कई वर्षों से ऐसा लगता था कि वॉशिंगटन और बीजिंग दो ऐसी रेलगाड़ियों की तरह हैं, जो टकराव की ओर तेजी से बढ़ रही हैं। अब, कम-से-कम फिलहाल, दोनों ने ब्रेक लगा दिए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ वॉशिंगटन में हुई गर्मजोशी भरी मुलाकात ने दुनिया की दो सबसे बड़ी शक्तियों के बीच माहौल में आए बदलाव को सामने रखा है। टकराव की पुरानी भाषा की जगह अब बातचीत, सौदेबाजी और अपने-अपने हितों के अनुरूप समझौते की कोशिश दिखाई दे रही है।
भारत के लिए इस बदलते परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण संदेश है। नई दिल्ली अपनी विदेश नीति इस धारणा पर आधारित नहीं कर सकती कि अमेरिका और चीन हमेशा स्थायी प्रतिद्वंद्वी बने रहेंगे। यदि ट्रंप आर्थिक या रणनीतिक कारणों से शी के करीब आते हैं, तो भारत को अपने हितों की सावधानीपूर्वक रक्षा करनी होगी।
ट्रंप–शी की मुलाकात का यह मतलब नहीं है कि अमेरिका और चीन के बीच प्रतिद्वंद्विता समाप्त हो गई है। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि जब उनके हित इसकी मांग करते हैं, तो दोनों नेता अपने मतभेदों को संभालने के लिए तैयार हैं।
ट्रंप ने व्यावहारिक रास्ता क्यों चुना?
शी के लिए ट्रंप का गर्मजोशी भरा स्वागत टकराव से व्यावहारिक कूटनीति की ओर बदलाव का संकेत था। लंबे समय से चले आ रहे व्यापारिक तनाव ने आर्थिक दबाव की सीमाओं को उजागर किया है, जबकि महत्वपूर्ण खनिजों पर चीन का नियंत्रण और उसकी लचीली अर्थव्यवस्था ने वॉशिंगटन की रणनीति को जटिल बनाया है। ट्रंप को अन्य भू-राजनीतिक चुनौतियों से निपटने के लिए भी स्थिरता की जरूरत है।
इसलिए यह गर्मजोशी पीछे हटने से अधिक अमेरिका के सबसे शक्तिशाली आर्थिक प्रतिद्वंद्वी के साथ बातचीत के लिए जगह बनाने की कोशिश थी।
अमेरिका और चीन के बेहतर रिश्ते अमेरिकी वस्तुओं के लिए चीनी बाजार खोल सकते हैं, महत्वपूर्ण खनिजों तक पहुंच बेहतर कर सकते हैं और अमेरिकी ऊर्जा तथा कृषि उत्पादों की चीनी खरीद बढ़ा सकते हैं। फेंटानिल और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में सहयोग भी अमेरिकी हितों के लिए उपयोगी हो सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तनाव में कमी से आर्थिक स्थिरता और पूर्वानुमेयता बढ़ सकती है तथा वॉशिंगटन को अन्य वैश्विक चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिल सकता है। हालांकि, असली परीक्षा यह होगी कि क्या कूटनीतिक गर्मजोशी टिकाऊ और लागू किए जा सकने वाले समझौतों में बदलती है।
भारत के अमेरिका के साथ संबंधों में मजबूती का एक कारण यह भी रहा है कि दोनों देश हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंतित हैं। रक्षा सहयोग, प्रौद्योगिकी साझेदारी और जापान तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ समन्वय ने भारत की स्थिति मजबूत की है।
ट्रंप और शी के बीच बढ़ती गर्मजोशी इन समीकरणों में कुछ बदलाव ला सकती है। यदि वॉशिंगटन बीजिंग के साथ व्यापार और आर्थिक स्थिरता को अधिक महत्व देने लगता है, तो चीन पर दबाव कम हो सकता है।
इसका यह मतलब नहीं कि अमेरिका भारत को छोड़ देगा। भारत अब भी एक महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक साझेदार है। लेकिन नई दिल्ली को यह नहीं मान लेना चाहिए कि वॉशिंगटन और बीजिंग के संबंध हमेशा विरोधी ही बने रहेंगे।
सबक स्पष्ट है: भारत को दो बड़ी शक्तियों के बीच प्रतिद्वंद्विता पर निर्भर रहने के बजाय अपनी ताकत खुद बढ़ानी होगी।
भारत के सामने चुनौतियां
पहली चुनौती आर्थिक है। यदि अमेरिकी कंपनियां चीन के साथ कारोबार करने में अधिक सहज महसूस करने लगती हैं, तो भारत को निवेश और विनिर्माण के लिए अधिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। भारत को बेहतर बुनियादी ढांचा, कारोबार के लिए आसान परिस्थितियां और अधिक प्रतिस्पर्धी विनिर्माण वातावरण उपलब्ध कराना होगा।
दूसरी चुनौती प्रौद्योगिकी की है। चीन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरियों, दूरसंचार और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों में तेजी से प्रगति की है। भारत को अपनी तकनीकी क्षमता के विकास में तेजी लानी होगी।
तीसरी चुनौती सुरक्षा की है। भारत–चीन सीमा विवाद अभी भी अनसुलझा है। यदि वॉशिंगटन और बीजिंग के संबंध बेहतर होते हैं, तो चीन को एशिया में अधिक कूटनीतिक जगह मिल सकती है। भारत को इसलिए अपनी सैन्य तैयारियों को मजबूत बनाए रखना होगा।
चौथी चुनौती पाकिस्तान के साथ चीन के करीबी संबंध हैं। अमेरिका और चीन के बेहतर संबंधों से बीजिंग और इस्लामाबाद के रिश्ते जरूरी नहीं कि बदल जाएं। भारत को अपने उत्तरी और पश्चिमी, दोनों मोर्चों पर होने वाले घटनाक्रम पर सावधानीपूर्वक नजर रखनी होगी।
