August 8, 2026

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राजनीतिक संकेत

बांकीपुर से भाजपा को चेतावनी

एक सीट की जीत, लेकिन बड़ा राजनीतिक संदेश

अंग्रेज़ी की एक कहावत है, “एक चिड़िया से बसंत नहीं आता।” बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत पर यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। लेकिन भारतीय जनता पार्टी यदि इस नतीजे को महज एक मामूली घटना समझकर नजरअंदाज करती है, तो यह उसकी बड़ी भूल होगी। हालिया उपचुनावों के नतीजे, जिनमें उसके शासन वाले राज्य की दतिया सीट पर मिली हार भी शामिल है, निश्चित रूप से पार्टी के लिए झटका हैं। यह वही पार्टी है जो हाल के दिनों में लगातार चुनावी जीत की लहर पर सवार रही है।

विधानसभा के उपचुनाव हमेशा जनता के समग्र राजनीतिक मूड का सटीक प्रतिबिंब नहीं होते। आम तौर पर रुझान सत्तारूढ़ दल के पक्ष में रहता है, खासकर तब जब वही दल केंद्र में भी सत्ता में हो। मतदाताओं का मानना होता है कि सत्तारूढ़ दल का विधायक चुने जाने से न केवल क्षेत्र को लाभ होगा, बल्कि सरकारी मदद चाहने वाले लोगों को भी फायदा मिलेगा।

भाजपा के लिए प्रतीकात्मक झटका

पटना के मध्य में स्थित इस सीट पर, ऐसे राज्य में जहां भाजपा ने कुछ ही महीने पहले भारी जीत दर्ज की थी, उपचुनाव का नतीजा पार्टी के लिए निश्चित रूप से असहज करने वाला है। यह असहजता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि यह वही सीट थी जो भाजपा के नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी। पिछले तीन दशकों से यह सीट भाजपा के कब्जे में थी और नितिन नवीन लगातार पांच बार यहां से जीत चुके थे।

दूसरी ओर, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी को विधानसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा था। पार्टी ने जिन 238 सीटों पर चुनाव लड़ा, उन सभी पर उसे हार मिली और 236 सीटों पर उसकी जमानत भी जब्त हो गई। पार्टी को कुल मिलाकर केवल तीन प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि स्वयं प्रशांत किशोर ने चुनाव नहीं लड़ा था।

छात्र आंदोलन और राजनीतिक असर

यह उपचुनाव ऐसे समय हुआ जब जंतर-मंतर से शुरू हुआ ऐतिहासिक छात्र आंदोलन पटना सहित कई अन्य शहरों तक फैल चुका था। युवाओं में व्याप्त असंतोष का असर इस चुनाव पर पड़ना स्वाभाविक था। छात्रों पर हुए बर्बर लाठीचार्ज और पेलेट गनों के इस्तेमाल ने उनके गुस्से को और भड़का दिया। काफी देर से हुआ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और सरकार तथा छात्र प्रतिनिधियों के बीच हुई बातचीत से आंदोलन पर फिलहाल विराम जरूर लगा, लेकिन यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि इन घटनाओं पर आखिरी शब्द कह दिया गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन घटनाक्रमों को लेकर गंभीर रूप से चिंतित थे और जिन्होंने उन्हें अपशब्द कहे थे, उन्हें माफ करना उनका स्वागतयोग्य कदम था। गाली-गलौज को सही नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन इसके लिए लोगों को दंडित करना या उन्हें परेशान करना भी आगे बढ़ने का रास्ता नहीं था। प्रधानमंत्री के इस हस्तक्षेप से यह स्पष्ट हुआ कि ऐसी स्थितियों का समाधान मुकदमों या बल प्रयोग से नहीं, बल्कि समझाने और संबंधित लोगों तक पहुंचने से किया जाना चाहिए।

भाजपा को सुनना भी सीखना होगा

हालांकि, प्रधानमंत्री का यह संदेश उनकी पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं और समर्थकों तक नहीं पहुंचा। इनमें से कुछ ने आंदोलन में शामिल छात्रों के खिलाफ बेहद जहरीला अभियान शुरू कर दिया। खास तौर पर छात्राओं को निशाना बनाया जा रहा है और उन्हें बलात्कार की धमकियां दी जा रही हैं। कुछ छात्रों की संपर्क जानकारी कथित तौर पर जानबूझकर सार्वजनिक कर दी गई, जिससे उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ गई। एक 15 वर्षीय लड़की को कैमरे के सामने माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया और लगातार मिल रही धमकियों के कारण उसे अपना घर छोड़ना पड़ा। एक वायरल वीडियो में एक पार्टी नेता भी आंदोलन में शामिल छात्रों को धमकाते हुए दिखाई दिए।

प्रधानमंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को आगे आकर इन गैर-जिम्मेदार ट्रोल्स को सही संदेश देना चाहिए। उन्हें रोकना जरूरी है, ताकि युवाओं की ओर से एक और प्रतिक्रिया देखने को न मिले। इसी तरह, कानून लागू करने वाली एजेंसियों को भी आंदोलन में शामिल छात्रों की डोजियर तैयार करने जैसी कार्रवाई से बचना चाहिए।

छात्र आंदोलन, उपचुनावों में मिले झटके, राम मंदिर और कुछ अन्य मंदिरों में कथित “चंदा चोरी” के आरोप तथा पार्टी के भीतर चल रही खींचतान सहित कई कारणों से भाजपा इस समय बैकफुट पर दिखाई दे रही है। अब उसे फिर से ड्रॉइंग बोर्ड पर लौटकर निष्पक्षता से विश्लेषण करना होगा कि आखिर क्या गलत हो रहा है। इसके लिए उसे सबसे पहले अपना अहंकार छोड़ना होगा और जनता तथा उनके प्रतिनिधियों के साथ संवाद के और अधिक रास्ते खोलने होंगे। Punjab Today Logo

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