कंपनी ने 2013 से हॉकी इंडिया की आधिकारिक परिधान साझेदार के रूप में पुरुष, महिला और जूनियर राष्ट्रीय टीमों के लिए खेल, अभ्यास और यात्रा से जुड़े परिधान तैयार किए हैं। इससे पहले अलग-अलग दौर में भारतीय टीम एडिडास और नाइकी जैसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों की जर्सियाँ पहनती रही है।
विडंबना यह है कि शिव नरेश उस विवाद के केंद्र में आ गई है, जिसे उसने स्वयं पैदा नहीं किया। कंपनी ने केवल वही डिजाइन तैयार किया है जिसे हॉकी इंडिया ने स्वीकृति दी। लेकिन आज वही जर्सी देश की सबसे चर्चित खेल पोशाक बन चुकी है।
सफेद से नीले तक की यात्रा
इस बहस के बीच इतिहास का एक और अध्याय याद करना ज़रूरी है।
एम्स्टर्डम वही शहर है जहाँ 1928 ओलंपिक में जयपाल सिंह के नेतृत्व में ब्रिटिश भारतीय टीम ने अपने स्वर्णिम युग की शुरुआत की थी। बाद में लाल शाह बुखारी और हॉकी के जादूगर ध्यानचंद ने उस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया।

उस दौर में भारतीय खिलाड़ियों की जर्सी का प्रमुख रंग सफेद हुआ करता था। छाती की जेब पर केवल “India” का बैज लगा होता था। वही सादा सफेद परिधान भारतीय हॉकी के स्वर्णिम इतिहास का प्रतीक बन गया।
1948 से 1964 के ओलंपिक के बीच, जब भारत ने चार स्वर्ण और एक रजत पदक जीता, तब धीरे-धीरे जर्सी के कॉलर और अन्य हिस्सों में नीले रंग की झलक दिखाई देने लगी। समय के साथ यह रंग भारतीय हॉकी की स्थायी पहचान बन गया।
बीच-बीच में नारंगी, सफेद और पीले रंग के साथ कुछ प्रयोग अवश्य हुए, लेकिन नई सदी में प्रवेश करते-करते नीला रंग भारतीय हॉकी का पर्याय बन चुका था।
यही कारण है कि आज की बहस केवल नीले और केसरिया रंग के बीच नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या खेलों में भी कुछ प्रतीक ऐसे बन जाते हैं जिन्हें केवल तकनीकी तर्कों के आधार पर बदला नहीं जा सकता?
हो सकता है कि आने वाले वर्षों में यही केसरिया जर्सी भारतीय हॉकी की नई पहचान बन जाए। लेकिन ऐसा किसी प्रशासनिक फैसले से नहीं होगा। यह तभी संभव होगा जब इसी जर्सी में भारतीय टीम विश्व मंच पर नई सफलताओं का इतिहास लिखेगी।
आख़िरकार किसी भी जर्सी को प्रतिष्ठा उसका रंग नहीं, बल्कि उसे पहनकर जीती गई उपलब्धियाँ दिलाती हैं।
अब फैसला मैदान पर होगा, जर्सी के रंग पर नहीं
अब जब एम्स्टलवीन और बेल्जियम के मैदानों पर पहली सीटी बजेगी, तब जर्सी का रंग नहीं बल्कि प्रदर्शन मायने रखेगा। यही वह क्षण होगा जब सारी बहस पीछे छूट जानी चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए कि मुख्य कोच क्रेग फुल्टन अपनी टीम को इस अनावश्यक विवाद से दूर रखते हुए पूरी तरह खेल पर केंद्रित रखेंगे।
जर्सी विवाद के अलावा भारतीय महिला टीम को लेकर भी एक सवाल लगातार उठ रहा है। टीम के डच मुख्य कोच स्जोर्ड मेरिन 12 जुलाई से अवकाश पर हैं और 6 अगस्त को टीम से जुड़ने वाले हैं। इस दौरान वह बेंगलुरु में हुए तैयारी शिविर और कुछ दिन पहले जर्मनी के खिलाफ खेले गए अभ्यास मैच में भी मौजूद नहीं थे। विश्व कप जैसे बड़े टूर्नामेंट से ठीक पहले उनकी अनुपस्थिति को लेकर भी कई पूर्व खिलाड़ियों और विशेषज्ञों ने चिंता जताई है।

इसके बावजूद भारतीय पुरुष टीम इस विश्व कप में आत्मविश्वास के साथ उतर रही है। पिछले कुछ वर्षों में क्रेग फुल्टन के मार्गदर्शन में भारत ने दुनिया की सबसे अनुशासित रक्षापंक्तियों में अपनी जगह बनाई है।
कप्तान हरमनप्रीत सिंह आज भी दुनिया के सबसे खतरनाक ड्रैग-फ्लिक विशेषज्ञों में गिने जाते हैं। मिडफ़ील्ड अनुभव और गति से भरपूर है, जबकि आक्रमण पंक्ति में नीदरलैंड, बेल्जियम, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया जैसी मजबूत टीमों को चुनौती देने की पूरी क्षमता है।
यदि भारत लगातार पेनाल्टी कॉर्नर को गोल में बदलने में सफल रहता है और अपनी रक्षात्मक मजबूती बनाए रखता है तो अंतिम चार में पहुँचना कोई असंभव लक्ष्य नहीं होगा। सही दिन और सही लय में यही टीम खिताब तक भी पहुँच सकती है।
भारतीय महिला टीम को भी कमतर नहीं आँकना चाहिए। इस टीम में चुपचाप बड़ा उलटफेर करने की क्षमता है। यदि खिलाड़ी अपनी स्वाभाविक लय में खेलीं तो नॉकआउट चरण तक पहुँचना पूरी तरह संभव है।
आख़िरकार इतिहास रंग नहीं, विजेता याद रखता है
सवाल यह नहीं है कि भारत नीली जर्सी पहने या केसरिया।
सवाल यह है कि क्या विश्व कप से ठीक पहले खिलाड़ियों का ध्यान उस बहस में उलझना चाहिए, जिसका फैसला अंततः मैदान पर होना है।
खेलों का इतिहास हमें बार-बार यही सिखाता है कि पहचान केवल रंगों से नहीं बनती। पहचान बनती है प्रदर्शन से, उपलब्धियों से और उन पलों से, जिन्हें आने वाली पीढ़ियाँ याद रखती हैं।
29 अगस्त को एम्स्टलवीन के वैगेनर स्टेडियम में महिला फाइनल हो या 30 अगस्त को बेल्जियम के वावरे स्थित बेल्फियस हॉकी सेंटर में पुरुष फाइनल, इतिहास किसी टीम की जर्सी का रंग याद नहीं रखेगा:
इतिहास केवल चैंपियनों को याद रखता है। ![]()
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