पांचवीं चुनौती कूटनीतिक है। भारत को अमेरिका के करीब रहना है, लेकिन वॉशिंगटन पर निर्भर नहीं होना है।
एशिया पर प्रभाव
ट्रंप–शी की बातचीत का असर पूरे एशिया में पड़ सकता है। जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश बारीकी से देखेंगे कि अमेरिका चीन के साथ कितनी दूर तक समझौता करने के लिए तैयार है।
अमेरिका–चीन तनाव में कमी से चीन को क्षेत्र में अधिक कूटनीतिक जगह मिल सकती है। बीजिंग इस अवसर का इस्तेमाल छोटे एशियाई देशों के बीच अपने आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव को मजबूत करने के लिए कर सकता है।
लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। दोनों बड़ी शक्तियों के बीच तनाव कम होने से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में गंभीर टकराव का खतरा भी कम हो सकता है। भारत की क्षेत्रीय स्थिरता में गहरी रुचि है, क्योंकि उसकी आर्थिक वृद्धि व्यापार, निवेश और सुरक्षित समुद्री मार्गों पर बढ़ती निर्भरता रखती है।
इसलिए भारत को शांति और स्थिरता का समर्थन करना चाहिए, लेकिन अपने सुरक्षा हितों पर दृढ़ रहना चाहिए।
अरब दुनिया
बदलते अमेरिका–चीन समीकरण का असर अरब दुनिया पर भी पड़ेगा। चीन ने खाड़ी देशों के साथ मजबूत आर्थिक संबंध बनाए हैं, जबकि अमेरिका की क्षेत्र में सुरक्षा भूमिका अभी भी महत्वपूर्ण है।
भारत के यहां महत्वपूर्ण हित हैं, क्योंकि ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार, निवेश और खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीय इस क्षेत्र से जुड़े हैं।
नई दिल्ली को वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच प्रतिस्पर्धा में पश्चिम एशिया में खुद को फंसने नहीं देना चाहिए। उसे अमेरिका, चीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ईरान और अन्य महत्वपूर्ण देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने चाहिए।
अरब दुनिया में भारत का बढ़ता आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव उसे अपने हितों के आधार पर स्वतंत्र नीति अपनाने का अवसर देता है।
भारत को क्या करना चाहिए?
अमेरिका के प्रति भारत की नीति सहयोग पर आधारित होनी चाहिए, निर्भरता पर नहीं।
नई दिल्ली को वॉशिंगटन के साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग को और गहरा करना चाहिए, लेकिन रूस, ईरान और अन्य अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर स्वतंत्र फैसले लेने की अपनी क्षमता बनाए रखनी चाहिए।
भारत को व्यापार और टैरिफ के मुद्दे पर भी मजबूती से बातचीत करनी चाहिए। अमेरिका के साथ मजबूत आर्थिक संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उन्हें भारतीय हितों की भी सेवा करनी चाहिए।
इसके साथ ही भारत को जापान, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ अपने संबंध मजबूत करने चाहिए। साझेदारियों का व्यापक नेटवर्क नई दिल्ली को वॉशिंगटन और बीजिंग दोनों से निपटने के लिए अधिक कूटनीतिक गुंजाइश देगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत को खुद को मजबूत करना होगा। एक बड़ा विनिर्माण आधार, मजबूत रक्षा उद्योग, उन्नत प्रौद्योगिकी और अधिक ऊर्जा सुरक्षा भारत की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ाएंगे।
ट्रंप–शी मुलाकात से क्या निकला?
ट्रंप–शी की मुलाकात ने अमेरिका और चीन के बीच प्रतिद्वंद्विता को समाप्त नहीं किया। इसने उनके मतभेदों को प्रबंधित करने और एक और नुकसानदेह टकराव को रोकने की कोशिश को आगे बढ़ाया।
व्यापार, टैरिफ, प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अन्य आर्थिक मुद्दे उनकी बातचीत के केंद्र में रहे। दोनों पक्षों के पास नए तनाव से बचने के अपने-अपने कारण हैं।
भारत के लिए यह मुलाकात एक याद दिलाने वाली घटना है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध कभी स्थायी रूप से एक जैसे नहीं रहते। मित्र असहमत हो सकते हैं, प्रतिद्वंद्वी बातचीत कर सकते हैं और रणनीतिक प्रतिस्पर्धी तब सहयोग कर सकते हैं जब उनके हित एक-दूसरे से मिलते हों।
भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात फिर से सजाई जा रही है। भारत को यह देखने के लिए इंतजार नहीं करना चाहिए कि आखिर मोहरे कहां जाकर टिकते हैं।
भारत की रणनीति अमेरिका के साथ जुड़े रहने, चीन के साथ मतभेदों को संभालने, एशिया और अरब दुनिया में साझेदारियों को गहरा करने तथा अपनी आर्थिक और सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने पर आधारित होनी चाहिए।
इस अनिश्चित समुद्र में भारत का सबसे सुरक्षित लंगर न अमेरिका है और न चीन, बल्कि उसकी अपनी राष्ट्रीय शक्ति और रणनीतिक स्वायत्तता है।![]()
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