चंडीगढ़: भारत में श्वसन संबंधी बीमारियां, विशेषकर क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी), तेजी से बढ़ रही हैं। इसके पीछे लगातार बढ़ता वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन के कारण एलर्जन्स और ओजोन स्तर में बदलाव, तेज़ी से हो रहा शहरीकरण और फेफड़ों की बीमारियों का देर से पता चलना मुख्य कारण हैं। इसी बढ़ती चुनौती को देखते हुए रेस्पिरेटरी एजुकेशन सोसायटी द्वारा एरोकोन नामक एक विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें ऑब्सट्रक्टिव एयरवे डिजीज और विशेष रूप से सीओपीडी पर चर्चा की गई।
इस कार्यक्रम में 70 से अधिक चेस्ट फिजिशियन ने भाग लिया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि मेडिकल समुदाय इस समस्या को लेकर कितना गंभीर है। वैज्ञानिक सत्रों के माध्यम से जागरूकता बढ़ाने, समय पर निदान और बेहतर इलाज के तरीकों पर जोर दिया गया। यह कार्यक्रम एयरोफोर्स (ज़ायडस हेल्थकेयर का एक डिवीजन) के सहयोग से आयोजित किया गया, जिसका उद्देश्य मरीजों को बेहतर जीवन गुणवत्ता प्रदान करना है।
इस अवसर पर देश के प्रमुख विशेषज्ञों में डा. एस.के. जिंदल, डा. डी. बेहरा, डा. दीपक अग्रवाल, डा. विशाल शर्मा, डा. आदित्य जिंदल और डॉ. रॉबिन गुप्ता ने अपने विचार साझा किए और जन जागरूकता पर विशेष जोर दिया।
डॉ. एस.के. जिंदल ने कहा कि सीओपीडी जैसी बीमारियां “साइलेंट किलर” की तरह हैं, जो धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाती हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे धूम्रपान से बचें, प्रदूषण से बचाव करें और सांस से जुड़ी किसी भी समस्या को नजरअंदाज न करें। उन्होंने यह भी बताया कि समय पर जांच और सही इलाज से इस बीमारी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
वहीं, डॉ. रॉबिन गुप्ता ने कहा कि आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती बीमारी का देर से पता चलना है। उन्होंने बताया कि यदि मरीज शुरुआती लक्षणों जैसे लगातार खांसी, सांस फूलना या सीने में जकड़न को पहचान लें और समय रहते डॉक्टर से सलाह लें, तो गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है। उन्होंने नियमित जांच और जीवनशैली में सुधार को बेहद जरूरी बताया।
कार्यक्रम के दौरान पीपैर डिवाइस के बारे में भी जानकारी दी गई, जिसे सांस से जुड़ी बीमारियों के इलाज में उपयोग किया जाता है। यह एक ऐसा उपकरण है जो मरीज को सांस छोड़ते समय हल्का दबाव और कंपन (वाइब्रेशन) देता है, जिससे फेफड़ों में जमा कफ ढीला होकर बाहर निकलने में मदद मिलती है। डॉक्टर इसे खासकर उन मरीजों के लिए उपयोगी मानते हैं जिन्हें बलगम जमा होने, सांस फूलने या सीओपीडी जैसी समस्याएं होती हैं, ताकि उनकी सांस लेने की प्रक्रिया आसान हो सके और दवाइयों का असर बेहतर तरीके से मिल सके।
विशेषज्ञों ने यह भी जोर देकर कहा कि जन जागरूकता ही इस बढ़ती समस्या से निपटने का सबसे प्रभावी तरीका है। स्कूलों, कार्यस्थलों और समुदाय स्तर पर नियमित हेल्थ चेकअप, धूम्रपान निषेध अभियान और प्रदूषण नियंत्रण उपायों को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। साथ ही, लोगों को अपनी जीवनशैली में सुधार करते हुए नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और साफ वातावरण में रहने की आदत अपनानी चाहिए, ताकि श्वसन रोगों के जोखिम को कम किया जा सके। यह पहल देशभर में श्वसन रोगों के इलाज के स्तर को बेहतर बनाने, डॉक्टरों के क्लिनिकल निर्णय को मजबूत करने और मरीजों को बेहतर परिणाम देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
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