August 2, 2026

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फ्रेंडशिप डे: जाति, धर्म और भाषा से ऊपर उठकर एकजुट होने का आह्वान

आज, 2 अगस्त 2026, भारत में फ्रेंडशिप डे (मित्रता दिवस) मनाया जा रहा है।

इस दिन को हर व्यक्ति अपनी-अपनी समझ के अनुसार देख सकता है, लेकिन मेरे लिए फ्रेंडशिप डे वह दिन है, जब सभी भारतीय जाति, धर्म, भाषा और नस्ल से ऊपर उठकर एक-दूसरे के मित्र बनने और एकजुट होने का संकल्प लें। इसी एकता के आधार पर देशभक्त और आधुनिक सोच वाले नेताओं के नेतृत्व में एक शक्तिशाली जनसंघर्ष शुरू हो सकता है। यह संघर्ष लंबा चलेगा, इसमें भारी त्याग करना होगा और अंततः यह एक ऐतिहासिक जनक्रांति का रूप लेगा। इसके बाद देश में तेज़ औद्योगिकीकरण होगा और लोगों के जीवन स्तर में लगातार सुधार आएगा।

वर्तमान में हमारे चालाक राजनीतिक नेता अपने वोट बैंक सुरक्षित करने के लिए समाज को बांटते हैं और जातीय तथा सांप्रदायिक घृणा फैलाते हैं। जब तक हम उनकी इस साज़िश को नहीं समझेंगे और एकजुट नहीं होंगे, तब तक हमारी मुक्ति के लिए आवश्यक जनसंघर्ष शुरू नहीं हो सकता।

1857 से पहले का भारत: सौहार्द और भाईचारे की मिसाल

कुछ लोग कहते हैं कि भारत में इतनी विविधता है कि हम कभी एकजुट नहीं हो सकते। विशेष रूप से उनका कहना है कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच इतने मतभेद हैं कि वे कभी मित्र नहीं बन सकते।

लेकिन वे यह नहीं जानते कि 1857 से पहले भारत में न तो कोई सांप्रदायिक समस्या थी और न ही सांप्रदायिक दंगे होते थे। उस समय हिंदू और मुसलमान भाई-बहनों की तरह प्रेम और सौहार्द से रहते थे। वे कठिन समय में एक-दूसरे की सहायता करते थे। वे एक-दूसरे के धार्मिक त्योहार भी साथ मिलकर मनाते थे। हिंदू ईद और मुहर्रम में भाग लेते थे, जबकि मुसलमान होली और दिवाली के उत्सवों में शामिल होते थे। औरंगज़ेब को छोड़कर मुगल सम्राट, अवध और मुर्शिदाबाद के नवाब तथा अन्य मुस्लिम शासक भी होली और दिवाली में भाग लेते थे और रामलीलाओं का आयोजन करवाते थे।

यह सब 1857 के बाद बदल गया।

1857 में भारतीय विद्रोह हुआ, जिसमें हिंदुओं और मुसलमानों ने मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। विद्रोह को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने यह तय किया कि भारत पर शासन करने और उसे अपने नियंत्रण में रखने का सबसे प्रभावी तरीका ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति अपनाना है। इस विषय पर बी.एन. पांडे के राज्यसभा में दिए गए भाषण  History in the Service of Imperialism  में विस्तार से चर्चा की गई है।

‘फूट डालो और राज करो’ की नीति

1857 के बाद अंग्रेज शासकों ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नफरत फैलाने की इस नीति को लगातार और योजनाबद्ध तरीके से लागू किया।

ब्रिटिश कलेक्टर रात के समय चुपचाप किसी हिंदू पंडित को बुलाता, उसे पैसे देता और मुसलमानों के खिलाफ बोलने के लिए कहता। इसी तरह वह किसी मुस्लिम मौलवी या मौलाना को भी बुलाता, उसे पैसे देता और हिंदुओं के खिलाफ बोलने के लिए कहता।

कुछ भड़काऊ एजेंट भी नियुक्त किए जाते थे। वे गाय को मारकर उसका शव रात के समय किसी हिंदू मंदिर में फेंक देते और दीवार पर “अल्लाहो अकबर” लिख देते। सुबह जब हिंदू यह देखते तो वे समझते कि सभी मुसलमान बुरे हैं।

इसी प्रकार सूअर को मारकर उसका शव किसी मस्जिद में फेंक दिया जाता और दीवार पर “जय श्री राम” या “जय बजरंगबली” लिख दिया जाता। इसे देखकर मुसलमान यह मान लेते कि सभी हिंदू बुरे हैं।

1909 के मिंटो-मॉर्ले सुधारों के तहत हिंदुओं और मुसलमानों के लिए अलग-अलग निर्वाचन व्यवस्था लागू की गई, जिससे ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को और मजबूती मिली।

इसी का परिणाम 1947 में भारत के विभाजन के रूप में सामने आया। यह विभाजन तथाकथित दो-राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर हुआ, जिसके अनुसार हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग राष्ट्र हैं और साथ नहीं रह सकते। इसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान एक इस्लामी राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया। इस विषय पर मैंने अपने लेख The Truth About Pakistan  में विस्तार से लिखा है।

1947 के बाद भी कुछ सांप्रदायिक ताकतों ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नफरत फैलाने की कोशिश की है और हाल के वर्षों में ऐसी कोशिशें काफी बढ़ गई हैं।

मित्रता दिवस केवल शुभकामनाओं का नहीं, एकजुट होने का संदेश

अब समय आ गया है कि सभी देशभक्त भारतीय उन लोगों को बेनकाब करें जो हमें बांटना चाहते हैं और इसके बजाय एकजुट होकर उस जनसंघर्ष की शुरुआत करें, जो अंततः एक जनक्रांति का रूप ले। मेरे विचार में यही हमारी वास्तविक मुक्ति का मार्ग है। इसी के माध्यम से गरीबी, बेरोज़गारी, कुपोषण, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव और उन अनेक बुराइयों का अंत संभव है, जिन्होंने सदियों से हमारे समाज को जकड़ रखा है।

सभी भारतीयों को फ्रेंडशिप डे की हार्दिक शुभकामनाएं!

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